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	<title>Acharya Udarsagar Maharaj &#8211; Swaraj Vani</title>
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	<title>Acharya Udarsagar Maharaj &#8211; Swaraj Vani</title>
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	<item>
		<title>सम्यग्दर्शन से जीवन बने सार्थक, रत्नत्रय की साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग: आचार्यश्री उदारसागर</title>
		<link>https://swarajvani.com/samyak-darshan-makes-life-meaningful-ratnatraya/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Kumkum Soni]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 Oct 2026 10:30:28 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Morena]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Udarsagar Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Madhya Pradesh]]></category>
		<category><![CDATA[Muni Upshantsagar Maharaj]]></category>
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					<description><![CDATA[&#160; सम्यग्दर्शन से जीवन बने सार्थक, रत्नत्रय की साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग: आचार्यश्री उदारसागर मुरैना के पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर में वर्षायोग धर्मसभा, मुनिश्री उपशांतसागर ने बताई णमोकार महामंत्र की ... <a title="सम्यग्दर्शन से जीवन बने सार्थक, रत्नत्रय की साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग: आचार्यश्री उदारसागर" class="read-more" href="https://swarajvani.com/samyak-darshan-makes-life-meaningful-ratnatraya/" aria-label="Read more about सम्यग्दर्शन से जीवन बने सार्थक, रत्नत्रय की साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग: आचार्यश्री उदारसागर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>&nbsp;</p>
<h1 dir="ltr"><strong>सम्यग्दर्शन से जीवन बने सार्थक, रत्नत्रय की साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग: आचार्यश्री उदारसागर</strong></h1>
<p dir="ltr"><strong>मुरैना के पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर में वर्षायोग धर्मसभा, मुनिश्री उपशांतसागर ने बताई णमोकार महामंत्र की महिमा</strong></p>
<p dir="ltr">मुरैना (मनोज जैन नायक)। पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग के अंतर्गत गुरुवार को धर्मसभा आयोजित हुई। इसमें परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज और परम पूज्य मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म, सम्यग्दर्शन, णमोकार महामंत्र और आत्मकल्याण का मार्ग बताया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने संतों के मंगल प्रवचन श्रद्धापूर्वक सुने।</p>
<h3 dir="ltr"><strong>सम्यग्दर्शन से सार्थक होती है मनुष्य पर्याय</strong></h3>
<p dir="ltr">आचार्यश्री उदारसागर ने कहा कि वर्षायोग के दौरान लगातार सम्यग्दर्शन विषय को समझाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सम्यग्दर्शन के प्रभाव से जीव को श्रेष्ठ मनुष्य पर्याय मिलती है और उसमें ओज, तेज, विद्या, वीर्य, वृद्धि, विजय, कीर्ति और विभव जैसे गुण विकसित होते हैं। ऐसा जीव श्रेष्ठ कुल में जन्म लेकर मानवों में तिलक के समान शोभायमान होता है।</p>
<p dir="ltr">आचार्यश्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि सम्यग्दर्शन से पवित्र हुआ जीव अनेक श्रेष्ठ गुणों से संपन्न होकर समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त करता है।</p>
<h3 dir="ltr"><strong>स्वर्ग का वैभव और चक्रवर्ती पद</strong></h3>
<p dir="ltr">दूसरे श्लोक के माध्यम से उन्होंने बताया कि सम्यग्दृष्टि और जिनेन्द्र भगवान के भक्त जीव अष्टगुणों से पुष्ट और संतुष्ट होकर स्वर्ग में विशिष्ट शोभा प्राप्त करते हैं। तीसरे श्लोक का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि सम्यग्दृष्टि जीव नवनिधि, सप्तद्वय रत्न और चक्रवर्ती जैसे महान पद और वैभव पाने में समर्थ होते हैं।</p>
