—Advertisement—

रामराज कॉटन ने ‘पंचा’ लॉन्च कर ओडिशा की संथाली बुनाई परंपरा को दिया नया जीवन

Author Picture
Published On: 7 August 2026
Ramraj Cotton launches the Panchaa handwoven dhoti collection, reviving the traditional Santali weaving heritage of Mayurbhanj, Odisha, while supporting tribal women weavers and preserving India's handloom legacy.
— Ramraj Cotton launches the Panchaa handwoven dhoti collection, reviving the traditional Santali weaving heritage of Mayurbhanj, Odisha, while supporting tribal women weavers and preserving India's handloom legacy.

—Advertisement—

रामराज कॉटन ने ‘पंचा’ लॉन्च कर ओडिशा की संथाली बुनाई परंपरा को दिया नया जीवन

आदिवासी महिला बुनकरों को मिलेगा नया बाजार, पारंपरिक शिल्प को आधुनिक भारत से जोड़ने की अनूठी पहल

इंदौर। भारत की समृद्ध हथकरघा परंपराओं को संरक्षित करने और उन्हें आधुनिक उपभोक्ताओं तक पहुंचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए देश के प्रमुख पारंपरिक परिधान ब्रांड रामराज कॉटन ने अपनी नई हैंडलूम श्रृंखला ‘पंचा’ (Panchaa™) लॉन्च की है। इस नई पेशकश के माध्यम से कंपनी ने ओडिशा के मयूरभंज जिले की पारंपरिक संथाली बुनाई को आधुनिक धोती के रूप में प्रस्तुत किया है।

कंपनी का उद्देश्य केवल एक नया उत्पाद बाजार में उतारना नहीं है, बल्कि उन पारंपरिक आदिवासी बुनाई कलाओं को पुनर्जीवित करना है, जो वर्षों से सीमित पहचान और बाजार के अभाव में धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई थीं। ‘पंचा’ के जरिए रामराज कॉटन ने इस विरासत को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने और इससे जुड़ी महिला बुनकरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने का प्रयास किया है।

कम चर्चित भारतीय बुनाई परंपराओं को नई पहचान देने की पहल

भारत अपनी विविध हथकरघा और हस्तशिल्प परंपराओं के लिए विश्वभर में जाना जाता है। देश के अलग-अलग राज्यों में सैकड़ों प्रकार की पारंपरिक बुनाई आज भी जीवित हैं, लेकिन इनमें से कई कलाएं सीमित क्षेत्रों तक ही सिमटकर रह गई हैं।

इन्हीं विरासतों में से एक है ओडिशा के मयूरभंज की संथाली बुनाई, जिसे पीढ़ियों से आदिवासी महिलाएं संरक्षित करती आ रही हैं। आधुनिक जीवनशैली, औद्योगिक उत्पादन और सीमित बाजार के कारण यह पारंपरिक कला धीरे-धीरे अपनी पहचान खोती जा रही थी।

रामराज कॉटन ने इस कला को नए स्वरूप में प्रस्तुत कर न केवल इसे आधुनिक उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का प्रयास किया है, बल्कि इसके संरक्षण और संवर्धन की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम उठाया है।

के. आर. नागराजन बोले—परंपरा को आधुनिक पहचान देना जरूरी

रामराज कॉटन के संस्थापक एवं चेयरमैन के. आर. नागराजन, जिन्हें ‘द कल्चरप्रेन्योर’ के नाम से भी जाना जाता है, ने लॉन्च के अवसर पर कहा कि भारत की हथकरघा विरासत अत्यंत समृद्ध और विविधतापूर्ण है, लेकिन अनेक सुंदर बुनाई परंपराएं आज भी केवल उन समुदायों तक सीमित हैं जिन्होंने उन्हें पीढ़ियों से जीवित रखा है।

उन्होंने कहा कि मयूरभंज की संथाली बुनाई भारत की ऐसी ही अनमोल सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे व्यापक पहचान मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा,

“हमारा प्रयास इस पारंपरिक कला की मौलिकता को बनाए रखते हुए इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना है। ‘पंचा’ के माध्यम से हमने संथाली बुनाई को आधुनिक धोती के रूप में नया स्वरूप दिया है। इससे न केवल इस शिल्प को नया बाजार मिलेगा, बल्कि इस परंपरा से जुड़ी महिला बुनकरों की आजीविका भी मजबूत होगी।”

आदिवासी महिलाओं ने पीढ़ियों तक जीवित रखी यह परंपरा

संथाली आदिवासी समुदाय की महिलाएं सदियों से इस विशेष बुनाई तकनीक का उपयोग कर पारंपरिक साड़ियों का निर्माण करती रही हैं।

यह बुनाई केवल वस्त्र निर्माण नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक विरासत का भी हिस्सा रही है।

हालांकि पिछले कुछ दशकों में बाजार की बदलती मांग, मशीन निर्मित कपड़ों की बढ़ती लोकप्रियता और सीमित विपणन के कारण इस कला का दायरा लगातार सिमटता गया।

कई युवा पीढ़ियां इस पेशे से दूर होती चली गईं, जिससे इस परंपरा के समाप्त होने का खतरा बढ़ने लगा।

