चतुर्मास स्थापना पर कठरया परिवार ने आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी को अर्पित किया श्रीफल, लिया मंगल आशीर्वाद
वरिष्ठ समाजसेवी अमोलकचंद कठरया के नेतृत्व में परिवार के सदस्यों ने की धार्मिक सहभागिता
चन्देरी। परम पूज्य 108 आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की परम शिष्या परम पूज्य 105 आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी के पावन सान्निध्य में आयोजित चतुर्मास स्थापना महोत्सव के अवसर पर चन्देरी के प्रतिष्ठित कठरया परिवार ने श्रद्धा और भक्ति के साथ धार्मिक सहभागिता निभाई। इस अवसर पर संपूर्ण कठरया परिवार की ओर से सामूहिक रूप से आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी को श्रीफल अर्पित कर मंगल आशीर्वाद प्राप्त किया गया।
धार्मिक वातावरण में आयोजित इस कार्यक्रम में परिवार के सभी सदस्यों ने आर्यिका श्री के चरणों में श्रद्धा निवेदित करते हुए धर्म, संयम और सेवा के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
श्रद्धा और भक्ति के साथ किया श्रीफल समर्पण
चतुर्मास स्थापना महोत्सव जैन समाज के लिए विशेष धार्मिक महत्व रखता है। इसी अवसर पर कठरया परिवार के सदस्यों ने आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी के समक्ष श्रीफल अर्पित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
श्रीफल समर्पण कार्यक्रम में वरिष्ठ समाजसेवी श्री अमोलकचंद कठरया के नेतृत्व में परिवार के सदस्यों ने भाग लिया। इस दौरान सभी श्रद्धालुओं ने आर्यिका श्री के प्रवचन और मंगल आशीर्वचन का लाभ प्राप्त किया।
समाजसेवी अमोलकचंद कठरया सहित परिवार के सदस्य रहे उपस्थित
इस धार्मिक अवसर पर श्रीफल अर्पित करने वालों में वरिष्ठ समाजसेवी श्री अमोलकचंद कठरया, श्री राकेश कठरया (अध्यक्ष, जैन समाज चन्देरी), डॉ. जयेन्द्र कुमार जैन ‘निप्पू’ (राष्ट्रीय गौरव सम्मानित), श्री बाहुबली जैन, श्री सुभाषचन्द्र जैन, श्री मनीष कठरया, श्री धर्मेन्द्र जैन और श्री राहुल कठरया सहित कठरया परिवार के अनेक सदस्य उपस्थित रहे।
सभी सदस्यों ने आर्यिका श्री से धर्मलाभ प्राप्त किया और चतुर्मास काल को आध्यात्मिक साधना, स्वाध्याय और सेवा के रूप में मनाने का संकल्प दोहराया।
धर्म, स्वाध्याय और संयम का दिया संदेश
इस अवसर पर आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी ने उपस्थित श्रद्धालुओं को धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि चतुर्मास केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय नहीं बल्कि आत्मचिंतन, स्वाध्याय, संयम और सेवा भाव को जीवन में अपनाने का अवसर है।
उन्होंने श्रद्धालुओं को जिनवाणी के अध्ययन, सदाचार और संयममय जीवन की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया। आर्यिका श्री ने सभी के सुख, शांति और मंगलमय जीवन की कामना की।
चतुर्मास का होता है विशेष धार्मिक महत्व
जैन परंपरा में चतुर्मास काल का विशेष महत्व माना जाता है। इस अवधि में साधु-संत एक स्थान पर रहकर धर्म साधना, प्रवचन और आत्मिक उन्नति के लिए प्रेरणा प्रदान करते हैं।
चतुर्मास के दौरान श्रद्धालु भी धार्मिक गतिविधियों, स्वाध्याय, तप, दान और सेवा कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाते हैं। आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी के सान्निध्य में आयोजित यह चतुर्मास स्थापना कार्यक्रम भी श्रद्धा और भक्ति का केंद्र बना हुआ है।
परिवार ने लिया सेवा और धर्म पालन का संकल्प
कठरया परिवार के सदस्यों ने इस अवसर पर संकल्प लिया कि वे चतुर्मास अवधि में धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय सहभागिता करेंगे और समाज सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाएंगे।
परिवार के सदस्यों ने कहा कि संतों का सान्निध्य जीवन में सकारात्मक ऊर्जा और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान करता है। आर्यिका श्री के आशीर्वचन सभी के लिए प्रेरणादायी हैं।
श्रद्धालुओं में रहा उत्साह
चतुर्मास स्थापना महोत्सव के अवसर पर जैन समाज के श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह और श्रद्धा का वातावरण देखने को मिला। धार्मिक आयोजन में बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने पहुंचकर आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी के दर्शन किए और उनके मंगल आशीर्वचन का लाभ प्राप्त किया।
कार्यक्रम के दौरान पूरा परिसर भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा से सराबोर नजर आया। श्रद्धालुओं ने विधि-विधान और श्रद्धा भाव के साथ धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागिता निभाई। आर्यिका श्री के सान्निध्य में आयोजित इस कार्यक्रम में धर्म, संयम और आत्मचिंतन के महत्व पर विशेष प्रकाश डाला गया।
श्रद्धालुओं ने कहा कि संतों का सान्निध्य जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के साथ-साथ आध्यात्मिक मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। चतुर्मास काल आत्मशुद्धि, स्वाध्याय और सेवा भाव को अपनाने का विशेष अवसर माना जाता है, इसलिए इस दौरान धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने का विशेष महत्व रहता है।
आर्यिका श्री अपूर्वमति माताजी ने अपने मंगल आशीर्वचन में श्रद्धालुओं को धर्म के मार्ग पर दृढ़ रहने, जिनवाणी का अध्ययन करने और संयमित जीवन अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने सभी के सुख, शांति और मंगलमय जीवन की कामना की।
कार्यक्रम का समापन आर्यिका श्री के आशीर्वचन और श्रद्धालुओं की भक्ति भावना के साथ हुआ। आयोजन में उपस्थित सभी लोगों ने चतुर्मास अवधि में धर्म, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