<p dir="ltr">उन्होंने कहा कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल सांसारिक वैभव नहीं, बल्कि रत्नत्रय की प्राप्ति और आत्मकल्याण होना चाहिए। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि दुर्लभ मनुष्य पर्याय को भोग-विलास में व्यर्थ न गंवाएं, बल्कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति, आत्मचिंतन और रत्नत्रय की साधना में जीवन लगाएं।</p>
<h3 dir="ltr"><strong>णमोकार महामंत्र परम सौभाग्य: मुनिश्री उपशांतसागर</strong></h3>
<p dir="ltr">मुनिश्री उपशांतसागर ने कहा कि सातिशय पुण्य के उदय से हमें जैन धर्म और णमोकार महामंत्र मिला है, जो परम सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि देश-विदेश के अनेक लोग इस महामंत्र का लाभ उठा रहे हैं, जबकि हम स्वयं इसकी महिमा और प्रभाव को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं।</p>
<p dir="ltr">मुनिश्री ने कहा कि णमोकार महामंत्र का जाप केवल मंदिर या धार्मिक स्थल पर बैठकर करने तक सीमित नहीं है। भयानक स्थान हो, मार्ग में संकट हो, पवित्र अवस्था हो या अपवित्र, हर परिस्थिति में इसका स्मरण किया जा सकता है। केवल बाहरी क्रिया करना जाप नहीं है, इसके पीछे श्रद्धा, एकाग्रता और शुद्ध भाव जरूरी हैं। सहज अंदाज में उन्होंने कहा, “मच्छर मारने से जाप नहीं होता।” इस कथन से श्रद्धालु हंस पड़े, साथ ही यह संदेश भी मिला कि मंत्र-जाप दिखावा नहीं, आंतरिक साधना है।</p>
<h3 dir="ltr"><strong>सर्प के सामने भी नहीं डिगी श्रद्धा</strong></h3>
<p dir="ltr">मुनिश्री ने महामंत्र की महिमा समझाने के लिए एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक मुस्लिम व्यक्ति के पलंग पर सर्प आ गया था। वह घबराने के बजाय णमोकार मंत्र का जाप करता रहा और सर्प ने उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। उन्होंने कहा कि णमोकार महामंत्र किसी जाति, वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। श्रद्धा और शुद्ध भाव से किया गया स्मरण भय और संकट की घड़ी में मानसिक शांति और निर्भयता देता है।</p>
<p dir="ltr">मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से णमोकार महामंत्र के बाद चत्तारि मंगल का जाप भी करने को कहा। उन्होंने भगवान के समक्ष पांच पुञ्ज और जिनवाणी के समक्ष चार पुञ्ज चढ़ाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक क्रियाएं केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके भाव और उद्देश्य को समझकर करनी चाहिए। उन्होंने दिगम्बर समाज में 84 जातियों का भी उल्लेख किया।</p>
<h3 dir="ltr"><strong>संचालन और आयोजन</strong></h3>
<p dir="ltr">धर्मसभा का संचालन विद्वान नवनीत जैन शास्त्री ने किया। मंगलाचरण श्रीमती नीरज जैन ने प्रस्तुत किया। दीप प्रज्वलन और चित्र अनावरण सम्माननीय अतिथियों ने किया।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
			</item>
		<item>
		<title>लोकमूढ़ता से बचकर अपनाएं सम्यक् दर्शन का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर</title>
		<link>https://swarajvani.com/avoid-blind-beliefs-and-follow-the-path-of-right-faith-acharya-udarsagar/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 15 Sep 2026 09:02:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[JAINS]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Udarsagar Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Das Lakshan Parv]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Community]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Dharma]]></category>
		<category><![CDATA[Paryushan Parv 2026]]></category>
