सम्यग्दर्शन से जीवन बने सार्थक, रत्नत्रय की साधना ही आत्मकल्याण का मार्ग: आचार्यश्री उदारसागर
मुरैना के पार्श्वनाथ बड़ा मंदिर में वर्षायोग धर्मसभा, मुनिश्री उपशांतसागर ने बताई णमोकार महामंत्र की महिमा
मुरैना (मनोज जैन नायक)। पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में वर्षायोग के अंतर्गत गुरुवार को धर्मसभा आयोजित हुई। इसमें परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज और परम पूज्य मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्म, सम्यग्दर्शन, णमोकार महामंत्र और आत्मकल्याण का मार्ग बताया। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने संतों के मंगल प्रवचन श्रद्धापूर्वक सुने।
सम्यग्दर्शन से सार्थक होती है मनुष्य पर्याय
आचार्यश्री उदारसागर ने कहा कि वर्षायोग के दौरान लगातार सम्यग्दर्शन विषय को समझाया जा रहा है। उन्होंने बताया कि सम्यग्दर्शन के प्रभाव से जीव को श्रेष्ठ मनुष्य पर्याय मिलती है और उसमें ओज, तेज, विद्या, वीर्य, वृद्धि, विजय, कीर्ति और विभव जैसे गुण विकसित होते हैं। ऐसा जीव श्रेष्ठ कुल में जन्म लेकर मानवों में तिलक के समान शोभायमान होता है।
आचार्यश्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक का अर्थ स्पष्ट करते हुए कहा कि सम्यग्दर्शन से पवित्र हुआ जीव अनेक श्रेष्ठ गुणों से संपन्न होकर समाज में विशिष्ट स्थान प्राप्त करता है।
स्वर्ग का वैभव और चक्रवर्ती पद
दूसरे श्लोक के माध्यम से उन्होंने बताया कि सम्यग्दृष्टि और जिनेन्द्र भगवान के भक्त जीव अष्टगुणों से पुष्ट और संतुष्ट होकर स्वर्ग में विशिष्ट शोभा प्राप्त करते हैं। तीसरे श्लोक का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि सम्यग्दृष्टि जीव नवनिधि, सप्तद्वय रत्न और चक्रवर्ती जैसे महान पद और वैभव पाने में समर्थ होते हैं।
उन्होंने कहा कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल सांसारिक वैभव नहीं, बल्कि रत्नत्रय की प्राप्ति और आत्मकल्याण होना चाहिए। आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं का आह्वान किया कि दुर्लभ मनुष्य पर्याय को भोग-विलास में व्यर्थ न गंवाएं, बल्कि सम्यग्दर्शन की प्राप्ति, आत्मचिंतन और रत्नत्रय की साधना में जीवन लगाएं।
णमोकार महामंत्र परम सौभाग्य: मुनिश्री उपशांतसागर
मुनिश्री उपशांतसागर ने कहा कि सातिशय पुण्य के उदय से हमें जैन धर्म और णमोकार महामंत्र मिला है, जो परम सौभाग्य की बात है। उन्होंने कहा कि विडंबना यह है कि देश-विदेश के अनेक लोग इस महामंत्र का लाभ उठा रहे हैं, जबकि हम स्वयं इसकी महिमा और प्रभाव को पूरी तरह नहीं समझ पा रहे हैं।
मुनिश्री ने कहा कि णमोकार महामंत्र का जाप केवल मंदिर या धार्मिक स्थल पर बैठकर करने तक सीमित नहीं है। भयानक स्थान हो, मार्ग में संकट हो, पवित्र अवस्था हो या अपवित्र, हर परिस्थिति में इसका स्मरण किया जा सकता है। केवल बाहरी क्रिया करना जाप नहीं है, इसके पीछे श्रद्धा, एकाग्रता और शुद्ध भाव जरूरी हैं। सहज अंदाज में उन्होंने कहा, “मच्छर मारने से जाप नहीं होता।” इस कथन से श्रद्धालु हंस पड़े, साथ ही यह संदेश भी मिला कि मंत्र-जाप दिखावा नहीं, आंतरिक साधना है।
सर्प के सामने भी नहीं डिगी श्रद्धा
मुनिश्री ने महामंत्र की महिमा समझाने के लिए एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक मुस्लिम व्यक्ति के पलंग पर सर्प आ गया था। वह घबराने के बजाय णमोकार मंत्र का जाप करता रहा और सर्प ने उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। उन्होंने कहा कि णमोकार महामंत्र किसी जाति, वर्ग या क्षेत्र तक सीमित नहीं है। श्रद्धा और शुद्ध भाव से किया गया स्मरण भय और संकट की घड़ी में मानसिक शांति और निर्भयता देता है।
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से णमोकार महामंत्र के बाद चत्तारि मंगल का जाप भी करने को कहा। उन्होंने भगवान के समक्ष पांच पुञ्ज और जिनवाणी के समक्ष चार पुञ्ज चढ़ाने की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक क्रियाएं केवल परंपरा नहीं, बल्कि उनके भाव और उद्देश्य को समझकर करनी चाहिए। उन्होंने दिगम्बर समाज में 84 जातियों का भी उल्लेख किया।
संचालन और आयोजन
धर्मसभा का संचालन विद्वान नवनीत जैन शास्त्री ने किया। मंगलाचरण श्रीमती नीरज जैन ने प्रस्तुत किया। दीप प्रज्वलन और चित्र अनावरण सम्माननीय अतिथियों ने किया।
