MP News: 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण का विरोध तेज, डॉक्टरों और संगठनों ने कहा—“मुनाफे के लिए अस्पताल नहीं सौंपे जा सकते”
MP में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। रीवा, देवास और गुना जिलों के कुल 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी संस्थाओं को सौंपने की सरकार की तैयारी का राज्यभर में विरोध शुरू हो गया है। इस फैसले के खिलाफ डॉक्टरों, कर्मचारी संगठनों और सामाजिक संस्थाओं ने एकजुट होकर मुख्यमंत्री को ज्ञापन सौंपते हुए इसे तत्काल वापस लेने की मांग की है।
निजीकरण के खिलाफ 12 संगठनों का मोर्चा
स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण के विरोध में कुल 12 संगठनों ने संयुक्त रूप से आवाज उठाई है। इन संगठनों ने मुख्यमंत्री और स्वास्थ्य मंत्री को ज्ञापन सौंपकर साफ कहा है कि स्वास्थ्य सेवाएं सरकार की जिम्मेदारी हैं और इन्हें किसी भी स्थिति में निजी कंपनियों को नहीं सौंपा जा सकता।
संगठनों का कहना है कि यदि अस्पतालों का संचालन मुनाफे के आधार पर होने लगा तो गरीब और ग्रामीण आबादी को इसका सबसे अधिक नुकसान होगा।
रीवा, देवास और गुना के 18 केंद्रों पर विवाद
सरकार की योजना के तहत रीवा, देवास और गुना जिलों के 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को निजी प्रबंधन के अधीन करने की तैयारी चल रही है। इसी को लेकर डॉक्टरों और कर्मचारियों में असंतोष बढ़ता जा रहा है।
विरोध करने वाले संगठनों का कहना है कि यह कदम स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर करेगा और ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सा सेवाओं की पहुंच पर नकारात्मक असर डालेगा।
पहले भी हो चुका है विरोध, योजनाएं वापस ली गईं
यह पहली बार नहीं है जब राज्य में स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण का विरोध हुआ हो। इससे पहले भी कई बार ऐसे प्रयासों पर विवाद हो चुका है।
- 2015 में अलीराजपुर जिला अस्पताल और जोबट सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र को निजी हाथों में देने का प्रयोग किया गया था, लेकिन विरोध के बाद इसे वापस लेना पड़ा।
- 2020-21 में नीति आयोग के प्रस्ताव पर जिला अस्पतालों के निजीकरण की योजना भी विरोध के चलते रोक दी गई थी।
- 2024-25 में भी जिला अस्पतालों के निजीकरण के प्रयास किए गए, लेकिन डॉक्टरों और कर्मचारियों के विरोध के कारण वह भी आगे नहीं बढ़ सका।
इन घटनाओं को देखते हुए संगठनों का कहना है कि सरकार को फिर से वही गलती नहीं दोहरानी चाहिए।
ज्ञापन में क्या कहा गया?
संयुक्त संगठन द्वारा दिए गए ज्ञापन में कहा गया है कि स्वास्थ्य सेवाओं का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि जनसेवा है। इसलिए इसे किसी भी निजी संस्था को सौंपना जनहित के खिलाफ होगा।
ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि निजीकरण से इलाज की लागत बढ़ सकती है और गरीब मरीजों को इलाज में कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।
डॉक्टरों का तर्क: सरकारी जिम्मेदारी है स्वास्थ्य सेवा
डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों का कहना है कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पहले से ही सीमित संसाधनों पर चल रही हैं। ऐसे में निजीकरण से स्थिति और खराब हो सकती है।
उनका कहना है कि सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर ध्यान देना चाहिए, न कि उन्हें निजी हाथों में सौंपने पर।
असली समस्या: संसाधनों की कमी
संगठनों ने यह भी बताया कि प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था में सबसे बड़ी समस्या संसाधनों की कमी है। पर्याप्त बजट और स्टाफ न होने के कारण कई केंद्रों में सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।
आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में—
- 4,134 उप-स्वास्थ्य केंद्रों की कमी
- 1,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी
- 245 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की कमी
बताई जा रही है।
डॉक्टरों का कहना है कि जब तक इन मूलभूत समस्याओं का समाधान नहीं होता, तब तक निजीकरण कोई स्थायी समाधान नहीं हो सकता।
सरकार की ओर से अभी कोई अंतिम निर्णय नहीं
हालांकि इस मुद्दे पर सरकार की ओर से अंतिम निर्णय को लेकर स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, लेकिन प्रस्तावित योजना पर विचार जारी है। वहीं दूसरी ओर विरोध बढ़ने के कारण सरकार पर दबाव भी बढ़ता जा रहा है।
निष्कर्ष
MP में 18 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के निजीकरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बनता जा रहा है। एक ओर सरकार इसे सुधारात्मक कदम के रूप में देख रही है, वहीं डॉक्टर और कर्मचारी संगठन इसे जनहित के खिलाफ बता रहे हैं। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार का रुख काफी अहम माना जा रहा है।