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					<description><![CDATA[लोकमूढ़ता से बचकर अपनाएं सम्यक् दर्शन का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर मुरैना में दस दिवसीय पर्वराज पर्युषण महापर्व प्रारंभ, जैन मंदिरों में प्रतिदिन होंगे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन मुरैना (मनोज ... <a title="लोकमूढ़ता से बचकर अपनाएं सम्यक् दर्शन का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर" class="read-more" href="https://swarajvani.com/avoid-blind-beliefs-and-follow-the-path-of-right-faith-acharya-udarsagar/" aria-label="Read more about लोकमूढ़ता से बचकर अपनाएं सम्यक् दर्शन का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>लोकमूढ़ता से बचकर अपनाएं सम्यक् दर्शन का मार्ग : आचार्यश्री उदारसागर</strong></h1>
<h2><strong>मुरैना में दस दिवसीय पर्वराज पर्युषण महापर्व प्रारंभ, जैन मंदिरों में प्रतिदिन होंगे धार्मिक एवं सांस्कृतिक आयोजन</strong></h2>
<p><strong>मुरैना (मनोज जैन नायक)।</strong> श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने लोकमूढ़ता का स्वरूप समझाया। उन्होंने कहा कि धर्म के क्षेत्र में श्रद्धा के साथ विवेक का होना अत्यंत आवश्यक है। केवल इसलिए किसी धार्मिक क्रिया को करना उचित नहीं है कि लोग वर्षों से उसे करते आ रहे हैं या समाज में उसकी परंपरा प्रचलित है। बिना तत्त्व को समझे लोक-प्रचलित मान्यताओं और रूढ़ियों का अंधानुकरण करना ही लोकमूढ़ता कहलाता है।</p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए श्रद्धा के साथ सही ज्ञान और विवेक आवश्यक है। मनुष्य को कोई भी धार्मिक क्रिया करने से पहले यह विचार करना चाहिए कि वह जिस कार्य को धर्म समझकर कर रहा है, क्या वह वास्तव में आत्मकल्याण का कारण है? क्या उस क्रिया से उसके भीतर मौजूद राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों में कमी आ रही है? यदि किसी कार्य के पीछे केवल भीड़ का अनुसरण, भय, लालच अथवा अंधविश्वास है तो उसे वास्तविक धर्म नहीं माना जा सकता।</p>
<h2><strong>पानी से शरीर स्वच्छ होता है, आत्मा नहीं</strong></h2>
<p>आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि जैन दर्शन में लोकमूढ़ता को सम्यक् दर्शन में बाधक दोषों में शामिल किया गया है। <em>रत्नकरण्ड श्रावकाचार</em> सहित विभिन्न जैन ग्रंथों में लोकमूढ़ता के अनेक उदाहरण बताए गए हैं। नदी अथवा समुद्र में स्नान करने मात्र से सभी पाप धुल जाने और आत्मा के पवित्र हो जाने की मान्यता भी लोकमूढ़ता का उदाहरण है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि पानी से केवल शरीर को स्वच्छ किया जा सकता है, लेकिन आत्मा की मलिनता को दूर करने के लिए अपने परिणामों की शुद्धि आवश्यक है। पाप केवल पानी में स्नान करने से समाप्त नहीं होते। आत्मा की शुद्धि के लिए सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र के मार्ग पर चलना पड़ता है। जब मनुष्य अपने भीतर के राग-द्वेष और कषायों को कम करता है, तभी वास्तविक आत्मशुद्धि की प्रक्रिया प्रारंभ होती है।</p>
<h2><strong>धर्म बाहरी प्रदर्शन नहीं, आत्मिक शुद्धि का माध्यम</strong></h2>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि किसी स्थान को केवल पवित्र मानकर वहां बालू के ढेर अथवा सिकता के घरौंदे बनाना और उसे ही धर्म समझकर पूजना विवेकहीन आचरण है। धर्म किसी बाहरी प्रदर्शन या दिखावे का नाम नहीं है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य आत्मा के भीतर शुभ और शुद्ध परिणामों को जागृत करना है।</p>
<p>उन्होंने पर्वत से गिरकर अथवा अग्नि में प्रवेश करके जीवन समाप्त करने जैसी अविवेकपूर्ण मान्यताओं से भी सावधान किया। उन्होंने कहा कि शरीर को अनावश्यक कष्ट देना अथवा जीवन समाप्त कर लेना मोक्ष प्राप्ति का मार्ग नहीं है। मोक्ष आत्महत्या से नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और कर्मों के क्षय से प्राप्त होता है। जिनवाणी प्रत्येक जीव को हिंसा से दूर रहने, संयम धारण करने और आत्मकल्याण के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।</p>
<h2><strong>तीन प्रकार की मूढ़ताओं से सावधान रहने का संदेश</strong></h2>
<p>आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने बताया कि जैन दर्शन में विवेकहीन श्रद्धा के तीन प्रमुख रूप बताए गए हैं—लोकमूढ़ता, देवमूढ़ता और गुरुमूढ़ता।</p>
<p><strong>लोकमूढ़ता</strong> का अर्थ समाज और लोक में प्रचलित रूढ़ियों तथा अंधविश्वासों का तत्त्व-विचार किए बिना पालन करना है।</p>
