पूर्णाहुति और कन्या भोज के साथ संपन्न हुआ नौ दिवसीय शतचंडी महायज्ञ
महाआरती और आतिशबाजी में शामिल हुए हजारों श्रद्धालु, नौ दिनों में दो लाख भक्तों ने किए दर्शन
संवाददाता, गौतम साल्वे
मंडलेश्वर। नवरात्रि के अंतिम दिन विंध्याचल पर्वत की गोद में स्थित सिद्धपीठ मां आशापुरी धाम में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ी। यहां नौ दिवसीय शतचंडी महायज्ञ का समापन वैदिक मंत्रोच्चार के बीच पूर्णाहुति और कन्या भोज के साथ हुआ। यज्ञाचार्य पंडित विपिन पंचोली, कांटाफोड़ ने अनुष्ठान संपन्न कराया।
समापन अवसर पर मंदिर परिसर को आकर्षक रोशनी से सजाया गया। भव्य आतिशबाजी के बीच विशेष महाआरती हुई, जिसमें दूर-दराज से आए श्रद्धालु शामिल हुए। नवरात्रि के नौ दिनों में आसपास के गांवों से चुनरी यात्राएं भी मां के दरबार पहुंचीं। इंदौर संभाग के अलावा राजस्थान और महाराष्ट्र सहित अन्य राज्यों से आए भक्तों ने मां आशापुरी के दर्शन कर आशीर्वाद लिया। आयोजकों के अनुसार, नौ दिनों में करीब दो लाख श्रद्धालुओं ने धाम में दर्शन किए।
25 क्विंटल खिचड़ी और घी के हलवे की महाप्रसादी
आयोजन के दौरान श्रद्धालुओं के लिए महाप्रसादी की व्यवस्था की गई। भक्तों को 25 क्विंटल साबूदाना खिचड़ी और एक क्विंटल शुद्ध घी का हलवा वितरित किया गया। बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने प्रसादी ग्रहण की। पूर्णाहुति, कन्या भोज और महाआरती के साथ धाम में नवरात्रि का समापन भक्तिभाव से हुआ।
महेश्वर से 13 किलोमीटर दूर स्थित है आशापुरी धाम
मां आशापुरी धाम महेश्वर से करीब 13 किलोमीटर उत्तर और इंदौर हाईवे से लगभग 9 किलोमीटर दूर स्थित है। इस सिद्धपीठ का पौराणिक इतिहास भी बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में पांडु पुत्र अर्जुन ने यहां कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर मां आशापुरी स्वयंभू रूप में प्रकट हुई थीं। लोककथाओं में वीर आल्हा और उदल द्वारा भी यहां तपस्या कर आशीर्वाद प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है।
मां आशापुरी को मांडव के वीरों, ओंकारेश्वर के राजा मांधाता के वंशजों और सम्राट पृथ्वीराज चौहान के वंशजों सहित 28 गोत्रों की कुलदेवी के रूप में पूजा जाता है।
गर्भगृह में विराजित हैं त्रिदेवी
मंदिर के मुख्य गर्भगृह में महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के स्वरूप विराजित हैं। इनके साथ गणेशजी, नवग्रह और सप्तमातृकाओं की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। मंदिर परिसर में शिवजी और भैरव बाबा की प्रतिमाएं भी हैं।
मंदिर से जुड़ी कुछ मान्यताएं और ऐतिहासिक विवरण आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय हैं। परिसर में मौजूद प्राचीन शिलालेख को पढ़ने के लिए भोपाल से आई पुरातत्व विभाग की टीम भी प्रयास कर चुकी है। मंदिर क्षेत्र की चार प्राचीन बावड़ियों में से एक के बारे में मांडू तक गुप्त गुफा मार्ग होने की मान्यता है।
वर्ष 2012 में हुआ था मंदिर का जीर्णोद्धार
बताया जाता है कि गुफानुमा पत्थरों से बने इस मंदिर का पहला जीर्णोद्धार करीब 800 वर्ष पहले हुआ था। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए वर्ष 2012 में संत मोनी बाबा के सानिध्य में मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया गया। नवरात्रि के समापन पर धाम में पहुंचे श्रद्धालुओं ने मां आशापुरी के दर्शन कर सुख-समृद्धि की कामना की।### Sources:
