महासती सरोज श्रीजी का प्रवचन नागदा में आयोजित हुआ, जिसमें समय के महत्व, राग-द्वेष त्याग, धर्म, उपवास, पौषध और जीवन को सफल बनाने के प्रेरक संदेश दिए गए। पढ़ें पूरी खबर।
महासती सरोज श्रीजी का प्रवचन: समय अमृत के समान, राग-द्वेष छोड़कर जीवन को बनाएं सफल
नागदा जंक्शन | संवाददाता : जीवनलाल जैन
नागदा के महावीर भवन में विराजित पूज्य महासती सरोज श्रीजी म.सा. ने अपने प्रेरणादायक प्रवचन में कहा कि जीवन की सबसे अनमोल अमृतसमान वस्तु केवल समय है। जो व्यक्ति समय का मूल्य समझ लेता है, वही अपने जीवन को सार्थक बना सकता है और राग-द्वेष जैसी नकारात्मक भावनाओं से मुक्त होकर सुख, शांति और आत्मिक उन्नति प्राप्त कर सकता है।
मीडिया प्रभारी नितिन बुड़ावनवाला ने बताया कि प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने धर्म, संयम एवं आत्मकल्याण के संदेशों को आत्मसात किया।
समय ही जीवन का सबसे बड़ा धन
महासती सरोज श्रीजी ने कहा कि संसार में हर व्यक्ति को समान रूप से समय मिलता है, लेकिन उसकी उपयोगिता इस बात पर निर्भर करती है कि वह उसका सदुपयोग करता है या नहीं।
उन्होंने कहा कि अमृत पीकर देवताओं ने अमरत्व प्राप्त किया था, लेकिन मनुष्य के लिए समय ही वास्तविक अमृत है। जो समय निकल जाता है, वह कभी वापस नहीं आता। इसलिए प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करना चाहिए।
उन्होंने कहा—
“आज किया वह अपना, समय टलने के बाद किया वह सपना।”
धर्म में लगाया गया समय कभी व्यर्थ नहीं जाता
महासती श्रीजी ने कहा कि सभी धर्मों में धर्मगुरु समय के सदुपयोग की प्रेरणा देते हैं। यदि व्यक्ति अपने जीवन का कुछ समय धर्म, साधना, तप, स्वाध्याय और आत्मचिंतन में लगाता है तो उसका जीवन स्वतः ही श्रेष्ठ बन जाता है।उन्होंने कहा कि उपवास, तपस्या और पौषध तभी सार्थक होते हैं जब उन्हें श्रद्धा एवं नियमपूर्वक किया जाए।
पौषध से अनंत जीवों की होती है रक्षा
प्रवचन में उन्होंने बताया कि पौषध केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवदया का भी महत्वपूर्ण माध्यम है।उन्होंने कहा कि पौषध करने से अनंत जीवों की रक्षा होती है और मनुष्य के भीतर संयम, करुणा एवं आत्मशुद्धि का विकास होता है।
राग-द्वेष छोड़कर ही मिलेगा वास्तविक सुख
महासती सरोज श्रीजी ने वर्तमान समाज की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज लोग अपने ही परिवार और रिश्तेदारों से राग-द्वेष रखने लगे हैं।उन्होंने कहा कि यदि जीवन में वास्तविक सुख, शांति और समृद्धि चाहिए तो मन से ईर्ष्या, द्वेष और वैमनस्य को समाप्त करना होगा।उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि प्रत्येक पर्व और उत्सव को केवल औपचारिकता नहीं बल्कि महोत्सव के रूप में प्रेम, सद्भाव और आत्मीयता के साथ मनाएं।
धन की तीन गतियां
महासती श्रीजी ने अपने प्रवचन में धन के सदुपयोग पर भी प्रकाश डाला।उन्होंने कहा कि धन की केवल तीन गतियां होती हैं—
- दान
- भोग
- नाश
उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से कहा कि अब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं विचार करे कि वह अपने धन का उपयोग किस दिशा में करना चाहता है।
चल रही है तपस्या
मीडिया प्रभारी नितिन बुड़ावनवाला के अनुसार—
- हंसा दिलीप काठेड़ की 10 उपवास की तपस्या निरंतर चल रही है।
- लड़ी के उपवास में विनोद राठौर के 2 उपवास गतिमान हैं।
श्रद्धालुओं ने तपस्वियों के प्रति मंगलभाव व्यक्त करते हुए उनके उत्तम स्वास्थ्य एवं सफल तपस्या की कामना की।
संचालन एवं आभार
कार्यक्रम का संचालन एवं अतिथि सत्कार दिलीप पार्थ काठेड़ द्वारा किया गया।अंत में चंदनमल संघवी ने सभी श्रद्धालुओं, अतिथियों एवं आयोजन से जुड़े सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।
निष्कर्ष
महासती सरोज श्रीजी का यह प्रवचन केवल धार्मिक संदेश नहीं बल्कि जीवन प्रबंधन का भी महत्वपूर्ण मार्गदर्शन था। उन्होंने समय के महत्व, धर्म के सदुपयोग, राग-द्वेष त्यागने, संयम अपनाने और धन के सदुपयोग पर जो विचार रखे, वे प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाले हैं।
रिपोर्ट
संवाददाता : जीवनलाल जैन
नागदा जंक्शन
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