<p><strong>देवमूढ़ता</strong> का अर्थ सांसारिक इच्छाओं और लौकिक फलों की प्राप्ति के लिए राग-द्वेष एवं कषायों से युक्त देवी-देवताओं को प्रसन्न करने की भावना रखना है।</p>
<p><strong>गुरुमूढ़ता</strong> का अर्थ हिंसा, परिग्रह, आरंभ और असंयम से युक्त पाखंडी साधुओं को वास्तविक गुरु मानकर उनका आदर एवं सत्कार करना है।</p>
<p>उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ते समय जिनवाणी और तत्त्वज्ञान को आधार बनाएं। सच्ची श्रद्धा वही है, जिसमें विवेक, आत्मचिंतन और शुद्ध आचरण समाहित हो।</p>
<h2><strong>विवेक और श्रद्धापूर्वक की गई क्रिया ही धर्म : मुनिश्री उपशांतसागर</strong></h2>
<p>धर्मसभा में मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि जैन धर्म किसी भी बात को केवल परंपरा या लोकमान्यता के कारण स्वीकार करने की शिक्षा नहीं देता। जिनवाणी के आधार पर तत्त्व को समझना, विवेकपूर्वक श्रद्धा करना और अपने जीवन को आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ाना ही सच्चा धर्म है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि धर्म के नाम पर होने वाले अंधानुकरण से बचना चाहिए। प्रत्येक धार्मिक क्रिया के पीछे छिपे वास्तविक उद्देश्य को समझना आवश्यक है। पूजा-पाठ, व्रत, विधान और अन्य धार्मिक अनुष्ठान तभी सार्थक हैं, जब उनके माध्यम से आत्मा में निर्मलता, विनय, संयम, करुणा और वीतरागता के भाव जागृत हों।</p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि दुनिया क्या कर रही है, यह देखने से पहले मनुष्य को यह देखना चाहिए कि जिनेन्द्र भगवान ने क्या कहा है। लोक के पीछे चलने के स्थान पर जिनमार्ग का अनुसरण करना ही मनुष्य जीवन की वास्तविक सार्थकता है।</p>
<h2><strong>उत्तम क्षमा धर्म की आराधना के साथ पर्वराज पर्युषण प्रारंभ</strong></h2>
<p>मुरैना में दस दिवसीय पर्वराज पर्युषण महापर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ प्रारंभ हो गया है। यह महापर्व 25 सितंबर तक चलेगा। इस दौरान नगर के सभी दिगम्बर जैन मंदिरों में प्रतिदिन प्रातःकाल विशेष पूजा-अर्चना, अभिषेक और शांतिधारा के आयोजन किए जाएंगे। सायंकाल धार्मिक, आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे।</p>
<p>व्याकरणाचार्य महेंद्रकुमार शास्त्री, पूर्व प्राचार्य ने बताया कि पर्युषण महापर्व के प्रथम दिन धर्म के पहले लक्षण <strong>उत्तम क्षमा</strong> की आराधना की जाएगी। जैन मंदिरों में उत्तम क्षमा धर्म पर आधारित विशेष पूजा-अर्चना और व्याख्यान होंगे। महापर्व के दस दिनों में प्रतिदिन क्रमशः दस धर्मों की आराधना की जाएगी और श्रद्धालुओं को उनके आध्यात्मिक महत्व से अवगत कराया जाएगा।</p>
<h2><strong>पर्युषण पर्व के दौरान प्रतिदिन होंगे ये आयोजन</strong></h2>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-357667 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/yuty-300x171.jpeg" alt="yuty" width="609" height="347" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/yuty-300x171.jpeg 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/yuty-1024x585.jpeg 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/yuty-768x439.jpeg 768w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/yuty-1536x877.jpeg 1536w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/yuty.jpeg 1600w" sizes="(max-width: 609px) 100vw, 609px" /><span style="font-size: inherit;">निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार प्रतिदिन प्रातः 6:30 बजे से सामूहिक अभिषेक, शांतिधारा, नित्यमह पूजन एवं विशेष पूजन होगा। प्रातः 8 बजे से आचार्यश्री उदारसागर महाराज और मुनिश्री उपशांतसागर महाराज के मंगल प्रवचन होंगे।</span></p>
<p>दोपहर 3 बजे से सिद्धांत ग्रंथ <em>तत्त्वार्थ सूत्र</em> का स्वाध्याय कराया जाएगा। शाम के समय गुरु भक्ति, महाआरती और शास्त्र सभा आयोजित होगी। इसके बाद रात्रि में धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम होंगे। पर्युषण महापर्व को लेकर जैन समाज के श्रद्धालुओं में उत्साह का वातावरण है तथा मंदिरों में विशेष तैयारियां की गई हैं।</p>
