साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज प्रवचन में नागदा की धर्मसभा में संसार की नश्वरता, मानसिक अशांति, आत्मज्ञान, संयम, सदाचार और मोक्षमार्ग पर प्रेरणादायी संदेश दिए गए। पूरी खबर पढ़ें।
साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज प्रवचन: संसार सुख का नहीं, आत्मा के भीतर ही छिपा है अनंत सुख का खजाना
नागदा | संवाददाता: जीवनलाल जैन
नागदा स्थित पार्श्व प्रधान पाठशाला में चातुर्मास के पावन अवसर पर आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज ने “संसार का वास्तविक स्वरूप” विषय पर अत्यंत प्रभावशाली एवं प्रेरणादायी प्रवचन देते हुए कहा कि मनुष्य जिस संसार को सुख का स्थान समझता है, वास्तव में वही संसार रोग, चिंता, मानसिक अशांति और दुखों का केंद्र है। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख, शांति और आनंद बाहर नहीं, बल्कि आत्मा के भीतर विद्यमान है। साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज प्रवचन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्म का लाभ लिया।
संसार का वास्तविक स्वरूप
साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज प्रवचन में कहा गया कि मनुष्य बाहरी वस्तुओं, धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुखों में आनंद खोजता है, जबकि वास्तविक सुख आत्मा में ही विद्यमान है। संसार परिवर्तनशील है और यहां स्थायी सुख संभव नहीं है।
धर्म के बिना जीवन अधूरा
साध्वीश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे बिना आभूषणों का संदूक, बिना जीव का शरीर और बिना दानों की फली अपना महत्व खो देते हैं, उसी प्रकार धर्म, संयम और आत्मज्ञान के बिना मनुष्य का जीवन भी सारहीन हो जाता है।
पाँचों इन्द्रियों का मोह
उन्होंने कहा कि आज का मनुष्य स्वाद, सुगंध, संगीत, सुंदर दृश्य और स्पर्श में इतना उलझ चुका है कि आत्मा को भूल गया है। मनपसंद भोजन या वातावरण नहीं मिलने पर क्रोध और तनाव उत्पन्न हो जाता है। जबकि सत्य यह है कि मनुष्य भोजन के लिए नहीं बल्कि जीवन के लिए भोजन करता है।
संसार व्याधियों का घर, शरीर रोगों की धर्मशाला
भगवान महावीर के उपदेशों का उल्लेख करते हुए साध्वीश्री ने कहा कि यह शरीर स्थायी नहीं है। एक रोग समाप्त होता है तो दूसरा जन्म लेने को तैयार रहता है। इसलिए शरीर पर अभिमान करना उचित नहीं है।
व्याधि से समाधि की ओर
प्रवचन के दौरान उन्होंने एक राजकुमार का प्रेरक प्रसंग सुनाया, जिसने असहनीय पीड़ा के समय संयम धारण करने का संकल्प लिया। रोग समाप्त होने के बाद उसने अपना वचन निभाया और राजा श्रेणिक के समय मुनि बनकर आत्मकल्याण का मार्ग अपनाया।
मानसिक तनाव सबसे बड़ी बीमारी
साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज प्रवचन में कहा गया कि वर्तमान समय में शारीरिक रोगों से अधिक मानसिक तनाव मनुष्य को परेशान कर रहा है। विद्यार्थी परीक्षा के परिणामों से, माता-पिता बच्चों के भविष्य से, व्यापारी लाभ-हानि से और कर्मचारी पदोन्नति एवं वेतन को लेकर तनाव में रहते हैं। यही मानसिक अशांति अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बनती है।
संयम कठिन नहीं, हमारी सोच कठिन
उन्होंने एक श्राविका का उदाहरण देते हुए बताया कि संसार के कार्यों के लिए मनुष्य हर कठिनाई सह लेता है, लेकिन आत्मकल्याण के लिए छोटे-छोटे कारणों से पीछे हट जाता है। वास्तव में कठिन संयम नहीं बल्कि हमारी सोच है।
सद्गुरु का एक उपदेश बदल सकता है जीवन
नंदीशेख का प्रसंग सुनाते हुए साध्वीश्री ने बताया कि आत्महत्या का विचार कर रहा एक युवक सद्गुरु के एक उपदेश से प्रभावित होकर संयम मार्ग पर चल पड़ा और आगे चलकर मुनि बन गया। सद्गुरु का सान्निध्य जीवन की दिशा बदल सकता है।
नशा तनाव का समाधान नहीं
उन्होंने कहा कि जीवन की समस्याओं से बचने के लिए शराब, गुटखा और अन्य नशों का सहारा लेना सबसे बड़ी भूल है। इससे तनाव समाप्त नहीं होता बल्कि शरीर गंभीर बीमारियों का घर बन जाता है और पूरा परिवार संकट में पड़ जाता है।
बाहरी स्वाद का मोह स्वास्थ्य के लिए घातक
साध्वीश्री ने कहा कि घर का सात्विक भोजन छोड़कर बाहर का अस्वच्छ भोजन केवल स्वाद के कारण खाना भविष्य में गंभीर बीमारियों को आमंत्रण देना है। शुद्ध एवं सात्विक भोजन ही स्वस्थ जीवन का आधार है।
आत्मा के भीतर ही छिपा है सुख का खजाना
प्रवचन के अंत में मिस्र के एक भिखारी की प्रेरक कथा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि जिस पत्थर पर बैठकर वह जीवनभर भीख मांगता रहा, उसके नीचे अपार खजाना दबा था। ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी जीवनभर बाहरी सुखों के पीछे भागता रहता है जबकि वास्तविक सुख उसकी आत्मा के भीतर छिपा होता है। आत्मज्ञान, धर्म और सद्गुरु के मार्गदर्शन से ही उस खजाने को पाया जा सकता है।
धर्मसभा में उमड़ा श्रद्धालुओं का सैलाब
धर्मसभा के समापन पर बड़ी संख्या में उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं ने साध्वी श्री अर्हमव्रता महाराज प्रवचन का लाभ लिया तथा धर्म, संयम, आत्मचिंतन और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। पूरा वातावरण धर्ममय और भक्तिमय बना रहा।

