श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चलेगा, मुनिराज के शरीर को नहीं उनके गुणों को देखें: आचार्य उदारसागर
निर्विचिकित्सा अंग की व्याख्या करते हुए बोले आचार्यश्री- शरीर स्वभाव से अशुद्ध, लेकिन आत्मगुण पवित्र; साधु की साधना, त्याग और रत्नत्रय के प्रति रखें श्रद्धा
रिपोर्टर: मनोज जैन नायक
मुरैना नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने श्रद्धा, आत्मसाधना और जैन धर्म के निर्विचिकित्सा अंग का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि श्रद्धा के स्थान पर संशय नहीं चल सकता। धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने वाले व्यक्ति को बाहरी परिस्थितियों अथवा शरीर के स्वरूप को देखकर अपनी श्रद्धा कमजोर नहीं करनी चाहिए।
आचार्यश्री ने निर्विचिकित्सा अंग की विस्तार से व्याख्या करते हुए इसे आत्मा की रक्षा करने वाला महत्वपूर्ण अंग बताया। उन्होंने कहा कि रत्नत्रयधारी दिगम्बर मुनिराज के शरीर को देखकर मन में ग्लानि अथवा संशय का भाव उत्पन्न नहीं होना चाहिए। इसके बजाय उनके सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र जैसे आत्मगुणों के प्रति श्रद्धा और प्रीति रखनी चाहिए।
शरीर अशुद्ध, लेकिन आत्मा के गुण पवित्र
आचार्य उदारसागर महाराज ने कहा कि शरीर का स्वभाव अलग है और आत्मा के गुणों की पवित्रता अलग है। शरीर स्वभाव से अशुद्ध हो सकता है, लेकिन साधक के आत्मगुण पवित्र होते हैं। इसलिए किसी साधु के शरीर को देखने के बजाय उनकी साधना, त्याग, तप और आत्मगुणों को देखना चाहिए।
उन्होंने कहा कि रत्नत्रयधारी मुनिराज अपने सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र के कारण पूजनीय एवं वंदनीय होते हैं। धर्म के प्रति सच्ची श्रद्धा रखने वाले व्यक्ति को बाहरी स्वरूप से प्रभावित होकर अपने भावों को बदलने के बजाय आत्मगुणों को पहचानना चाहिए।
नीम के उदाहरण से समझाया शरीर और स्वभाव का अंतर
आचार्यश्री ने अपनी बात को सरल तरीके से समझाने के लिए नीम का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि नीम स्वभाव से कड़वा होता है और वह अपनी प्रकृति को नहीं छोड़ता। उसकी कड़वाहट के बावजूद उसके अपने गुण और उपयोगिता होती है।
इसी प्रकार शरीर का स्वभाव जैसा है, वह वैसा ही रहेगा, लेकिन रत्नत्रयधारी मुनिराज के आत्मगुण और उनकी साधना उन्हें पूजनीय एवं वंदनीय बनाती है। इसलिए श्रद्धालुओं को बाहरी शरीर के बजाय साधु के भीतर विद्यमान गुणों को देखने की दृष्टि विकसित करनी चाहिए।
माला के उदाहरण से समझाया सम्मान के पीछे का भाव
धर्मसभा में आचार्य उदारसागर महाराज ने सम्मान समारोह में पहनाई जाने वाली माला का उदाहरण देते हुए भावों के महत्व को भी समझाया।
उन्होंने कहा कि यदि किसी व्यक्ति को सम्मान के दौरान माला पहनाई जाए और वह माला उतारकर वहीं रख दे। इसके बाद उसी माला को दूसरे व्यक्ति के सम्मान में पहना दिया जाए तो दूसरा व्यक्ति स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न कर सकता है कि किसी दूसरे के गले से उतारी गई माला उसे क्यों पहनाई गई? यदि सम्मान के लिए नई माला उपलब्ध नहीं थी तो उसे सम्मान के लिए बुलाने का औचित्य क्या था?