]]></content:encoded>
					
		
		
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		<title>यह भी बीत जाएगा’: मुरैना में आचार्यश्री उदारसागर ने बताया जीवन का बड़ा सत्य</title>
		<link>https://swarajvani.com/murena-yah-bhi-beeta-jayega/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Swaraj Vani Editor]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 30 Aug 2026 09:08:51 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Morena]]></category>
		<category><![CDATA[Acharya Udarsagar Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[Jain News]]></category>
		<category><![CDATA[Jain Samaj Morena]]></category>
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		<category><![CDATA[Upashant Sagar Maharaj]]></category>
		<category><![CDATA[आचार्यश्री उदारसागर महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[जैन धर्मसभा]]></category>
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		<category><![CDATA[पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर]]></category>
		<category><![CDATA[मनोज जैन नायक]]></category>
		<category><![CDATA[मुनिश्री उपशांत सागर महाराज]]></category>
		<category><![CDATA[मुरैना समाचार]]></category>
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					<description><![CDATA[मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने सम्राट और संत का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए सुख-दुःख में समभाव रखने का संदेश दिया। “जीवन ... <a title="यह भी बीत जाएगा’: मुरैना में आचार्यश्री उदारसागर ने बताया जीवन का बड़ा सत्य" class="read-more" href="https://swarajvani.com/murena-yah-bhi-beeta-jayega/" aria-label="Read more about यह भी बीत जाएगा’: मुरैना में आचार्यश्री उदारसागर ने बताया जीवन का बड़ा सत्य">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने सम्राट और संत का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए सुख-दुःख में समभाव रखने का संदेश दिया।</p>
<p>“जीवन में सुख-दुःख स्थायी नहीं, यह भी बीत जाएगा”—आचार्यश्री उदारसागर</p>
<p>मनोज जैन नायक | दैनिक स्वराज वाणी</p>
<p>मुरैना। आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को अपनी अमृतमयी वाणी से संबोधित करते हुए जीवन के परम रहस्य को समझाने के लिए सम्राट और संत का प्रेरक प्रसंग सुनाया।</p>
<p>आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने सुनाया सम्राट और संत का प्रसंग</p>
<p>आचार्यश्री ने बताया कि एक सम्राट जीवन का परम रहस्य जानना चाहता था। अनेक प्रयासों के बाद एक संत उसके दरबार में पहुंचे। सम्राट ने उनसे ऐसा सूत्र बताने का आग्रह किया, जो सुख-दुःख और संकट की प्रत्येक परिस्थिति में उसका मार्गदर्शन कर सके।</p>
<p>संत ने उसे एक ताबीज देते हुए कहा कि इसे सामान्य परिस्थितियों में नहीं खोलना। जब जीवन में ऐसा संकट आए, जब बचने का कोई मार्ग दिखाई न दे, तभी इसे खोलना।<a href="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/0317e7c2-cd0b-49e7-adb3-a634c46ef5e4.jpeg"><img decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-351459" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/0317e7c2-cd0b-49e7-adb3-a634c46ef5e4.jpeg" alt="0317e7c2 cd0b 49e7 adb3 a634c46ef5e4" width="994" height="742" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/0317e7c2-cd0b-49e7-adb3-a634c46ef5e4.jpeg 994w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/0317e7c2-cd0b-49e7-adb3-a634c46ef5e4-300x224.jpeg 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/0317e7c2-cd0b-49e7-adb3-a634c46ef5e4-768x573.jpeg 768w" sizes="(max-width: 994px) 100vw, 994px" /></a></p>
