भारत की गोद में बैठे चीन के दो विरोधी, BrahMos सौदे से बदलेगा दक्षिण चीन सागर का सामरिक संतुलन
नई दिल्ली।
भारत ने एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी रणनीतिक स्थिति को और मजबूत करने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। चीन के बढ़ते प्रभाव और आक्रामक रवैये को संतुलित करने के लिए भारत अब अपने सबसे घातक हथियारों में शामिल BrahMos सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल को दक्षिण-पूर्व एशिया के दो प्रमुख देशों—वियतनाम और इंडोनेशिया—को निर्यात करने के बेहद करीब पहुंच गया है। यह सौदा न केवल रक्षा क्षेत्र में भारत की बढ़ती ताकत को दर्शाता है, बल्कि दक्षिण चीन सागर में चीन के लिए नई रणनीतिक चुनौती भी खड़ी करता है।
प्रस्तावित रक्षा समझौतों की कुल अनुमानित कीमत ₹4,000 करोड़ से अधिक (लगभग 450 मिलियन अमेरिकी डॉलर) बताई जा रही है। इन सौदों को भारत की रक्षा कूटनीति में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
चीन को समुद्र में घेरने की रणनीति
दक्षिण चीन सागर लंबे समय से एशिया की सबसे संवेदनशील और विवादित समुद्री सीमा बना हुआ है। चीन इस क्षेत्र के बड़े हिस्से पर अपना दावा करता है और लगातार सैन्य ठिकानों, कृत्रिम द्वीपों और नौसैनिक गतिविधियों के जरिए अपनी मौजूदगी मजबूत कर रहा है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देश चीन के इस विस्तारवाद से सीधे प्रभावित हो रहे हैं।
भारत का इन दोनों देशों के साथ ब्रह्मोस मिसाइल सौदे की ओर बढ़ना एक स्पष्ट संकेत है कि नई दिल्ली अब केवल कूटनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि रणनीतिक साझेदारी और रक्षा सहयोग के जरिए क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करना चाहती है।
भारत-रूस की संयुक्त ताकत: BrahMos Missile
BrahMos मिसाइल का विकास भारत और रूस ने संयुक्त रूप से किया है। यह दुनिया की सबसे तेज़ ऑपरेशनल सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों में से एक मानी जाती है, जो मैच 2.8 से 3 की रफ्तार से लक्ष्य को भेदने में सक्षम है। इसकी मारक क्षमता लगभग 290 से 450 किलोमीटर तक मानी जाती है, जो इसके संस्करण पर निर्भर करती है।
BrahMos को जमीन, समुद्र और हवा—तीनों प्लेटफॉर्म से दागा जा सकता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी सटीकता, कम प्रतिक्रिया समय और दुश्मन के रडार को चकमा देने की क्षमता है। यही वजह है कि यह मिसाइल तटीय रक्षा और समुद्री युद्ध के लिए बेहद प्रभावी हथियार मानी जाती है।

रूस की सहमति के बाद खुला रास्ता
चूंकि BrahMos मिसाइल का निर्माण भारत और रूस के संयुक्त उद्यम के तहत हुआ है, इसलिए किसी तीसरे देश को इसके निर्यात के लिए रूस की सहमति अनिवार्य होती है। रक्षा सूत्रों के अनुसार, रूस ने वियतनाम और इंडोनेशिया को ब्रह्मोस मिसाइल की आपूर्ति पर कोई आपत्ति नहीं जताई है।
यह सहमति हाल ही में भारतीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके रूसी समकक्ष आंद्रेई बेलौसोव के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक के दौरान सामने आई। फिलहाल रूस से औपचारिक अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) का इंतजार किया जा रहा है, जिसके बाद इन रक्षा सौदों पर औपचारिक हस्ताक्षर संभव हो पाएंगे।
दक्षिण-पूर्व एशिया में भारत की एक्टिव डिप्लोमेसी
वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ यह संभावित सौदा भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और इंडो-पैसिफिक विजन का अहम हिस्सा माना जा रहा है। भारत बीते कुछ वर्षों में आसियान देशों के साथ अपने रक्षा और सुरक्षा संबंधों को लगातार मजबूत कर रहा है।
भारत पहले ही जनवरी 2022 में फिलीपींस के साथ तीन ब्रह्मोस तटीय रक्षा बैटरियों के लिए 375 मिलियन डॉलर का ऐतिहासिक सौदा कर चुका है। यह भारत के रक्षा निर्यात क्षेत्र में पहला बड़ा मिसाइल सौदा था। अब उम्मीद जताई जा रही है कि फिलीपींस भविष्य में ब्रह्मोस के और ऑर्डर भी दे सकता है।
वियतनाम और इंडोनेशिया को क्यों चाहिए ब्रह्मोस?
वियतनाम और इंडोनेशिया दोनों ही देश दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य मौजूदगी से चिंतित हैं। वियतनाम का चीन के साथ समुद्री सीमा विवाद पुराना है, जबकि इंडोनेशिया को नाटूना द्वीप समूह के आसपास चीनी गतिविधियों से बार-बार तनाव का सामना करना पड़ता है।
ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती से इन देशों की तटीय रक्षा क्षमता कई गुना बढ़ जाएगी। यह मिसाइल दुश्मन के युद्धपोतों को लंबी दूरी से निशाना बनाने में सक्षम है, जिससे चीन की नौसैनिक रणनीति पर सीधा असर पड़ेगा।
भारत के लिए रणनीतिक और आर्थिक लाभ
इन सौदों से भारत को केवल आर्थिक लाभ ही नहीं मिलेगा, बल्कि वह एक विश्वसनीय रक्षा निर्यातक के रूप में अपनी पहचान और मजबूत करेगा। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल के तहत भारत अब हथियार आयातक से निर्यातक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
इसके अलावा, इन समझौतों से भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया में दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदार मिलेंगे, जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे में भारत की भूमिका और प्रभाव दोनों बढ़ेंगे।
चीन के लिए बढ़ती चिंता
ब्रह्मोस मिसाइल की मौजूदगी दक्षिण चीन सागर में चीन की आक्रामकता के लिए एक मजबूत निवारक शक्ति (Deterrence) के रूप में काम कर सकती है। वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों के पास यदि यह मिसाइल प्रणाली होती है, तो चीन के लिए किसी भी तरह का सैन्य दबाव बनाना आसान नहीं रहेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह कदम चीन को स्पष्ट संदेश देता है कि क्षेत्रीय स्थिरता से खिलवाड़ करने की कीमत उसे रणनीतिक स्तर पर चुकानी पड़ सकती है।
निष्कर्ष
वियतनाम और इंडोनेशिया के साथ प्रस्तावित ब्रह्मोस मिसाइल सौदे भारत की बदलती रक्षा नीति और वैश्विक रणनीतिक सोच का प्रतीक हैं। रूस की सहमति के बाद इन समझौतों का रास्ता लगभग साफ हो चुका है।
यह कदम न केवल दक्षिण चीन सागर में शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा, बल्कि भारत को इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में एक निर्णायक और जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने में भी अहम भूमिका निभाएगा।

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