आचार्यश्री ने कहा कि इस उदाहरण से समझना चाहिए कि किसी वस्तु का केवल बाहरी स्वरूप महत्वपूर्ण नहीं होता, बल्कि उसके उपयोग, उद्देश्य और उसके पीछे छिपे भाव को समझना भी जरूरी है।
धर्म में बाहरी स्वरूप नहीं, गुणों की पहचान जरूरी

आचार्यश्री ने कहा कि धर्म में भी साधु के शरीर को देखकर धारणा नहीं बनानी चाहिए। उनके गुण, त्याग और आत्मसाधना को पहचानना चाहिए।
साधु का जीवन त्याग और संयम पर आधारित होता है। इसलिए उनके प्रति श्रद्धा भी उनके आत्मिक गुणों और साधना के आधार पर होनी चाहिए। शरीर को देखकर उत्पन्न होने वाले संशय अथवा ग्लानि के भाव से बचना निर्विचिकित्सा अंग की भावना को मजबूत करता है।
वादिराज मुनिराज और कड़वी तुमणी का सुनाया प्रसंग
प्रवचन के दौरान आचार्यश्री ने वादिराज मुनिराज से जुड़े प्रसंग का उल्लेख करते हुए शरीर और आत्मगुणों के अंतर को समझाया। उन्होंने कड़वी तुमणी का उदाहरण देते हुए कहा कि कड़वी तुमणी खाने योग्य नहीं होती। उसे खाने पर उल्टी तक हो सकती है, लेकिन वही तुमणी सूखने के बाद नदी पार कराने के काम आ सकती है।
उन्होंने कहा कि इस उदाहरण से यह शिक्षा मिलती है कि किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को केवल उसके बाहरी स्वरूप के आधार पर नहीं देखना चाहिए। उसके गुण, उपयोग और उद्देश्य को भी समझना आवश्यक है।
इसी तरह दिगम्बर मुनिराज के शरीर को देखने के बजाय उनके रत्नत्रय और आत्मसाधना पर दृष्टि रखनी चाहिए।
‘मनुष्य का शरीर तभी सार्थक, जब धर्म और परहित में आए काम’
आचार्य उदारसागर महाराज ने औदारिक शरीर के अर्थ पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ‘उदार’ का अर्थ केवल बड़ा होना नहीं है, बल्कि दूसरों के काम आना और उदारता का भाव रखना भी है।
मनुष्य को प्राप्त शरीर का सदुपयोग धर्म, आत्मसाधना और परहित के कार्यों में किया जाना चाहिए। जब मनुष्य अपने जीवन और शरीर का उपयोग अच्छे कार्यों, धर्म और दूसरों के हित में करता है, तभी उसकी सार्थकता बढ़ती है।
श्रद्धा को संशय से कमजोर न होने दें
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से कहा कि अपनी धर्मश्रद्धा को संशय से कमजोर नहीं होने देना चाहिए। रत्नत्रयधारी मुनिराज के शरीर को देखने के बजाय उनके आत्मगुणों को देखें और उन गुणों के प्रति प्रीति रखें।
उन्होंने श्रद्धालुओं से निर्विचिकित्सा अंग को जीवन में धारण करने का आह्वान करते हुए कहा कि यही सच्ची धर्मश्रद्धा का मार्ग है।
मंगलाचरण से हुआ धर्मसभा का शुभारंभ
धर्मसभा का शुभारंभ श्रीमती शशी जैन के मंगलाचरण से हुआ। इसके पश्चात समाज के सम्मानितजनों द्वारा भगवान के चित्र का अनावरण एवं दीप प्रज्वलन किया गया।
कार्यक्रम का मंच संचालन विद्वत् श्री नवनीत जैन शास्त्री ने किया। धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजबंधु एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। सभी ने आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज के मंगल प्रवचनों का भक्तिभावपूर्वक श्रवण किया।
धर्मसभा के माध्यम से आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि धर्म में बाहरी स्वरूप से अधिक आत्मिक गुणों, त्याग, संयम और साधना का महत्व है। रत्नत्रयधारी मुनिराज के आत्मगुणों के प्रति श्रद्धा रखते हुए निर्विचिकित्सा अंग को जीवन में धारण करना ही सच्ची धर्मश्रद्धा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