<p>कुछ समय बाद पड़ोसी राजा ने सम्राट पर आक्रमण कर दिया। युद्ध में सम्राट को जान बचाकर भागना पड़ा। नदी के किनारे पहुंचकर जब उसे लगा कि अब कोई रास्ता नहीं बचा, तब उसे संत का दिया हुआ ताबीज याद आया। ताबीज खोलने पर उसमें एक कागज मिला, जिस पर लिखा था— “यह भी बीत जाएगा।”</p>
<p>सुख में अहंकार और दुःख में निराशा न करें</p>
<p>आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि इस एक वाक्य ने सम्राट के भीतर धैर्य और साहस जगा दिया। उसे समझ आया कि कोई भी परिस्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रहती। समय बदलता है और परिस्थितियां भी बदल जाती हैं।</p>
<p>उन्होंने कहा कि जीवन में आज जो है, वह हमेशा नहीं रहेगा और जो आज नहीं है, वह भविष्य में आ सकता है। इसलिए सुख में अहंकार और दुःख में निराशा नहीं करनी चाहिए।</p>
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<p>प्रत्येक परिस्थिति में धैर्य, समता और धर्म का सहारा लेना चाहिए। दूसरों के पुण्य कार्यों की अनुमोदना करते हुए जीवन के उतार-चढ़ाव को समभाव से स्वीकार करना ही सच्चे धर्म की पहचान है। जीवन का सत्य यही है— “यह भी बीत जाएगा।”</p>
<p>दूसरों के पुण्य कार्य की अनुमोदना भी पुण्य का कारण—मुनिश्री उपशांत सागर</p>
<p>धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने आहारदान की भावना और अनुमोदना के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि कोई श्रद्धालु यह भावना रखता है कि “मुझे अंजुली में आहार करने का सौभाग्य प्राप्त हो, ऐसा आशीर्वाद दीजिए”, तो उसकी भावना की हृदय से अनुमोदना करनी चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि साधु-संतों के प्रति श्रद्धा रखना तथा धर्म कार्य करने वालों की अनुमोदना करना भी पुण्य का कारण बनता है।</p>
<p>राजा वज्रजंघ का सुनाया प्रेरक प्रसंग</p>
<p>मुनिश्री ने राजा वज्रजंघ और उनकी पत्नी का प्रेरक प्रसंग सुनाते हुए बताया कि वे दण्डक वन पहुंचे, जहां उन्होंने चारण ऋद्धिधारी मुनिराजों को श्रद्धापूर्वक आहारदान दिया। वन में मौजूद कुछ तिर्यंच प्राणियों ने इस धार्मिक कार्य को देखा और प्रसन्न होकर मन से उसकी अनुमोदना की।</p>
<p>मुनिश्री ने कहा कि उन जीवों ने स्वयं आहारदान नहीं किया, लेकिन निर्मल भाव से धर्मकार्य की अनुमोदना की। अनुमोदना के पुण्य से उनका कल्याण हुआ और उन्हें श्रेष्ठ गति प्राप्त हुई।</p>
<p>इससे स्पष्ट है कि यदि स्वयं पुण्य कार्य करने का अवसर न मिले तो दूसरों के पुण्य कार्य की निर्मल भाव से अनुमोदना अवश्य करनी चाहिए।</p>
<p>दूसरों के धर्म कार्य में प्रसन्न होना आत्मकल्याण का साधन</p>
<p>मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि किसी को मंदिर जाते, पूजा करते, तपस्या करते अथवा साधु-संतों को आहारदान करते देखकर मन में प्रसन्नता का भाव उत्पन्न होना ही सच्ची अनुमोदना है।</p>
<p>धर्म के मार्ग पर दूसरों के पुण्य  प्रसन्न होना भी आत्मकल्याण का महत्वपूर्ण साधन है।</p>
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		<title>श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा, मुनिराज के शरीर को नहीं उनके गुणों को देखें: आचार्य उदारसागर</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 29 Aug 2026 09:58:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा, मुनिराज के शरीर को नहीं उनके गुणों को देखें: आचार्य उदारसागर निर्विचिकित्सा अंग की व्याख्या करते हुए बोले आचार्यश्री- शरीर स्वभाव से अशुद्ध, ... <a title="श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा, मुनिराज के शरीर को नहीं उनके गुणों को देखें: आचार्य उदारसागर" class="read-more" href="https://swarajvani.com/acharya-udarsagar-there-should-be-no-doubt-where-there-is-faith-look-at-a-jain-monks-virtues-not-the-body/" aria-label="Read more about श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा, मुनिराज के शरीर को नहीं उनके गुणों को देखें: आचार्य उदारसागर">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा, मुनिराज के शरीर को नहीं उनके गुणों को देखें: आचार्य उदारसागर</strong></h1>
