धर्म के नाम पर दान करने से पहले सोचें: कहीं पुण्य की जगह पाप के भागीदार तो नहीं बन रहे?
हार्दिक हुंडिया की अपील: परमात्मा को धन की नहीं, जरूरतमंद साधर्मिक भाइयों को सहयोग की आवश्यकता है
धर्म के नाम पर दान, लेकिन उद्देश्य क्या है?
धर्म के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने से पहले हर धर्मप्रेमी को एक बार आत्मचिंतन अवश्य करना चाहिए। क्या हमारा दान वास्तव में धर्म की सेवा में लग रहा है, या फिर उसका उपयोग केवल नाम, सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए हो रहा है? हार्दिक हुंडिया ने अपने विचारों के माध्यम से जैन समाज के दानवीरों, श्रावकों और धर्मप्रेमियों से यही सवाल उठाया है।
उनका कहना है कि परमात्मा को पैसों की आवश्यकता नहीं है। जरूरत उन साधर्मिक भाइयों को है, जिन्हें आर्थिक सहयोग देकर आत्मनिर्भर और मजबूत बनाया जा सकता है। यदि समाज का कोई व्यक्ति आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहा है, तो उसकी सहायता करना भी धर्म का महत्वपूर्ण कार्य है।
जरूरतमंदों की मदद ही सच्चे धर्म की पहचान
हार्दिक हुंडिया ने गुजरात की एक प्रेरणादायक घटना का उल्लेख किया। वहां एक धर्मप्रेमी उद्योगपति ने लगभग 108 लोगों को एक लाख आठ हजार रुपये के चेक दिए। इस कार्य के लिए न कोई बड़ा कार्यक्रम आयोजित किया गया, न फोटो खिंचवाए गए और न ही सम्मान की अपेक्षा रखी गई। उनका उद्देश्य केवल जरूरतमंद साधर्मिक भाइयों को आर्थिक रूप से मजबूत करना था।
इसी तरह मुंबई की एक युवा श्राविका ने भगवान महावीर के जन्म वाचन के अवसर पर ऐसी जगह बोली लगाई, जहां संघ को वास्तव में आर्थिक सहयोग की जरूरत थी। दूसरे संघ की महिला ने जब उनसे पूछा कि वे अपने नियमित संघ में क्यों नहीं आईं, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्होंने वहां बोली लगाई, जहां धन की आवश्यकता थी।
ये घटनाएं बताती हैं कि धर्म का वास्तविक अर्थ दिखावा नहीं, बल्कि जरूरतमंदों की सहायता और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाना है।
जहां जरूरत नहीं, वहां करोड़ों का निर्माण क्यों?
हार्दिक हुंडिया ने धार्मिक निर्माण कार्यों को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जहां जैन समाज के परिवार ही नहीं हैं, वहां बड़े मंदिर, उपाश्रय, धर्मशालाएं और भोजनशालाएं बनाने से पहले उनकी वास्तविक उपयोगिता पर विचार किया जाना चाहिए।
यदि साधु-संतों के विहार मार्ग पर किसी स्थान पर छोटे मंदिर या उपाश्रय की आवश्यकता है, तो उसका निर्माण अवश्य होना चाहिए। लेकिन जहां पूजा करने वाले लोग नहीं हैं और सुविधाओं का उपयोग करने वाला कोई नहीं है, वहां करोड़ों रुपये खर्च करने का औचित्य क्या है?
उनका सवाल है कि जहां आवश्यक कार्य कुछ लाख रुपये में पूरा हो सकता है, वहां करोड़ों रुपये खर्च करने की जरूरत क्यों पड़ती है? दान देने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह समझना चाहिए कि उसके धन का उपयोग समाज और धर्म के हित में हो रहा है या नहीं।
ट्रस्टों के हिसाब-किताब में पारदर्शिता जरूरी
हार्दिक हुंडिया ने धार्मिक ट्रस्टों की आर्थिक पारदर्शिता पर भी जोर दिया। उनके अनुसार, दान देने वालों को यह जानने का अधिकार है कि उनका पैसा कहां खर्च हो रहा है, ट्रस्ट के बैंक खातों में कितनी राशि जमा है और आय-व्यय का हिसाब नियमित रूप से दिया जा रहा है या नहीं।
उन्होंने मुंबई के एक संघ से जुड़ी कथित घटना का उल्लेख करते हुए दावा किया कि बोली के माध्यम से एकत्रित लगभग डेढ़ करोड़ रुपये संघ में जमा नहीं कराए गए। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि संबंधित व्यक्ति ने स्वयं बोली की राशि का भुगतान नहीं किया। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, लेकिन ऐसी घटनाएं धार्मिक संस्थाओं में जवाबदेही और पारदर्शिता के महत्व को रेखांकित करती हैं।
दानदाताओं को केवल प्रतिष्ठा के अवसर पर बोली लगाकर अपनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं समझनी चाहिए, बल्कि धन के वास्तविक उपयोग की जानकारी भी लेनी चाहिए।
दान का उपयोग अहिंसा के सिद्धांतों के अनुरूप हो
हुंडिया ने दान की राशि के उपयोग से जुड़े एक अन्य महत्वपूर्ण प्रश्न की ओर ध्यान दिलाया। यदि धार्मिक ट्रस्टों में जमा धन का उपयोग किसी ऐसी गतिविधि को वित्तपोषित करने में होता है, जो जैन धर्म के अहिंसा सिद्धांतों के विपरीत है, तो दानदाताओं को इसकी जानकारी और जांच करनी चाहिए।
उनका कहना है कि जैन धर्म प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और अहिंसा की शिक्षा देता है। इसलिए दान का उपयोग भी धर्म के मूल सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए। ट्रस्टों को अपने निवेश, वित्तीय निर्णयों और खर्चों में पारदर्शिता रखनी चाहिए।
नाम और सम्मान से ऊपर उठकर करें धर्म की सेवा
हार्दिक हुंडिया ने देशभर के दानवीरों और परमात्मा के भक्तों से अपील की है कि वे दान देने से पहले उसकी उपयोगिता, आवश्यकता और परिणामों पर विचार करें। केवल नाम कमाने, सम्मान पाने या अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिए किया गया खर्च अपने आप में धर्म की सार्थकता सिद्ध नहीं करता।
भगवान महावीर ने राजसी वैभव और सांसारिक मोह का त्याग करके आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया। ऐसे में उनके नाम पर धन एकत्र करने और खर्च करने से पहले हमें उनके सिद्धांतों को समझना चाहिए।
अंत में हार्दिक हुंडिया का संदेश है कि परमात्मा को धन की नहीं, साधर्मिक भाइयों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है। यदि हम जरूरतमंदों की सहायता करें, धार्मिक संस्थाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करें और अहिंसा के सिद्धांतों के अनुरूप धन का उपयोग करें, तो हमारा दान समाज के लिए वास्तविक कल्याण का माध्यम बन सकता है।
दान देने से पहले अपनी आत्मा से एक सवाल जरूर पूछें—क्या मेरा धन सचमुच धर्म की सेवा कर रहा है? यही आत्मचिंतन सच्चे धर्म और जिम्मेदार दान की दिशा में पहला कदम है।
— हार्दिक हुंडिया, आपका कल्याणी मित्र
