त्याग, तपस्या और साहित्य साधना की प्रेरक साधिका हैं गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी
57वें अवतरण दिवस पर विशेष आलेख
मनोज जैन नायक
मुरैना। भारतीय जैन श्रमण परंपरा में पूज्य गणिनी आर्यिका श्री 105 स्वस्तिभूषण माताजी का जीवन त्याग, तपस्या, विद्वत्ता और धर्मप्रभावना का प्रेरक उदाहरण है। उन्होंने संयम, स्वाध्याय, साहित्य सृजन, संस्कार निर्माण और जिनशासन की प्रभावना को अपने जीवन का ध्येय बनाया। गुरु के प्रति समर्पण और जन-जन तक आध्यात्मिक चेतना पहुंचाने की उनकी साधना अनेक लोगों को धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। 1 नवंबर को उनका 57वां अवतरण दिवस मनाया जाएगा।
धर्ममय संस्कारों में बीता बाल्यकाल
पूज्य माताजी का जन्म 1 नवंबर 1969 को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा-सिवनी क्षेत्र में श्रेष्ठी श्री मोतीलाल जैन और श्रीमती पुष्पा देवी जैन के परिवार में हुआ। परिवार ने उनका नाम संगीता रखा, लेकिन घर में सभी उन्हें प्यार से ‘गुड़िया’ कहकर पुकारते थे। बचपन से ही उनका झुकाव देवदर्शन, पूजन और जैन साधु-संतों की सेवा की ओर था। परिवार से मिले धार्मिक संस्कारों ने उनके मन में संयम और आध्यात्मिक जीवन के प्रति रुचि को मजबूत किया।
उनके जीवन की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि उनके पिता क्षुल्लक श्री परिणामसागर जी और माता क्षुल्लिका श्री अर्हतमती माताजी भी संयम साधना में रत हैं। इस प्रकार उनके परिवार का वातावरण धर्म, साधना और त्याग की भावना से जुड़ा रहा।
उच्च शिक्षा के बाद संयम मार्ग की ओर
संगीता जी ने संस्कृत विषय में एम.ए. की शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने हिंदी, संस्कृत, प्राकृत और अंग्रेजी भाषाओं का भी अध्ययन किया। लौकिक शिक्षा पूरी करने के बाद उनके जीवन में आध्यात्मिक साधना का मार्ग और अधिक स्पष्ट हुआ। उन्होंने आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज से ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया और आचार्य श्री विद्याभूषण सन्मतिसागर महाराज के संघ में रहकर शास्त्रों का गहन अध्ययन किया।
24 जनवरी 1996 को इटावा में आचार्य श्री 108 विद्याभूषण सन्मतिसागर महाराज से आर्यिका दीक्षा ग्रहण करने के बाद उन्हें आर्यिका श्री स्वस्तिभूषण माताजी नाम मिला। दीक्षा के बाद उन्होंने साधना, स्वाध्याय और धर्मप्रचार को अपने जीवन का प्रमुख आधार बनाया। सम्मेद शिखरजी की लगातार 121 वंदनाएं कर उन्होंने तीर्थभक्ति और साधना के प्रति अपनी निष्ठा का उदाहरण प्रस्तुत किया।
साहित्य सृजन से धर्म और ज्ञान का प्रसार
पूज्य माताजी साधना के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी सक्रिय रही हैं। उन्होंने विधान, पूजन, काव्य और गद्य से जुड़े साहित्य का सृजन किया और अनेक कृतियों के प्रकाशन में योगदान दिया। उनकी प्रमुख कृति ‘जिनपद पूजांजलि’ में जैन पूजा-पाठ, विधान, आरती, चालीसा और स्तोत्र आदि को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। इससे पाठकों और श्रद्धालुओं को धार्मिक सामग्री सहज रूप में उपलब्ध हुई।
उनकी विद्वत्ता और साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें ‘परम विदुषी लेखिका’, ‘काव्य रत्नाकर’, ‘भारत गौरव’ और ‘युगप्रवर्तिका’ जैसी उपाधियों से सम्मानित किया गया है। उनके साहित्य और प्रवचनों में धर्म के सिद्धांतों को जीवन के व्यवहार से जोड़ने पर बल दिया जाता है।
‘शुभकामना परिवार’ के माध्यम से संस्कारों की पहल