‘पंचा’ के रूप में मिला नया स्वरूप

रामराज कॉटन ने इस पारंपरिक बुनाई को आधुनिक उपभोक्ताओं की पसंद के अनुरूप धोती के रूप में विकसित किया है।

कंपनी का मानना है कि इस नए स्वरूप से संथाली बुनाई को देशभर में व्यापक पहचान मिलेगी और इसकी बाजार मांग भी बढ़ेगी।

इस पहल से जहां उपभोक्ताओं को एक पारंपरिक और हस्तनिर्मित उत्पाद मिलेगा, वहीं स्थानीय बुनकरों को रोजगार और बेहतर आय का अवसर भी प्राप्त होगा।

100 प्रतिशत कॉटन से तैयार होता है ‘पंचा’

कंपनी के अनुसार ‘पंचा’ पूरी तरह 100 प्रतिशत कॉटन से हाथ से बुना गया उत्पाद है।

इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं—

  • 100% शुद्ध कॉटन
  • ऑफ-व्हाइट बेस फैब्रिक
  • एजो-फ्री (पर्यावरण अनुकूल) रंगों का उपयोग
  • पारंपरिक साधारण बुनाई
  • एक्स्ट्रा-वेफ्ट तकनीक
  • पूर्णतः हस्तनिर्मित शिल्प

इन सभी विशेषताओं के कारण प्रत्येक ‘पंचा’ केवल एक परिधान नहीं, बल्कि भारतीय हथकरघा कला का जीवंत उदाहरण बन जाता है।

हैंडलूम उद्योग को मिलेगा नया प्रोत्साहन

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पारंपरिक हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों को आधुनिक बाजार से जोड़ा जाए तो इससे लाखों ग्रामीण परिवारों की आर्थिक स्थिति मजबूत हो सकती है।

‘पंचा’ जैसी पहल न केवल बुनकरों को रोजगार उपलब्ध कराएगी, बल्कि भारत की विलुप्त होती बुनाई परंपराओं को भी नई पहचान दिलाएगी।

इस प्रकार की पहलें ‘वोकल फॉर लोकल’, ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों को भी मजबूती प्रदान करती हैं।

7 अगस्त से बाजार में उपलब्ध होगा पंचा

रामराज कॉटन ने जानकारी दी कि ‘पंचा’ 7 अगस्त 2026 से कंपनी के चुनिंदा एक्सक्लूसिव स्टोर्स पर उपलब्ध होगा।

इसके अलावा ग्राहक इसे रामराज कॉटन की आधिकारिक वेबसाइट के माध्यम से भी खरीद सकेंगे।

कंपनी का मानना है कि ऑनलाइन उपलब्धता से देशभर के ग्राहक इस विशिष्ट पारंपरिक उत्पाद तक आसानी से पहुंच सकेंगे।

चार दशक से भारतीय परंपराओं को बढ़ावा दे रहा है रामराज कॉटन

रामराज कॉटन की स्थापना वर्ष 1983 में तमिलनाडु के तिरुप्पुर में के. आर. नागराजन द्वारा की गई थी।

शुरुआत में कंपनी का उद्देश्य दक्षिण भारत के ग्राहकों को उच्च गुणवत्ता वाले पारंपरिक पुरुष परिधान उपलब्ध कराना था।

आज चार दशकों बाद रामराज कॉटन देश के प्रमुख पारंपरिक परिधान ब्रांडों में शामिल हो चुका है।

धोतियों के अलावा कंपनी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों के लिए शर्ट, साड़ियां तथा अन्य पारंपरिक परिधानों और एक्सेसरीज़ की विस्तृत श्रृंखला उपलब्ध कराती है।

पारंपरिक शिल्प संरक्षण की दिशा में एक नई पहल

रामराज कॉटन पिछले कई वर्षों से भारत की कम चर्चित हथकरघा और बुनाई परंपराओं के संरक्षण एवं पुनर्जीवन के लिए कार्य कर रहा है।

‘पंचा’ इसी श्रृंखला की नवीनतम पहल है, जिसका उद्देश्य केवल व्यापार नहीं बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण भी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि निजी क्षेत्र इसी प्रकार पारंपरिक शिल्प को आधुनिक बाजार से जोड़ने का कार्य करता रहा तो भारत की अनेक विलुप्त होती हस्तकलाओं को नया जीवन मिल सकता है।

सांस्कृतिक विरासत और आत्मनिर्भरता का संगम

‘पंचा’ केवल एक नई धोती नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा, आदिवासी संस्कृति, महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता का प्रतीक बनकर सामने आया है।

यह पहल इस बात का उदाहरण है कि यदि पारंपरिक कला को आधुनिक सोच और बेहतर विपणन से जोड़ा जाए तो वह न केवल सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित कर सकती है, बल्कि लाखों कारीगरों और बुनकरों के जीवन में आर्थिक बदलाव भी ला सकती है।

रामराज कॉटन की यह पहल भारत की विविध हथकरघा परंपराओं को राष्ट्रीय और वैश्विक मंच पर नई पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp