दक्षिण में बीजेपी का मास्टर प्लान: Kerala फतह की जिम्मेदारी विनोद तावड़े के कंधों पर
भारतीय जनता पार्टी के लिए आने वाले महीनों में सियासी चुनौतियां बेहद अहम होने वाली हैं। पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने ऐसे समय में कमान संभाली है, जब देश के कई अहम राज्यों—पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुडुचेरी और Kerala —में विधानसभा चुनावों की तैयारी तेज हो चुकी है। इन राज्यों में बीजेपी के लिए चुनावी राह आसान नहीं मानी जा रही है, खासकर दक्षिण भारत के राज्यों में। राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के साथ ही नितिन नबीन ने संगठनात्मक स्तर पर तेज और बड़े फैसले लेने शुरू कर दिए हैं। चुनावी रणनीति को धार देने के लिए उन्होंने अनुभवी नेताओं को अलग-अलग राज्यों की जिम्मेदारी सौंपी है। इन्हीं फैसलों में सबसे अहम माना जा रहा है केरल विधानसभा चुनाव की कमान विनोद तावड़े को सौंपना।
Kerala चुनाव की जिम्मेदारी विनोद तावड़े को
बीजेपी के लिए Kerala हमेशा से सबसे कठिन राज्यों में से एक रहा है। इसी वजह से नितिन नबीन ने यहां किसी हल्के-फुल्के चेहरे पर भरोसा नहीं किया, बल्कि बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी को जीत दिलाने वाले विनोद तावड़े को केरल का प्रभारी बनाया है। उनके साथ शोभा करंदलाजे को सह प्रभारी नियुक्त किया गया है, जो कर्नाटक से आती हैं और दक्षिण भारत की राजनीति की गहरी समझ रखती हैं। इसके अलावा नितिन नबीन ने चंडीगढ़ मेयर चुनाव के लिए भी विनोद तावड़े को पर्यवेक्षक की जिम्मेदारी सौंपी है। यह साफ संकेत है कि पार्टी नेतृत्व को तावड़े की संगठनात्मक और चुनावी क्षमता पर पूरा भरोसा है।
अन्य राज्यों में भी बड़े फैसले
Kerala के साथ-साथ नितिन नबीन ने अन्य राज्यों में भी जिम्मेदारियां बांटी हैं।
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तेलंगाना नगर निकाय चुनाव के लिए आशीष शेलार को प्रभारी नियुक्त किया गया है, उनके साथ अशोक परनामी और रेखा शर्मा को सह प्रभारी बनाया गया है।
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ग्रेटर बेंगलुरु निकाय चुनाव की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेता राम माधव को सौंपी गई है, जबकि सतीश पुनिया और संजय उपाध्याय को सह प्रभारी बनाया गया है।
इन नियुक्तियों से साफ है कि बीजेपी ‘मिशन साउथ’ को लेकर गंभीर रणनीति पर काम कर रही है।
मिशन साउथ और Kerala की चुनौती
बीजेपी लंबे समय से दक्षिण भारत में अपनी सियासी जमीन मजबूत करने की कोशिश में जुटी है। कर्नाटक में सत्ता हासिल करने के बाद पार्टी की नजर अब तमिलनाडु और Kerala पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत पार्टी के तमाम शीर्ष नेता इन राज्यों पर लगातार फोकस बनाए हुए हैं। हालांकि, Kerala की राजनीति बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। यहां सत्ता की लड़ाई मुख्य रूप से कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) और लेफ्ट के नेतृत्व वाले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) के बीच सिमटी रही है। बीजेपी अब तक इस द्विपक्षीय राजनीति को तोड़ नहीं पाई है।
वोट प्रतिशत बढ़ा, लेकिन सत्ता दूर
बीजेपी Kerala में धीरे-धीरे अपनी मौजूदगी बढ़ाने में जरूर सफल रही है।
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2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी को करीब 14 फीसदी वोट मिले थे
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2019 में यह बढ़कर 16 फीसदी हो गया
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2024 में बीजेपी का वोट शेयर लगभग 20 फीसदी तक पहुंच गया
हालांकि, सत्ता तक पहुंचने के लिए पार्टी को अभी 20 से 30 और फिर 30 से 40 फीसदी वोट शेयर तक का सफर तय करना होगा। यही वजह है कि विनोद तावड़े के सामने यह टास्क बेहद कठिन माना जा रहा है।
क्या बिहार की तरह Kerala में भी खिलेगा कमल?
विनोद तावड़े के लिए Kerala की चुनौती बिहार से बिल्कुल अलग है। बिहार में जातीय समीकरण और गठबंधन राजनीति निर्णायक भूमिका निभाती है, जबकि केरल में धार्मिक और सामाजिक संतुलन कहीं अधिक जटिल है। Kerala में मुस्लिम और ईसाई समुदाय की कुल आबादी करीब 45 फीसदी है। बीजेपी अब तक इस वोट बैंक में प्रभावी सेंध लगाने में सफल नहीं हो पाई है। बिना इस वर्ग का भरोसा जीते सत्ता तक पहुंचना लगभग नामुमकिन माना जाता है।
जातीय समीकरण भी बड़ी चुनौती
Kerala की राजनीति में जातीय समीकरण भी अहम भूमिका निभाते हैं।
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नायर समुदाय, जो अपर कास्ट हिंदुओं में आता है, राज्य की आबादी का करीब 15 फीसदी है।
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एझवा समुदाय, जो पिछड़ा वर्ग माना जाता है, लगभग 28 फीसदी आबादी रखता है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन इसी समुदाय से आते हैं, जिससे यह LDF का मजबूत वोट बैंक माना जाता है।
सबरीमाला विवाद के बाद नायर समुदाय का एक हिस्सा बीजेपी की ओर झुकता जरूर दिखा, लेकिन यह झुकाव अब तक निर्णायक साबित नहीं हुआ है।
साक्षरता और राजनीतिक समझ भी फैक्टर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि Kerala में बीजेपी की कमजोरी का एक कारण यहां की उच्च साक्षरता दर भी है। केरल देश के सबसे शिक्षित राज्यों में शामिल है। यहां के मतदाता भावनात्मक मुद्दों से ज्यादा नीतियों, विचारधाराओं और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखकर वोट करते हैं।
अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंधमारी जरूरी
Kerala के ईसाई और मुस्लिम वोट बैंक को पारंपरिक रूप से कांग्रेस नेतृत्व वाले UDF का समर्थक माना जाता है। बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह इस 45 फीसदी वोट बैंक में किस हद तक भरोसा बना पाती है। अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विनोद तावड़े अपने अनुभव और रणनीति के दम पर केरल में बीजेपी की किस्मत बदल पाते हैं या नहीं। नितिन नबीन के लिए भी यह फैसला उनकी नेतृत्व क्षमता की पहली बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।
