आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने दिल्ली के ऋषभोदय में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभावी बनो, प्रभाव मत दिखाओ। जानिए उनके प्रेरक संदेश।
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के 3 प्रेरक संदेश: प्रभावी बनो, प्रभाव मत दिखाओ
संवाददाता- राजेश जैन दद्दू
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने दिल्ली के ऋषभोदय में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन को सरल, सहज और गुणवान बनाने का संदेश दिया। दिगम्बर जैन पट्टाचार्य 108 श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति को अपने गुणों की वृद्धि करते रहना चाहिए और दोषों को छोड़ना चाहिए। उन्होंने कहा कि स्वयं को प्रभावी बनाओ, लेकिन किसी पर अपना प्रभाव मत दिखाओ।
प्रभावी बनो, प्रभाव मत दिखाओ
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि व्यक्ति को अपने गुणों की लगातार वृद्धि करते रहना चाहिए। जीवन में मौजूद दोषों को छोड़कर आत्म-सुधार की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। स्वयं को प्रभावी बनाना जरूरी है, लेकिन इसके लिए किसी का तिरस्कार करना उचित नहीं है।उन्होंने कहा, “प्रभावी बनो, परन्तु प्रभाव मत दिखाओ।” व्यक्ति की सरलता ही उसकी पहचान बननी चाहिए। प्रभाव मांगने या दिखाने से नहीं मिलता, बल्कि अच्छे गुणों की वृद्धि से मिलता है। जब व्यक्ति अपने भीतर गुणों को वर्धमान करता है तो उसका प्रभाव स्वतः समाज में फैलने लगता है।
ढोंग छोड़ो, ढंग से जियो
धर्मसभा में आचार्यश्री ने जीवन में दिखावे से बचने का संदेश देते हुए कहा कि दिखावा व्यक्ति को भीतर से कमजोर करता है और जीवन को दिवालिया कर देता है। झूठे दिखावे के कारण व्यक्ति अपने जीवन को नष्ट कर लेता है।उन्होंने कहा कि व्यक्ति को हमेशा सहज और सरल जीवन जीना चाहिए। यदि आत्मशांति चाहिए, आत्मसुख प्राप्त करना है, आत्मोत्कर्ष की इच्छा है और सिद्धि-प्रसिद्धि चाहिए, तो ढोंग छोड़कर ढंग से जीवन जीना प्रारंभ करना होगा।सादगी और सहजता व्यक्ति के जीवन को वास्तविक मजबूती प्रदान करती है। बाहरी प्रदर्शन की अपेक्षा आंतरिक गुणों का विकास अधिक महत्वपूर्ण है।
सच्चा मन ही महात्मा
आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज ने कहा कि जिसका मन सच्चा होगा, वही महात्मा बन सकता है। जिसका चित्त निर्मल होगा, वही अपने चारित्र को निर्मल कर सकता है।उन्होंने मां और महात्मा के मन की विशेषता बताते हुए कहा कि दोनों का मन निर्मल और पवित्र होता है। जीवन में सच्चाई, पवित्रता और निर्मलता को अपनाकर ही व्यक्ति अपने व्यक्तित्व को ऊंचाई प्रदान कर सकता है।
साहित्य से संस्कृति की रक्षा संभव
आचार्यश्री ने कहा कि साधना, साहित्य और साधु से ही संस्कृति की रक्षा संभव है। साहित्य संस्कृति का संवाहक होता है। साहित्य के माध्यम से संस्कार, परंपराएं और जीवन-मूल्य पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ते हैं।उन्होंने कहा कि यदि संस्कार, संस्कृति, संत और समाज की रक्षा करनी है तो साहित्य की भी रक्षा करनी होगी। साहित्य समाज को दिशा देने का महत्वपूर्ण माध्यम है और संस्कृति को जीवंत बनाए रखने में इसकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज के संदेश का सार यही है कि व्यक्ति बाहरी प्रभाव दिखाने के बजाय अपने भीतर गुणों का विकास करे। सरलता, सच्चाई, निर्मलता और अच्छे संस्कारों को जीवन में अपनाकर ही व्यक्ति वास्तविक प्रभाव पैदा कर सकता है।