धर्म और संस्कारों को व्यापक स्तर पर पहुंचाने के उद्देश्य से 1 जनवरी 2009 को दिल्ली की बिहारी कॉलोनी से ‘शुभकामना परिवार’ का शुभारंभ हुआ। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, आज देश के विभिन्न क्षेत्रों में इसकी 500 से अधिक शाखाएं संचालित हैं। नेपाल में भी इसकी एक शाखा गठित हुई है।
इस पहल के माध्यम से लोगों को धार्मिक गतिविधियों, संस्कारों और सकारात्मक जीवन मूल्यों से जोड़ने का प्रयास किया गया। पूज्य माताजी की प्रेरणा से विभिन्न स्थानों पर साधना और संस्कार से जुड़े आयोजन होते रहे हैं। इनमें बाल साधना संस्कार शिविर, ज्ञान-ध्यान शिविर और ध्यान-योग शिविर शामिल हैं।
युवाओं और समाज को सकारात्मक दिशा
पूज्य माताजी ने विद्यार्थियों और युवाओं को नैतिकता, आत्मचिंतन और सकारात्मक जीवन मूल्यों से जोड़ने के लिए अनेक अवसरों पर मार्गदर्शन दिया। कोटा में मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हजारों विद्यार्थियों को संबोधित कर उन्होंने उन्हें कठिन परिश्रम, अनुशासन और जीवन में संतुलन का संदेश दिया। उन्होंने देश की विभिन्न जेलों में भी प्रवचन दिए और आत्मचिंतन के माध्यम से जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा दी।
युवा प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 13 मार्च 2021 को स्वस्तिधाम में डॉ. उज्ज्वल पाटनी के माध्यम से युवा सेमिनार आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में देशभर से हजारों युवाओं ने सहभागिता की। इस तरह के आयोजनों के जरिए युवाओं को अपनी क्षमताओं को पहचानने और जीवन में अच्छे मूल्यों को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
स्वस्तिधाम और तीर्थ निर्माण में योगदान
राजस्थान के जहाजपुर स्थित श्री 1008 मुनिसुव्रतनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र स्वस्तिधाम पूज्य माताजी की प्रेरणा से जुड़ा प्रमुख धार्मिक केंद्र है। यहां भूगर्भ से प्रकटित भगवान मुनिसुव्रतनाथ की प्रतिमा श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी हुई है। जहाज के आकार में निर्मित इस मंदिर को गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स और इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में स्थान मिलने की जानकारी दी गई है।
पूज्य माताजी ने देश के विभिन्न नगरों में समवशरण, सम्मेद शिखरजी, कैलास पर्वत और पावापुरीजी की प्रतिकृतियों के निर्माण के साथ अनेक जिनालयों के जीर्णोद्धार और नए मंदिरों के निर्माण के लिए भी प्रेरणा दी है। 13 फरवरी 2020 को स्वस्तिधाम में छाणी परंपरा के षष्ठ पट्टाचार्य, सराकोद्धारक आचार्य श्री 108 ज्ञानसागर महाराज ने उन्हें गणिनी पद से अलंकृत किया।
मुरैना के ज्ञानतीर्थ से जुड़ी धर्मप्रभावना
मुरैना स्थित श्री आदिनाथ दिगंबर जैन ज्ञानतीर्थ क्षेत्र में 1 से 6 फरवरी 2023 तक श्री आदिनाथ जिनबिंब मज्जिनेन्द्र पंचकल्याणक महोत्सव आयोजित हुआ। यह आयोजन पूज्य माताजी के मार्गदर्शन और प्रेरणा से संपन्न हुआ। महोत्सव ने क्षेत्र में धार्मिक चेतना और सामूहिक सहभागिता को प्रोत्साहित किया तथा जिनशासन की प्रभावना को नई ऊर्जा दी।
संयम, करुणा और आत्मशुद्धि का संदेश
पूज्य गणिनी आर्यिका स्वस्तिभूषण माताजी का जीवन त्याग, तपस्या, साहित्य साधना और लोककल्याण की भावना का समन्वित स्वरूप है। उनकी प्रेरणा है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहे, बल्कि आत्मशुद्धि, सदाचार, संयम और करुणा के रूप में व्यक्ति के जीवन में दिखाई दे।
57वें अवतरण दिवस के पावन अवसर पर त्यागमयी, विदुषी और धर्मप्रभाविका गणिनी आर्यिका श्री 105 स्वस्तिभूषण माताजी के चरणों में शत-शत नमन। उनकी साधना समाज को आध्यात्मिक दिशा देती रहे और जिनशासन की प्रभावना निरंतर बढ़ती रहे—यही मंगलकामना है।
