ज्ञान के साथ आचरण जरूरी, तभी सार्थक होगा जीवन: आचार्यश्री उदारसागर
1 नवंबर को होगा आचार्यश्री ज्ञानसागर निलय संत निवास का उद्घाटन
मुरैना (मनोज जैन नायक)। श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने कहा कि ज्ञान तभी सार्थक होता है, जब उसे आचरण में उतारा जाए। ज्ञान मनुष्य को सही मार्ग दिखाता है, लेकिन उस मार्ग पर चलकर लक्ष्य तक पहुंचने के लिए सदाचार और आत्मअनुशासन जरूरी हैं। केवल शास्त्रों का अध्ययन कर लेना या धार्मिक बातें सुनना पर्याप्त नहीं है; उनके संदेश को अपने व्यवहार में अपनाना भी आवश्यक है।
सही दिशा में चलना ही जीवन की सफलता
आचार्यश्री ने कॉलेज के एक छात्र का उदाहरण देते हुए समझाया कि कम्पास बॉक्स में नक्शा और शीशा भी होता है। नक्शा रास्ता दिखा सकता है, लेकिन सही दिशा जानने के लिए पहले यह समझना जरूरी है कि व्यक्ति स्वयं कहां भटका है। यदि अपनी स्थिति और दिशा का बोध ही न हो, तो नक्शा पास होने के बावजूद मंजिल तक पहुंचना कठिन हो सकता है। इसी तरह शास्त्र मनुष्य को जीवन का उद्देश्य और सही मार्ग बताते हैं। संसार की भटकन से बचने के लिए व्यक्ति को आत्मचिंतन करते हुए अपने लक्ष्य को समझना चाहिए।
उन्होंने कोल्हू के बैल का उदाहरण देकर कहा कि बैल दिनभर चलता रहता है और उसे लगता है कि उसने लंबी दूरी तय कर ली है। आंखों की पट्टी हटने पर पता चलता है कि वह उसी स्थान पर घूम रहा था। मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही हो सकता है। वह दिनभर काम और भागदौड़ में लगा रहे, लेकिन यदि उसके प्रयास सही दिशा में न हों तो वह अपने वास्तविक लक्ष्य से दूर रह सकता है। जीवन की सफलता केवल लगातार चलते रहने में नहीं, बल्कि सही दिशा में आगे बढ़ने में है।
आचरण से प्रकट होता है ज्ञान
आचार्यश्री ने राजपुरोहित के प्रसंग के माध्यम से बताया कि व्यक्ति का सम्मान केवल उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके आचरण से भी तय होता है। जो दूसरों को धर्म और सदाचार का उपदेश देता है, उसके अपने जीवन में भी उन सिद्धांतों का पालन दिखाई देना चाहिए। ज्ञान तभी प्रभावी बनता है, जब वह व्यक्ति के व्यवहार और चरित्र में प्रकट हो। शास्त्रों का अध्ययन करने के साथ उनके संदेश को जीवन में अपनाना ही वास्तविक साधना है।
धर्मसभा में मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने भी ज्ञान और आचरण के संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि शास्त्र पढ़ना, प्रवचन सुनना और धर्म की बातें करना अच्छी बात है, लेकिन यदि इनसे विचारों और व्यवहार में बदलाव न आए, तो आत्मकल्याण का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह व्यक्ति के जीवन में दिखाई दे।
ज्ञान को व्यवहार में उतारने का संदेश
मुनिश्री ने भोजन का उदाहरण देते हुए कहा कि भोजन के बारे में जानने भर से भूख शांत नहीं होती; उसके लिए भोजन करना आवश्यक है। उसी प्रकार धर्म का ज्ञान प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं, बल्कि उसे जीवन में धारण करना जरूरी है। यदि मनुष्य क्रोध, मान, माया, लोभ और कषायों से घिरा रहता है, तो उसे अपने ज्ञान और व्यवहार पर विचार करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि धर्म का प्रभाव व्यक्ति की विनम्रता, वाणी और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी यदि विचारों में विनम्रता, वाणी में मधुरता और व्यवहार में करुणा न आए, तो आत्मचिंतन की जरूरत है। सच्चा ज्ञान अहंकार को कम करता है, विवेक को बढ़ाता है और व्यक्ति को सदाचार की ओर ले जाता है। मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से शास्त्रों में बताए सिद्धांतों को केवल सुनने या पढ़ने तक सीमित न रखने और उन्हें दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।
धर्मसभा में दोनों संतों के प्रवचनों ने श्रद्धालुओं को ज्ञान, आत्मचिंतन और सदाचरण का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि ज्ञान और आचरण का समन्वय ही आत्मविकास का मार्ग है। जब व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार को धर्म के अनुरूप बनाने का प्रयास करता है, तभी उसका जीवन सार्थक बनता है।
महावीर दिगंबर जैन नसियांजी में होगा उद्घाटन
अम्बाह रोड पर फाटक बाहर स्थित श्री महावीर दिगंबर जैन नसियांजी मंदिर में 1 नवंबर को आचार्यश्री उदारसागर महाराज एवं मुनिश्री उपशांतसागर महाराज के ससंघ सान्निध्य में संत निवास का उद्घाटन किया जाएगा। मंदिर परिसर में नवनिर्मित संत निवास का नाम “आचार्यश्री ज्ञानसागर निलय” रखा गया है। कार्यक्रम सुबह 8 बजे आयोजित होगा।
जैन बगीची के नसियांजी जिनालय में निर्मित इस संत निवास के निर्माण में नगर के श्रावक श्रेष्ठी महेशचंद्र बंगाली, पवन जैन इंडस्ट्रीज और सकल जैन समाज का विशेष सहयोग रहा है। उद्घाटन कार्यक्रम संतों के सान्निध्य में संपन्न होगा। आयोजन के समापन पर उपस्थित श्रद्धालुओं के लिए स्वल्पाहार की व्यवस्था भी रखी गई है।
