45 दिवसीय पाठशाला में 9 हजार सामायिक की उत्कृष्ट आराधना, बालक-बालिकाओं ने दिखाया अनुशासन और संस्कार
झाबुआ में धार्मिक शिक्षा का अनोखा उदाहरण
Jhabua स्थित श्री ऋषभदेव बावन जिनालय के श्री राजेंद्रसुरी ज्ञान मंदिर में संचालित श्री राजेंद्र जयंत पाठशाला के ग्रीष्मकालीन सत्र का शनिवार को भव्य और आध्यात्मिक वातावरण में समापन हुआ। यह पाठशाला जैन समाज की धार्मिक परंपराओं, संस्कारों और आध्यात्मिक शिक्षा को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के उद्देश्य से संचालित की जाती है।
यह पूरा आयोजन पुण्य सम्राट श्रीमद् विजय जयंतसेन सूरीश्वर जी महाराज साहेब की प्रेरणा और आशीर्वाद से किया गया, जिनके विचारों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस पाठशाला की स्थापना और संचालन किया जाता है। समापन कार्यक्रम में बड़ी संख्या में समाजजन, अभिभावक और श्रद्धालु उपस्थित रहे।
45 दिनों तक चला अनुशासन और साधना का सत्र
इस वर्ष का ग्रीष्मकालीन सत्र 30 अप्रैल से 13 जून तक चला, जिसमें कुल 45 दिनों तक लगातार धार्मिक शिक्षा और साधना कराई गई। इस दौरान 80 से अधिक बच्चों ने नियमित रूप से भाग लिया।
प्रतिदिन सुबह तीन घंटे से अधिक समय तक बच्चों को धार्मिक शिक्षा दी गई। इस अवधि में बच्चों ने केवल किताबों से ही नहीं, बल्कि व्यवहारिक रूप से भी धार्मिक जीवन जीने की सीख प्राप्त की।
इस दौरान बच्चों को प्रभु पूजा, सामायिक, प्रतिक्रमण सूत्रों का अध्ययन, नैतिक शिक्षा और जीवन मूल्यों की विस्तृत जानकारी दी गई।
9 हजार सामायिक की ऐतिहासिक उपलब्धि
इस पाठशाला की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि 45 दिनों के भीतर बच्चों द्वारा लगभग 9 हजार सामायिक की गईं।
प्रतिदिन औसतन 200 से अधिक सामायिक बच्चों द्वारा नियमित रूप से की जाती रही। यह न केवल धार्मिक अनुशासन का प्रतीक है, बल्कि बच्चों की मानसिक और आध्यात्मिक एकाग्रता को भी दर्शाता है।
आचार्यों और मार्गदर्शकों के अनुसार, इतनी बड़ी संख्या में सामायिक का अभ्यास बच्चों के भीतर आत्मशुद्धि, संयम और ध्यान की क्षमता को मजबूत करता है।

बच्चों में संस्कार और जीवन मूल्यों का विकास
पाठशाला का उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं सिखाना नहीं था, बल्कि बच्चों में संस्कार, अनुशासन और जीवन जीने की कला का विकास करना भी था।
इस दौरान बच्चों को यह सिखाया गया कि कैसे दैनिक जीवन में संयम, विनम्रता, सेवा भाव और नैतिक मूल्यों को अपनाया जाए।
शिक्षकों का कहना है कि आधुनिक समय में बच्चों में तेजी से बदलते सामाजिक वातावरण के बीच ऐसी धार्मिक शिक्षा अत्यंत आवश्यक है, जिससे वे अपने मूल संस्कारों से जुड़े रह सकें।
प्रतिभा निखारने के लिए प्रतियोगिताएं
सत्र के दौरान बच्चों की प्रतिभा को निखारने के लिए विभिन्न प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया गया। इनमें धार्मिक प्रश्नोत्तरी, श्लोक उच्चारण, प्रतिक्रमण अभ्यास और सांस्कृतिक गतिविधियां शामिल थीं।
इन प्रतियोगिताओं ने बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ाया और उन्हें मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर दिया। कई बच्चों ने पहली बार सार्वजनिक रूप से अपनी धार्मिक शिक्षा का प्रदर्शन किया।
उत्कृष्ट विद्यार्थियों को किया गया सम्मानित
समापन अवसर पर सभी उत्कृष्ट विद्यार्थियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया। इस दौरान पूरे सभागार में उत्साह और खुशी का माहौल देखने को मिला।
