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शुभ भाव, जीवदया और पुरुषार्थ से होता है आत्मकल्याण: मुनिश्री उपशांतसागर

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Published On: 27 October 2026
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शुभ भाव, जीवदया और पुरुषार्थ से होता है आत्मकल्याण: मुनिश्री उपशांतसागर

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने किया केशलोंच; बड़ा मंदिर में धर्मसभा का आयोजन

मनोज जैन नायक

मुरैना नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने धर्माचरण, शुभ भाव, कर्मनिर्जरा, जीवदया और पुरुषार्थ के महत्व पर प्रवचन दिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य को निराशा और अनावश्यक चिंता से बचने के लिए स्वयं को शुभ कार्यों और धार्मिक गतिविधियों में संलग्न रखना चाहिए। पुण्य कार्यों में प्रवृत्ति और आत्मकल्याण की भावना व्यक्ति को धर्ममार्ग पर आगे बढ़ाती है।

मुनिश्री ने कहा कि जीवन में परिस्थितियां हमेशा अनुकूल नहीं रहतीं, लेकिन प्रतिकूल समय में धैर्य, विवेक और सकारात्मक भाव बनाए रखना जरूरी है। व्यक्ति को निराश होकर बैठने के बजाय अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए सही दिशा में प्रयास जारी रखना चाहिए। शुभ भाव जीवन को बेहतर बनाने के साथ आत्मा की उन्नति का मार्ग भी प्रशस्त करते हैं।

राजा श्रेणिक के प्रसंग से समझाया पश्चाताप का महत्व

gggggggggggggggg 1मुनिश्री ने राजा श्रेणिक के प्रसंग के माध्यम से भावों और उनके परिणामों की महत्ता समझाई। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने विचारों और भावों के प्रति सजग रहना चाहिए, क्योंकि भाव ही उसके व्यवहार और कर्मों को प्रभावित करते हैं। जीवन में हुई भूल का बोध होने पर सच्चे हृदय से पश्चाताप करना चाहिए और भविष्य में शुभ भाव अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मन को निर्मल बनाने का प्रयास लगातार करना चाहिए। पश्चाताप केवल गलती स्वीकार करने तक सीमित नहीं है, बल्कि अपने व्यवहार में सुधार लाना और फिर से उसी भूल को न दोहराने का प्रयास करना भी इसका हिस्सा है। आत्मचिंतन और शुभ परिणामों की ओर बढ़ना आत्मकल्याण के लिए आवश्यक है।

धर्माचरण में दिखावे और मायाचारी से बचें

धार्मिक क्रियाओं में सरलता और निष्कपटता पर बल देते हुए मुनिश्री ने कहा कि धर्म का उद्देश्य आत्मा को निर्मल बनाना है। पूजा-पाठ, व्रत, विधान और अन्य धार्मिक कार्य तभी सार्थक होते हैं, जब उन्हें शुद्ध भाव से किया जाए। यदि इन क्रियाओं में छल-कपट, मायाचारी या दिखावे का भाव जुड़ जाए, तो उनकी आध्यात्मिक भावना प्रभावित होती है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया कि धर्म को केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित न रखें। विचारों और व्यवहार में भी सच्चाई, संयम और करुणा दिखाई देनी चाहिए। धर्माचरण की सार्थकता सरलता और आत्मशुद्धि के भाव से है।

सभी जीवों के प्रति करुणा रखने का संदेश

जीवदया और अहिंसा का महत्व बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि पशु-पक्षियों सहित प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार अलग-अलग प्रकार के दुखों का अनुभव करता है। मनुष्य का कर्तव्य है कि वह किसी भी जीव के प्रति क्रूरता न करे। पशुओं को मारना, जलाना या असहाय और गर्भवती जीवों को प्रताड़ित करना हिंसा का पीड़ादायक रूप है।

उन्होंने कहा कि प्रत्येक जीव के प्रति करुणा रखना और अहिंसा को अपने आचरण में उतारना सच्चे धर्म की पहचान है। जीवों के प्रति दया केवल उपदेश का विषय नहीं, बल्कि रोजमर्रा के व्यवहार में अपनाई जाने वाली भावना है। मनुष्य को अपने कार्यों में यह ध्यान रखना चाहिए कि उससे किसी जीव को अनावश्यक कष्ट न पहुंचे।

चिंता छोड़कर पुरुषार्थ करने की प्रेरणा

hhhhhhhhhhhhhकर्म और पुरुषार्थ की महत्ता पर मुनिश्री ने कहा कि परिस्थितियों से घबराने के बजाय व्यक्ति को सही दिशा में निरंतर प्रयास करना चाहिए। उन्होंने चिंता और चिता के अंतर को बताते हुए कहा कि चिता मृत व्यक्ति को जलाती है, जबकि चिंता जीवित व्यक्ति को भीतर ही भीतर जलाती रहती है। इसलिए अनावश्यक चिंता में ऊर्जा नष्ट करने के बजाय आत्मविश्वास, विवेक और पुरुषार्थ के साथ अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए।

आचार्यश्री उदारसागर महाराज का केशलोंच

धर्मसभा के अवसर पर परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने केशलोंच की आध्यात्मिक साधना संपन्न की। दिगम्बर श्रमण परंपरा में केशलोंच को तपस्या, त्याग, सहनशीलता और देह के प्रति ममत्व छोड़ने का प्रतीक माना जाता है। मुनिराज अपने हाथों से सिर के बालों का लोच कर संयम और वैराग्य के मार्ग को दृढ़ करते हैं।

इस साधना से श्रद्धालुओं को सुख-सुविधाओं के मोह से ऊपर उठने, कष्टों को समभाव से सहने और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिली। केशलोंच दिगम्बर मुनि जीवन में आत्मसंयम और तप की भावना को मजबूत करने वाली साधना है।

धर्मसभा का संचालन विद्वान पं. नवनीत जैन शास्त्री ने किया। शुभारंभ में रविन्द्र कुमार जैन ने मंगलाचरण प्रस्तुत किया। चित्र अनावरण और दीप प्रज्वलन अनिल कुमार जैन (अध्यक्ष), प्रेमचन्द जैन, रविन्द्र जैन, राजेन्द्र जैन (रज्जू) तथा नागेश जैन (शंकर बाजार) ने किया।

 

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