<h2><strong>निर्विचिकित्सा अंग की व्याख्या करते हुए बोले आचार्यश्री- शरीर स्वभाव से अशुद्ध, लेकिन आत्मगुण पवित्र; साधु की साधना, त्याग और रत्नत्रय के प्रति रखें श्रद्धा</strong></h2>
<p><strong>रिपोर्टर: मनोज जैन नायक</p>
<p>मुरैना</strong> नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने श्रद्धा, आत्मसाधना और जैन धर्म के निर्विचिकित्सा अंग का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चल सकता। धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति को बाहरी परिस्थितियों अथवा शरीर के स्वरूप को देखकर अपनी श्रद्धा कमजोर नहीं करनी चाहिए।</p>
<p>आचार्यश्री ने निर्विचिकित्सा अंग की विस्तार से व्याख्या करते हुए इसे आत्मा की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि रत्नत्रयधारी दिगम्बर मुनिराज के शरीर को देखकर मन में ग्लानि अथवा संशय का भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए। इसके बजाय उनके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र जैसे आत्मगुणों के प्रति श्रद्धा और प्रीति रखनी चाहिए।</p>
<h2><strong>शरीर अशुद्ध, लेकिन आत्मा के गुण पवित्र</strong></h2>
<p>आचार्य उदारसागर महाराज ने कहा कि शरीर का स्वभाव अलग है और आत्मा के गुणों की पवित्रता अलग है। शरीर स्वभाव से अशुद्ध हो सकता है, लेकिन साधक के आत्मगुण पवित्र होते हैं। इसलिए किसी साधु के शरीर को देखने के बजाय उनकी साधना, त्याग, तप और आत्मगुणों को देखना चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि रत्नत्रयधारी मुनिराज अपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र के कारण पूजनीय एवं वंदनीय होते हैं। धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने वाले व्यक्ति को बाहरी स्वरूप से प्रभावित होकर अपने भावों को बदलने के बजाय आत्मगुणों को पहचानना चाहिए।</p>
<h2><strong>नीम के उदाहरण से समझाया शरीर और स्वभाव का अंतर</strong></h2>
<p>आचार्यश्री ने अपनी बात को सरल तरीके से समझाने के लिए नीम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि नीम स्वभाव से कड़वा होता है और वह अपनी प्रकृति को नहीं छोड़ता। उसकी कड़वाहट के बावजूद उसके अपने गुण और उपयोगिता होती है।</p>
<p>इसी प्रकार शरीर का स्वभाव जैसा है, वह वैसा ही रहेगा, लेकिन रत्नत्रयधारी मुनिराज के आत्मगुण और उनकी साधना उन्हें पूजनीय एवं वंदनीय बनाती है। इसलिए श्रद्धालुओं को बाहरी शरीर के बजाय साधु के भीतर विद्यमान गुणों को देखने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए।</p>
<h2><strong>माला के उदाहरण से समझाया सम्मान के पीछे का भाव</strong></h2>
<p>धर्मसभा में आचार्य उदारसागर महाराज ने सम्मान समारोह में पहनाई जाने वाली माला का उदाहरण देते हुए भावों के महत्व को भी समझाया।</p>
<p>उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सम्मान के दौरान माला पहनाई जाए और वह माला उतारकर वहीं रख दे। इसके बाद उसी माला को दूसरे व्यक्ति के सम्मान में पहना दिया जाए तो दूसरा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न कर सकता है कि किसी दूसरे के गले से उतारी गई माला उसे क्यों पहनाई गई? यदि सम्मान के लिए नई माला उपलब्ध नहीं थी तो उसे सम्मान के लिए बुलाने का औचित्य क्या था?</p>
<p>आचार्यश्री ने कहा कि इस उदाहरण से समझना चाहिए कि किसी वस्तु का केवल बाहरी स्वरूप महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसके उपयोग, उद्देश्य और उसके पीछे छिपे भाव को समझना भी जरूरी है।</p>
<h2><strong>धर्म में बाहरी स्वरूप नहीं, गुणों की पहचान जरूरी</strong></h2>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-351354 aligncenter" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/DFDF-300x139.jpeg" alt="DFDF" width="512" height="237" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/DFDF-300x139.jpeg 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/DFDF-1024x474.jpeg 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/DFDF-768x355.jpeg 768w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/DFDF.jpeg 1476w" sizes="auto, (max-width: 512px) 100vw, 512px" /><br />
