आचार्य विशुद्धसागर जी प्रवचन 6 अगस्त 2026 में ऋषभोदय तीर्थ, कड़कड़डूमा से दिए गए प्रेरक संदेश में राग-द्वेष, धन के सदुपयोग, श्रेष्ठ गुरु और आदर्श शिष्य के गुणों का विस्तार से वर्णन किया गया। पढ़ें पूरा आध्यात्मिक संदेश।
आचार्य विशुद्धसागर जी प्रवचन 6 अगस्त 2026: राग-द्वेष छोड़ें, जीवन को सफल बनाएं
रिपोर्ट: राजेश जैन दद्दू
संकलन: मुनि सुव्रत सागर जी
देशनाचार्य: दिगम्बर जैन संत आचार्य विशुद्धसागर जी महाराज
ऋषभोदय तीर्थ, कड़कड़डूमा में विराजित दिगम्बर जैन पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने दिल्ली धर्मसभा को संबोधित करते हुए जीवन को सफल बनाने वाले अनेक प्रेरक सूत्र बताए। आचार्य विशुद्धसागर जी प्रवचन 6 अगस्त 2026 में उन्होंने स्पष्ट कहा कि मनुष्य स्वयं राग करता है और स्वयं ही द्वेष करता है। जब व्यक्ति राग और द्वेष में अंधा हो जाता है, तब वह अनर्थ की ओर बढ़ता है।उन्होंने कहा कि यदि जीवन में अनर्थ से बचना है तो अपने वास्तविक लक्ष्य अर्थात “अर्थ” पर दृष्टि रखनी होगी। लक्ष्य पर केंद्रित व्यक्ति कभी भी व्यर्थ के विवादों और नकारात्मक विचारों में नहीं उलझता।
राग-द्वेष से बचें
गुरुदेव ने कहा कि राग और द्वेष मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु हैं। इन दोनों के कारण विवेक समाप्त हो जाता है और व्यक्ति गलत निर्णय लेने लगता है। इसलिए जीवन में समता, संयम और सकारात्मक सोच को अपनाना आवश्यक है।उन्होंने कहा कि मनुष्य का वास्तविक उत्थान तभी संभव है जब वह अपने भीतर से राग-द्वेष को समाप्त करे।
योग्यता का दुरुपयोग न करें
आचार्य विशुद्धसागर जी ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को ईश्वर ने किसी न किसी विशेष योग्यता से संपन्न बनाया है। बुद्धि, ज्ञान, शक्ति और समय का उपयोग केवल रचनात्मक कार्यों में होना चाहिए।उन्होंने कहा कि अपनी ऊर्जा को नकारात्मक सोच, ईर्ष्या, द्वेष, विवाद और बुरे कार्यों में खर्च करना सबसे बड़ी हानि है। जीवन का प्रत्येक क्षण अमूल्य है और इसका उपयोग समाज तथा आत्मकल्याण के लिए होना चाहिए।
आय अधिक और व्यय कम रखें
गुरुदेव ने धन के सदुपयोग पर भी महत्वपूर्ण संदेश दिया।उन्होंने कहा कि धन का अपव्यय कभी नहीं करना चाहिए। धन का उपयोग सृजन, सेवा और परोपकार में किया जाए। आपका धन किसी के प्राण बचा सकता है और यदि उसका दुरुपयोग हुआ तो वही धन किसी के लिए संकट का कारण भी बन सकता है।उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति अपनी आय से कम व्यय करता है, वह भविष्य की अनेक परेशानियों से बच जाता है। आर्थिक अनुशासन भी आध्यात्मिक अनुशासन का ही एक भाग है।
आदर्श शिष्य कैसा हो
आचार्य श्री ने बताया कि श्रेष्ठ शिष्य वही होता है जो—
- विनयवान हो।
- स्थिर स्वभाव का हो।
- ज्ञान प्राप्त करने की तीव्र इच्छा रखता हो।
- विवेकशील हो।
- गुरु की आज्ञा का पालन करता हो।
- अल्पभोजी हो।
- नैतिक जीवन जीता हो।
- पाप से भय रखता हो।
- गुरु की परंपरा को आगे बढ़ाए।
- गुरु के विश्वास को कभी न तोड़े।
उन्होंने कहा कि गुरु के प्रति समर्पण ही शिष्य की सबसे बड़ी पहचान होती है।
सच्चे गुरु की पहचान
गुरुदेव ने बताया कि गुरु चुनते समय केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि गुणों को देखना चाहिए।सच्चा गुरु वही है जो—
- ज्ञानी हो।
- क्षमाशील हो।
- परिग्रह से मुक्त हो।
- धर्मनिष्ठ हो।
- भक्तवत्सल हो।
- धीर, वीर और गंभीर हो।
- विवेकवान हो।
- तपस्वी हो।
- स्वाध्यायशील हो।
- ध्यानशील हो।
- चरित्रवान हो।
- शिष्य के आध्यात्मिक उत्कर्ष की कामना करता हो।
उन्होंने कहा कि जो जोड़ता है, तोड़ता नहीं, वही सच्चा योगी और सच्चा गुरु कहलाता है।
जीवन का सार
अपने प्रवचन के अंत में आचार्य विशुद्धसागर जी ने कहा कि मनुष्य को अपनी शक्ति, ज्ञान, धन और समय का उपयोग सदैव लोककल्याण, आत्मकल्याण और धर्म के कार्यों में करना चाहिए। राग-द्वेष से दूर रहकर संयम, विवेक और सेवा का जीवन ही वास्तविक सुख का मार्ग है।

