जीवन का वास्तविक लक्ष्य आत्मा का कल्याण, परिग्रह का त्याग और समता का अभ्यास है : आर्यिका श्री 105 अपूर्व मति माताजी एवं आर्यिका श्री 105 अनुत्तर मति माताजी
चंदेरी। चातुर्मास का पावन काल जैन धर्म में आत्मचिंतन, साधना, संयम और आध्यात्मिक उन्नति का विशेष अवसर माना जाता है। इसी क्रम में चंदेरी में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आर्यिका श्री 105 अपूर्व मति माताजी एवं परम पूज्य आर्यिका श्री 105 अनुत्तर मति माताजी ने श्रद्धालुओं को जैन दर्शन के मूल सिद्धांतों का सरल, प्रभावशाली और प्रेरणादायी संदेश दिया। दोनों आर्यिकाओं ने अपने प्रवचनों में मानव जीवन की महत्ता, आत्मा की शुद्धि, परिग्रह त्याग, समता, अहिंसा, संयम, स्वाध्याय तथा सदाचार जैसे विषयों पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक उपलब्धियां अर्जित करना नहीं, बल्कि आत्मा के कल्याण और मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर होना है।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रवचनों का श्रवण किया तथा धर्म, संयम और आत्मानुशासन के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ, इसका सदुपयोग करें
अपने मंगल प्रवचन में आर्यिका श्री 105 अपूर्व मति माताजी ने कहा कि मनुष्य जन्म अनंत पुण्यों के फलस्वरूप प्राप्त होता है। यह केवल भौतिक सुख-सुविधाओं, धन-संपत्ति या प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए नहीं मिला है, बल्कि आत्मा पर अनादिकाल से बंधे कर्मों के क्षय और आत्मकल्याण के लिए मिला है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य यदि अपने जीवन को सही दिशा में ले जाना चाहता है तो उसे धर्म, संयम, सेवा, तप, स्वाध्याय, दान और सदाचार को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनाना होगा। शुभ भावों के साथ किया गया प्रत्येक कार्य आत्मा को शुद्ध करने का माध्यम बनता है, जबकि राग-द्वेष, क्रोध, लोभ और मोह जैसे विकार मनुष्य को आध्यात्मिक उन्नति से दूर ले जाते हैं।
कर्मों की निर्जरा ही जीवन की सबसे बड़ी साधना
आर्यिका श्री ने कहा कि प्रत्येक जीव अपनी आत्मा पर अनेक जन्मों से संचित कर्मों का बोझ लेकर चल रहा है। इन कर्मों का क्षय केवल ज्ञान, दर्शन और चरित्र की शुद्धि से ही संभव है।
उन्होंने बताया कि तप, त्याग, सेवा, दान, संयम और आत्मचिंतन जैसे धार्मिक कार्य केवल सामाजिक परंपराएं नहीं हैं, बल्कि आत्मा को कर्मबंधन से मुक्त करने के प्रभावी साधन हैं। जब मनुष्य अपने विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाता है, तभी वास्तविक धर्म का पालन होता है।
कोरोना काल से मिली बड़ी सीख
अपने प्रवचन के दौरान आर्यिका श्री अपूर्व मति माताजी ने कोरोना महामारी का उल्लेख करते हुए कहा कि वह समय पूरी मानवता के लिए एक महत्वपूर्ण सीख बनकर आया।
उन्होंने कहा कि उस कठिन दौर में लोगों ने अनुभव किया कि धन, पद, प्रतिष्ठा और वैभव से अधिक महत्वपूर्ण जीवन और स्वास्थ्य है। अनेक परिवारों ने अपनों को खोया, कई लोगों ने कठिन परिस्थितियों का सामना किया और पूरे समाज ने अनिश्चितता का दौर देखा।
उन्होंने कहा कि कोरोना काल ने यह स्पष्ट कर दिया कि संसार की प्रत्येक वस्तु नश्वर और परिवर्तनशील है। इसलिए जब जीवन सामान्य है, तब प्रत्येक व्यक्ति को समय का सदुपयोग करते हुए आत्मिक उन्नति की दिशा में कार्य करना चाहिए।
परिग्रह जितना कम होगा, जीवन उतना शांत होगा
आर्यिका श्री ने पूज्य आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के विचारों का उल्लेख करते हुए कहा कि आवश्यकता से अधिक संग्रह मनुष्य के जीवन में भय, चिंता और अशांति को जन्म देता है।
उन्होंने कहा कि सीमित आवश्यकताएं, संतोष और सादगी ही वास्तविक सुख का आधार हैं। परिग्रह जितना बढ़ता है, उतनी ही मनुष्य की इच्छाएं और मानसिक अशांति बढ़ती जाती है। इसके विपरीत संतोष और संयम मनुष्य को आंतरिक शांति प्रदान करते हैं।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आग्रह किया कि वे अपने जीवन में अनावश्यक संग्रह की प्रवृत्ति को कम करें तथा सरल और संतुलित जीवन अपनाएं।
समता ही सच्चे धर्म की पहचान
प्रवचन में आर्यिका श्री ने कहा कि समता केवल एक विचार नहीं, बल्कि जीवन जीने की सर्वोत्तम कला है।