बालिकाओं की श्रेणी में परिणाम
बालिकाओं में नित्या, वंशिका और परी रुनवाल ने प्रथम स्थान प्राप्त किया। उनकी नियमित उपस्थिति, अनुशासन और धार्मिक गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी को सराहा गया।
द्वितीय स्थान पर अविशी गांधी, दर्शिका जैन, प्रिशा जैन और हिमानी जैन रहीं।
तृतीय स्थान चाहत रुनवाल, नियांशी जैन, क्रिशा संघवी, आशी देशलहरा, आरवी देशलहरा और धर्मी जैन ने प्राप्त किया।
बालकों का भी उत्कृष्ट प्रदर्शन
बालकों की श्रेणी में भी इस वर्ष उत्कृष्ट प्रदर्शन देखने को मिला।
रियांश रुनवाल, रिदम राठौर, चैत्य मुथा और नेवीक रुनवाल ने प्रथम स्थान प्राप्त किया।
द्वितीय स्थान पर स्पर्श रुनवाल, अमन देशलहरा, विधान पगारिया और लाभांश राठौर रहे।
तृतीय स्थान युग रुनवाल, मोक्ष कटारिया, चैत्य सकलेचा और दैविक राठौर ने हासिल किया।

समाज के विभिन्न लोगों का सहयोग
इस पूरे आयोजन को सफल बनाने में जैन समाज के कई पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा।
श्री संघ अध्यक्ष संजय मेहता, रमेश छाजेड़, रचित कटारिया, जयेश संघवी, प्रतीक मुथा और हार्दिक कोठारी ने सक्रिय भूमिका निभाई।
महिलाओं की ओर से कविता मेहता, सोनू पगारिया, सुषमा जैन और ममता संघवी ने भी बच्चों के मार्गदर्शन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
इसके अलावा उल्लास जैन, अनिल रुनवाल, मुकेश लोढ़ा और हेमेंद्र संघवी ने व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित करने में सहयोग दिया।
पूरे वर्ष जारी रहेगा पाठशाला संचालन
श्री संघ के रिंकु रुनवाल ने जानकारी दी कि अब यह पाठशाला केवल ग्रीष्मकालीन सत्र तक सीमित नहीं रहेगी।
उन्होंने बताया कि प्रतिदिन शाम 8:15 से 9 बजे तक ज्ञान मंदिर में पूरे वर्ष नियमित पाठशाला संचालित की जाएगी।
इस निर्णय का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों की धार्मिक शिक्षा निरंतर चलती रहे और उनका आध्यात्मिक विकास बाधित न हो।
धार्मिक शिक्षा का सामाजिक महत्व
इस प्रकार की पाठशालाएं समाज में धार्मिक जागरूकता और संस्कारों को मजबूत करने का कार्य करती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आज के समय में बच्चों को केवल आधुनिक शिक्षा ही नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा भी देना आवश्यक है।
यह पाठशाला इस दिशा में एक आदर्श उदाहरण बनकर उभरी है, जहां बच्चों को खेल-खेल में धर्म, अनुशासन और जीवन मूल्य सिखाए गए।
समापन समारोह में उत्सव जैसा माहौल
समापन समारोह के दौरान पूरा ज्ञान मंदिर परिसर उत्सव के माहौल में बदल गया।
बच्चों और अभिभावकों के चेहरे पर खुशी और संतोष साफ झलक रहा था। पुरस्कार प्राप्त करने वाले बच्चों को उनके माता-पिता ने गर्व के साथ सम्मानित किया।
कार्यक्रम के अंत में सभी बच्चों को आशीर्वाद दिया गया और उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की गई।
निष्कर्ष
45 दिवसीय श्री राजेंद्र जयंत पाठशाला का यह ग्रीष्मकालीन सत्र केवल एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि संस्कार निर्माण की एक महत्वपूर्ण पहल रहा।
9 हजार सामायिक की उपलब्धि, बच्चों की सक्रिय भागीदारी और समाज के सहयोग ने इस आयोजन को विशेष बना दिया।
यह पाठशाला आने वाले समय में भी जैन समाज की नई पीढ़ी को धार्मिक, नैतिक और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
