शुभ कार्यों का अवसर मिलना पुण्य का उदय, धन का सदुपयोग ही जीवन की सार्थकता: आचार्यश्री उदारसागर
Morena (मनोज जैन नायक)
धन की प्राप्ति नहीं, सदुपयोग है असली उपलब्धि
नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि जीवन में धन-संपत्ति मिल जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं है। असली महत्व इस बात का है कि उस संपत्ति का उपयोग धर्म, परोपकार और आत्मकल्याण के कार्यों में किया जाए। उन्होंने कहा कि पूजन, विधान, अनुष्ठान और मांगलिक आयोजनों में सहभागी बनने का अवसर मिलना भी पुण्य के उदय का प्रतीक है। प्रत्येक व्यक्ति को ऐसे अवसरों का महत्व समझते हुए श्रद्धा और समर्पण के साथ उनका लाभ उठाना चाहिए।
धर्म के प्रति रुचि धन पर निर्भर नहीं
आचार्यश्री ने कहा कि संसार में अनेक लोग ऐसे हैं, जिनके पास अपार धन-संपत्ति और भौतिक सुख-सुविधाएं हैं, लेकिन वे धार्मिक कार्यों में अपेक्षित रुचि नहीं रखते। दूसरी ओर, सीमित साधनों वाला व्यक्ति भी अपनी श्रद्धा, भक्ति और उत्साह से धर्मप्रभावना में महत्वपूर्ण योगदान देता है। इससे स्पष्ट होता है कि धार्मिक कार्यों की सार्थकता केवल धन की उपलब्धता पर नहीं, बल्कि व्यक्ति की भावना, आस्था और पुण्य के संयोग पर भी निर्भर करती है। जब भी जिनेंद्र भगवान की आराधना, अभिषेक-पूजन या विधान कराने का अवसर मिले, उसे सामान्य घटना न मानकर जीवन का सौभाग्य समझना चाहिए।
लक्ष्मी का स्वभाव चंचल
उन्होंने कहा कि लक्ष्मी का स्वभाव चंचल है। आज जो संपत्ति किसी के पास है, जरूरी नहीं कि वह हमेशा उसी के पास बनी रहे। इसलिए धन के संग्रह और प्रदर्शन में जीवन की ऊर्जा लगाने के बजाय उसके सदुपयोग पर ध्यान देना चाहिए। धन को केवल अपने सुख-साधनों तक सीमित रखना उसकी उपयोगिता को संकुचित करना है। जरूरतमंदों की सहायता, शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग, असहायों को भोजन उपलब्ध कराना, जीवदया के कार्य और धार्मिक संस्कारों को प्रोत्साहन देना ऐसे कार्य हैं, जिनसे संपत्ति का वास्तविक महत्व सामने आता है। धन तभी सार्थक बनता है, जब वह स्वयं के साथ दूसरों के जीवन में भी सकारात्मक बदलाव का माध्यम बने।

धनवान होना अनिवार्य नहीं
आचार्यश्री ने कहा कि धर्मकार्यों में योगदान के लिए धनवान होना जरूरी नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार सेवा और परोपकार कर सकता है। जिसके पास अधिक संसाधन हैं, वह बड़े स्तर पर सहयोग कर सकता है और जिसके पास सीमित साधन हैं, वह अपने समय, श्रम और सद्भावना से धर्मप्रभावना में हाथ बंटा सकता है। पुण्य कार्यों में बाहरी वैभव की अपेक्षा भावों की निर्मलता, विनम्रता और सेवा का संकल्प अधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य को अपनी उपलब्धियों पर अहंकार करने के बजाय उन्हें अच्छे कार्यों में लगाने की प्रेरणा लेनी चाहिए।
पूजा के साथ आचरण का निरीक्षण
धार्मिक विधान और अनुष्ठान केवल परंपरा निभाने के लिए नहीं होते। उनका उद्देश्य मनुष्य को धर्म के निकट लाना और उसके भीतर सद्भावनाओं का विकास करना भी है। आचार्यश्री ने कहा कि भगवान की पूजा-अर्चना के साथ व्यक्ति को अपने आचरण का भी निरीक्षण करना चाहिए। यदि पूजा के बाद भी व्यवहार में क्रोध, मान, माया, लोभ और अहंकार बना रहता है, तो आत्मचिंतन की आवश्यकता है। धर्म का प्रभाव जीवन में तभी दिखाई देता है, जब व्यवहार में अहिंसा, संयम, विनय, करुणा और परस्पर सम्मान की भावना विकसित हो।
पुण्य-पाप के प्रति सजगता
उन्होंने कहा कि मनुष्य को पुण्य और पाप के स्वरूप को समझकर अपने हर कार्य के प्रति सजग रहना चाहिए। स्वार्थ और संग्रह की प्रवृत्ति व्यक्ति को सांसारिक मोह में बांधती है, जबकि त्याग, सेवा, संयम और परोपकार की भावना उसे आत्मकल्याण की दिशा में प्रेरित करती है। जीवन की वास्तविक उपलब्धि भौतिक संपन्नता नहीं, बल्कि विचारों की पवित्रता और आचरण की श्रेष्ठता है।

आचार्यश्री का संदेश
अंत में आचार्यश्री ने कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों में सहभागी बनने का अवसर मिले, तो उसे पुण्य का निमित्त मानकर श्रद्धापूर्वक स्वीकार करना चाहिए। धन-संपत्ति का गौरव उसके संग्रह में नहीं, बल्कि उसके विवेकपूर्ण और सद्कार्यों में उपयोग में है। सांसारिक वैभव यहीं रह जाता है, लेकिन मनुष्य के भाव, आचरण और कर्म उसके जीवन की दिशा तय करते हैं। इसलिए हर व्यक्ति को धर्म के प्रति आस्था बनाए रखते हुए अपनी सामर्थ्य के अनुरूप धार्मिक, सामाजिक और परोपकारी कार्यों में योगदान देना चाहिए।