उन्होंने कहा कि यदि मनुष्य सुख और दुःख, लाभ और हानि, सम्मान और अपमान जैसी परिस्थितियों में समान भाव बनाए रखना सीख ले, तो उसका जीवन स्वतः शांत और आनंदमय हो जाता है। समभाव ही आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर अग्रसर करता है।
प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण आवश्यक
इसके पश्चात अपने उद्बोधन में आर्यिका श्री 105 अनुत्तर मति माताजी ने कहा कि प्रत्येक दिन मनुष्य को स्वयं का मूल्यांकन करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि व्यक्ति प्रतिदिन अपने विचारों, वाणी और व्यवहार की समीक्षा करे तो उसके अनेक दोष स्वतः समाप्त होने लगते हैं। आत्मनिरीक्षण से मनुष्य अपनी कमियों को पहचानकर उनमें सुधार कर सकता है।
उन्होंने कहा कि वास्तविक साधना बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर झांकने से प्रारंभ होती है।
धर्म केवल मंदिर तक सीमित नहीं
आर्यिका श्री अनुत्तर मति माताजी ने कहा कि धर्म का पालन केवल मंदिर जाकर पूजा करने तक सीमित नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यदि परिवार, समाज, कार्यस्थल और दैनिक व्यवहार में विनम्रता, करुणा, सत्य, ईमानदारी, क्षमा और सहिष्णुता दिखाई नहीं देती, तो धर्म अधूरा रह जाता है।
उन्होंने कहा कि जैन धर्म का मूल संदेश अहिंसा, मैत्री, दया और सद्भाव है, जिसे प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यवहार में उतारना चाहिए।
समभाव ही वास्तविक साधना
माताजी ने कहा कि संसार में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान और संयोग-वियोग जीवन का स्वाभाविक हिस्सा हैं।
जो व्यक्ति इन परिस्थितियों में विचलित हुए बिना समभाव बनाए रखता है, वही वास्तविक साधक कहलाता है। राग-द्वेष से मुक्त होकर आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ना ही मोक्ष का मार्ग है।
उन्होंने कहा कि मन की शांति बाहरी परिस्थितियों से नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन से प्राप्त होती है।
बच्चों को दें संस्कार और धर्म की शिक्षा
दोनों पूज्य माताजी ने श्रद्धालुओं से विशेष रूप से आग्रह किया कि वे अपने बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिक मूल्य, संस्कार और जैन संस्कृति से भी जोड़ें।
उन्होंने कहा कि यदि बचपन से ही बच्चों में सत्य, अहिंसा, अनुशासन, संयम और सेवा के संस्कार विकसित किए जाएं, तो वे भविष्य में आदर्श नागरिक बनेंगे और समाज भी मजबूत होगा।
उन्होंने कहा कि माता-पिता स्वयं धार्मिक आचरण अपनाएं, क्योंकि बच्चे सबसे अधिक सीख अपने परिवार से प्राप्त करते हैं।
धर्म, सेवा और स्वाध्याय को बनाएं जीवन का हिस्सा
प्रवचन के अंत में दोनों आर्यिकाओं ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन कुछ समय स्वाध्याय, प्रार्थना, ध्यान, सेवा और आत्मचिंतन के लिए अवश्य निकालना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल पर्व या उत्सव तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा बनना चाहिए। जब व्यक्ति नियमित रूप से धर्म, सेवा और आत्मचिंतन का अभ्यास करता है, तभी उसका जीवन संतुलित, शांत और सार्थक बनता है।
श्रद्धालुओं ने लिया धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प
धर्मसभा के समापन पर उपस्थित श्रद्धालुओं ने आर्यिका श्री के प्रेरणादायी प्रवचनों का श्रवण करते हुए अपने जीवन में संयम, सादगी, परिग्रह त्याग, आत्मनिरीक्षण और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
श्रद्धालुओं ने कहा कि ऐसे आध्यात्मिक प्रवचन समाज को सकारात्मक दिशा प्रदान करते हैं और लोगों को नैतिक एवं आध्यात्मिक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं।
निष्कर्ष
चंदेरी में आयोजित इस चातुर्मास धर्मसभा ने श्रद्धालुओं को यह संदेश दिया कि जीवन की वास्तविक सफलता भौतिक उपलब्धियों में नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, संयम, सेवा, स्वाध्याय और सदाचार में निहित है। आर्यिका श्री 105 अपूर्व मति माताजी एवं आर्यिका श्री 105 अनुत्तर मति माताजी के प्रेरणादायी प्रवचनों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को आत्मकल्याण, परिग्रह त्याग, समता और अहिंसा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी। दोनों पूज्य माताजी ने स्पष्ट किया कि जो व्यक्ति अपने जीवन में संतोष, सादगी, आत्मानुशासन और समभाव को अपनाता है, वही वास्तविक अर्थों में धर्म का पालन करता है और मोक्ष मार्ग की प्रथम सीढ़ी पर अग्रसर होता है।
