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“Kashmir को कहा जाता है मिनी ईरान: शिया संस्कृति, ईरानी परंपरा, शाह ए हमदान की विरासत, फारसी भाषा, इस्पहान होटल, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान”

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Published On: 3 March 2026
Shah-e-Hamdan’s Legacy Lives On in Kashmir’s Shia Society
— Shah-e-Hamdan’s Legacy Lives On in Kashmir’s Shia Society

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Kashmir: छोटा ईरान – धार्मिक और सांस्कृतिक जुड़ाव की कहानी

Kashmir। डल झील से लगभग आधा किलोमीटर दूर स्थित होटल इस्पहान, ममता चौक के पास एक पुराने मंदिर से सटा हुआ है। नाम सुनते ही मन में सवाल उठता है – कश्मीर और ईरान का क्या संबंध? इस्पहान, ईरान का तीसरा सबसे बड़ा शहर है, तेहरान और मशहद के बाद। मगर कश्मीर में एक होटल को ईरानी शहर का नाम देना केवल संयोग नहीं है।

बहुत से लोग मानते हैं कि हाल के दिनों में कश्मीर में हुए विरोध प्रदर्शन सिर्फ मुस्लिम पहचान से जुड़े हैं। यह सही है, लेकिन पूरी कहानी सिर्फ यही नहीं है। कश्मीर में रहने वाले कुछ शिया समुदाय के लोग ईरान के सत्ता प्रमुख अयातुल्लाह अली खामेनई को अपना धार्मिक, आध्यात्मिक और राजनीतिक नेता मानते हैं।

कश्मीर के कुछ इलाके हू-ब-हू ईरान जैसे प्रतीत होते हैं। काले झंडे, पारंपरिक ईरानी पोशाक, खामेनई और खुमैनी की बड़ी-बड़ी तस्वीरें – यह सब वहां की संस्कृति का हिस्सा बन चुकी हैं। यदि आपको ईरान की संस्कृति का अनुभव करना है और आप वहां नहीं जा सकते, तो कश्मीर के कुछ शिया बहुल इलाकों का भ्रमण इसे महसूस कराने के लिए पर्याप्त है।

Kashmir में ईरानी प्रभाव

गुलमर्ग जाते समय मार्ग में आने वाला कस्बा मागम पांच मिनट रुककर देखने पर ही एक अलग अनुभव देता है। श्रीनगर के जादिबल, भगवानपुरा, शालीमार, बेमिना और आसपास के इलाके शिया बहुल हैं। बड़गाम जिले में लगभग तीस प्रतिशत आबादी शिया है, जबकि बारामूला जिले में भी शियाओं की अच्छी संख्या है। करगिल जिले में तो लगभग 90 प्रतिशत आबादी शियाओं की है।

कश्मीर में शिया समुदाय की उपस्थिति की शुरुआत 14वीं शताब्दी में हुई, जब सूफी संत मीर सय्यद अली हमदानी (शाह ए हमदान) अपने सैकड़ों शिष्यों के साथ कश्मीर आए। उनके शिष्यों ने केवल यात्रा के सामान नहीं लाए थे, बल्कि संस्कृति, भाषा, खान-पान, खेती के तरीके और धार्मिक परंपराएं भी लाए। इनका असर आज भी कश्मीर और पूरे देश में दिखाई देता है।

कश्मीर को इसलिए ‘ईरान-ए-सगीर’ (छोटा ईरान) भी कहा जाता है।

भाषा और संस्कृति का प्रभाव

ईरान की भाषा फारसी लगभग 600 साल तक कश्मीर की राजभाषा और प्रशासनिक भाषा रही। हमारी बातचीत में प्रयुक्त कई सामान्य फारसी शब्द शाह ए हमदान के समय से आए हैं, जैसे:
बाजार, दिल, खुश, दुकान, जिंदगी, शहर, किताब, मौका।

शाह ए हमदान के शिष्यों ने कश्मीर में स्थायी रूप से बसना शुरू किया। उन्होंने यहां शादी-ब्याह किए और अपने वंशज बनाए। चौदहवीं सदी से अब तक ये परिवार हजारों की संख्या में फैल चुके हैं। आज देश भर में मौजूद कई शिया समुदायों की उत्पत्ति भी इसी मार्ग से हुई।

इसलिए यह समझना आसान है कि खामेनई की हत्या की खबर से शियाओं पर गहरा असर पड़ा, जबकि सुन्नी मुस्लिम समुदाय पर इसका उतना भावनात्मक असर नहीं हुआ।

स्थानीय उदाहरण: इस्पहान होटल

ममता चौक वाला इस्पहान होटल इसके जीवंत उदाहरणों में से एक है। इसका मालिक शायद शाह ए हमदान के वंशजों में से ही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी उन्होंने ईरान से आए अपने पूर्वजों की कहानियां सुनी होंगी। इसलिए उन्होंने अपने होटल का नाम ‘इस्पहान’ रखा।

होटल का मालिक पक्का शिया है और संभावना है कि वह उस प्रदर्शन में शामिल रहा हो, जिसका उद्देश्य दुनिया को दिखाना था कि कश्मीर के शिया भी खामेनई की हत्या से दुखी हैं और अमेरिका-इजरायल के खिलाफ अपनी नाराजगी जताते हैं।

कश्मीर में शिया पहचान और राजनीति

कश्मीर के शिया बहुल इलाके केवल धार्मिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। ये क्षेत्र ईरानी परंपराओं का केंद्र बने हुए हैं। धार्मिक परंपराओं, पोशाक और झंडों के माध्यम से शियाओं ने अपनी पहचान बनाए रखी है।

इसका असर न केवल स्थानीय समाज पर पड़ा, बल्कि राजनीतिक गतिविधियों में भी दिखाई देता है। शिया समुदाय की सक्रिय भागीदारी और धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धा के कारण ईरानी घटनाओं का असर कश्मीर पर तुरंत महसूस होता है।

सांस्कृतिक विरासत का महत्व

कश्मीर में ईरानी संस्कृति का प्रभाव सिर्फ धार्मिक नहीं है। खान-पान, शिल्पकला, संगीत और साहित्य में भी यह परंपरा स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। शाह ए हमदान और उनके अनुयायियों ने कश्मीर में शिक्षा, कृषि और प्रशासनिक कार्यों में ईरानी प्रभाव डाला।

यह सांस्कृतिक मिश्रण कश्मीर को अद्वितीय बनाता है। यही वजह है कि यहां के कुछ इलाके ‘छोटा ईरान’ कहलाते हैं।

निष्कर्ष

कश्मीर और ईरान के बीच ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध आज भी जीवित हैं। शाह ए हमदान के अनुयायियों ने न केवल अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखी, बल्कि कश्मीर की भाषा, संस्कृति और प्रशासनिक परंपरा में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मौजूदा समय में, ईरान में घटित घटनाओं का असर कश्मीर के शिया समुदाय पर दिखाई देता है। ममता चौक का इस्पहान होटल और अन्य शिया बहुल इलाके इस ऐतिहासिक और भावनात्मक संबंध की याद दिलाते हैं। यही कारण है कि कश्मीर को अक्सर ‘छोटा ईरान’ कहा जाता है।

कश्मीर में शिया समुदाय का यह समृद्ध इतिहास न केवल धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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