आचार्यश्री ने कहा कि धर्म में भी साधु के शरीर को देखकर धारणा नहीं बनानी चाहिए। उनके गुण, त्याग और आत्मसाधना को पहचानना चाहिए।</p>
<p>साधु का जीवन त्याग और संयम पर आधारित होता है। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा भी उनके आत्मिक गुणों और साधना के आधार पर होनी चाहिए। शरीर को देखकर उत्पन्न होने वाले संशय अथवा ग्लानि के भाव से बचना निर्विचिकित्सा अंग की भावना को मजबूत करता है।</p>
<h2><strong>वादिराज मुनिराज और कड़वी तुमणी का सुनाया प्रसंग</strong></h2>
<p>प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने वादिराज मुनिराज से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए शरीर और आत्मगुणों के अंतर को समझाया। उन्होंने कड़वी तुमणी का उदाहरण देते हुए कहा कि कड़वी तुमणी खाने योग्य नहीं होती। उसे खाने पर उल्टी तक हो सकती है, लेकिन वही तुमणी सूखने के बाद नदी पार कराने के काम आ सकती है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि इस उदाहरण से यह शिक्षा मिलती है कि किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को केवल उसके बाहरी स्वरूप के आधार पर नहीं देखना चाहिए। उसके गुण, उपयोग और उद्देश्य को भी समझना आवश्यक है।</p>
<p>इसी तरह दिगम्बर मुनिराज के शरीर को देखने के बजाय उनके रत्नत्रय और आत्मसाधना पर दृष्टि रखनी चाहिए।</p>
<h2><strong>&#8216;मनुष्य का शरीर तभी सार्थक, जब धर्म और परहित में आए काम&#8217;</strong></h2>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-351355 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/FDGF-300x154.jpeg" alt="FDGF" width="300" height="154" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/FDGF-300x154.jpeg 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/FDGF-1024x526.jpeg 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/FDGF-768x395.jpeg 768w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/08/FDGF.jpeg 1416w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><span style="font-size: inherit;">आचार्य उदारसागर महाराज ने औदारिक शरीर के अर्थ पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ‘उदार’ का अर्थ केवल बड़ा होना नहीं है, बल्कि दूसरों के काम आना और उदारता का भाव रखना भी है।</span></p>
<p>मनुष्य को प्राप्त शरीर का सदुपयोग धर्म, आत्मसाधना और परहित के कार्यों में किया जाना चाहिए। जब मनुष्य अपने जीवन और शरीर का उपयोग अच्छे कार्यों, धर्म और दूसरों के हित में करता है, तभी उसकी सार्थकता बढ़ती है।</p>
<h2><strong>श्रद्धा को संशय से कमजोर न होने दें</strong></h2>
<p>आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि अपनी धर्मश्रद्धा को संशय से कमजोर नहीं होने देना चाहिए। रत्नत्रयधारी मुनिराज के शरीर को देखने के बजाय उनके आत्मगुणों को देखें और उन गुणों के प्रति प्रीति रखें।</p>
<p>उन्होंने श्रद्धालुओं से निर्विचिकित्सा अंग को जीवन में धारण करने का आह्वान करते हुए कहा कि यही सच्ची धर्मश्रद्धा का मार्ग है।</p>
<h2><strong>मंगलाचरण से हुआ धर्मसभा का शुभारंभ</strong></h2>
<p>धर्मसभा का शुभारंभ श्रीमती शशी जैन के मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात समाज के सम्मानितजनों द्वारा भगवान के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया।</p>
<p>कार्यक्रम का मंच संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजबंधु एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज के मंगल प्रवचनों का भक्तिभावपूर्वक श्रवण किया।</p>
<p>धर्मसभा के माध्यम से आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धर्म में बाहरी स्वरूप से अधिक आत्मिक गुणों, त्याग, संयम और साधना का महत्व है। रत्नत्रयधारी मुनिराज के आत्मगुणों के प्रति श्रद्धा रखते हुए निर्विचिकित्सा अंग को जीवन में धारण करना ही सच्ची धर्मश्रद्धा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।</p>
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