मध्य प्रदेश में 1 नवंबर से पेपरलेस होंगे सरकारी अस्पताल, मोबाइल पर मिलेगा ओपीडी पर्चा; तैयारियों पर उठे सवाल
मेडिकल कॉलेज से लेकर उप स्वास्थ्य केंद्र तक डिजिटल सेवाएं लागू करने की योजना
भोपाल। मध्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल बनाने की दिशा में राज्य सरकार बड़ा बदलाव करने जा रही है। स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस यानी 1 नवंबर 2026 से प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में पेपरलेस व्यवस्था लागू करने की योजना बनाई है। इसके तहत मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध अस्पतालों से लेकर उप स्वास्थ्य केंद्रों तक विभिन्न स्वास्थ्य सेवाओं को डिजिटल माध्यम से संचालित किया जाएगा।
नई व्यवस्था लागू होने के बाद मरीजों को ओपीडी पर्चा कागज पर देने के बजाय उनके मोबाइल पर उपलब्ध कराया जाएगा। मरीज का पंजीयन, उपचार से संबंधित विवरण और अस्पताल की अन्य सेवाओं को भी चरणबद्ध तरीके से डिजिटल प्रणाली से जोड़ने की योजना है।
सरकार की यह पहल स्वास्थ्य व्यवस्था को आधुनिक, पारदर्शी और सुविधाजनक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, कर्मचारियों के पर्याप्त प्रशिक्षण और आवश्यक डिजिटल संसाधनों की उपलब्धता को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं।
मोबाइल पर उपलब्ध होगा ओपीडी पर्चा
पेपरलेस व्यवस्था लागू होने के बाद सरकारी अस्पतालों की ओपीडी में उपचार के लिए पहुंचने वाले मरीजों को डिजिटल पर्चा दिया जाएगा। पंजीयन के दौरान मरीज का मोबाइल नंबर दर्ज किया जाएगा और ओपीडी से संबंधित जानकारी उसके फोन पर उपलब्ध कराई जाएगी।
इस व्यवस्था से मरीजों को कागज का पर्चा संभालकर रखने की परेशानी कम हो सकती है। भविष्य में अस्पताल आने पर उनके पिछले उपचार और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी डिजिटल रिकॉर्ड के माध्यम से देखी जा सकेगी। इससे डॉक्टरों को मरीज के पुराने इलाज को समझने और उसके अनुसार आगे की सलाह देने में सुविधा मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, प्रदेश के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले ऐसे मरीजों के लिए व्यवस्था चुनौतीपूर्ण हो सकती है, जिनके पास स्मार्टफोन नहीं है या जिन्हें डिजिटल सेवाओं का उपयोग करना नहीं आता। ऐसे लोगों को सहायता उपलब्ध कराने के लिए अस्पतालों में अलग व्यवस्था की आवश्यकता पड़ सकती है।
बिहार मॉडल की तर्ज पर लागू होगा HMIS
मध्य प्रदेश में प्रस्तावित डिजिटल स्वास्थ्य व्यवस्था को बिहार मॉडल की तर्ज पर लागू किए जाने की तैयारी है। इसके लिए हॉस्पिटल मैनेजमेंट इन्फॉर्मेशन सिस्टम यानी HMIS सॉफ्टवेयर का उपयोग किया जाएगा।
HMIS एक डिजिटल प्रणाली है, जिसके माध्यम से अस्पताल की विभिन्न सेवाओं और मरीजों से संबंधित जानकारी को एक स्थान पर दर्ज एवं संचालित किया जा सकता है। इससे मरीजों के पंजीयन, ओपीडी सेवाओं, जांच, उपचार और अन्य संबंधित प्रक्रियाओं को डिजिटल रूप दिया जा सकता है।
इस प्रणाली का उद्देश्य अस्पतालों में कागज के उपयोग को कम करने के साथ कामकाज को अधिक व्यवस्थित बनाना है। डिजिटल रिकॉर्ड तैयार होने से मरीजों के इलाज से जुड़ी जानकारी सुरक्षित रखने और आवश्यकता पड़ने पर उसे शीघ्र प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
मेडिकल कॉलेज से उप स्वास्थ्य केंद्र तक लागू होगी व्यवस्था
स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग ने केवल बड़े सरकारी अस्पतालों तक इस योजना को सीमित नहीं रखा है। इसे मेडिकल कॉलेजों से संबद्ध अस्पतालों, जिला अस्पतालों, सिविल अस्पतालों, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप स्वास्थ्य केंद्रों तक लागू करने की योजना है।
इसका अर्थ है कि प्रदेश के शहरी क्षेत्रों के साथ ग्रामीण इलाकों में संचालित छोटी स्वास्थ्य इकाइयों को भी डिजिटल प्रणाली से जुड़ना होगा। योजना सफलतापूर्वक लागू होने पर राज्य के विभिन्न स्तरों पर संचालित स्वास्थ्य केंद्रों के कामकाज में एकरूपता आ सकती है।
ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी, बिजली की उपलब्धता और तकनीकी उपकरणों की स्थिति इस योजना की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। जिन क्षेत्रों में इंटरनेट कमजोर है, वहां डिजिटल पंजीयन और ऑनलाइन सेवाओं के संचालन में परेशानी आ सकती है।
प्रशिक्षण की कमी बनी बड़ी चुनौती
पेपरलेस व्यवस्था लागू करने की योजना के साथ सबसे बड़ा सवाल कर्मचारियों के प्रशिक्षण को लेकर उठ रहा है। बताया गया है कि बिहार में HMIS व्यवस्था शुरू करने से पहले कर्मचारियों को लगभग तीन वर्ष तक प्रशिक्षण दिया गया था। इसके मुकाबले मध्य प्रदेश में 1 नवंबर से व्यवस्था लागू करने के लिए उपलब्ध समय काफी कम दिखाई देता है।
अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टरों, नर्सों, पंजीयन कर्मचारियों, तकनीकी कर्मचारियों और अन्य संबंधित स्टाफ को नई प्रणाली का उपयोग करना सीखना होगा। पर्याप्त प्रशिक्षण के बिना सॉफ्टवेयर संचालन में गलतियां होने, मरीजों का रिकॉर्ड दर्ज करने में देरी और अस्पतालों में लंबी कतारें लगने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
स्वास्थ्य सेवाएं सीधे मरीजों से जुड़ी होती हैं। इसलिए डिजिटल प्रणाली लागू करने से पहले कर्मचारियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देना आवश्यक होगा। केवल सामान्य जानकारी अथवा थोड़े समय की ट्रेनिंग के आधार पर पूरी व्यवस्था को अचानक पेपरलेस करना आसान नहीं होगा।
टैबलेट और दूसरे संसाधनों की उपलब्धता पर सवाल
डिजिटल सेवाओं को प्रभावी रूप से संचालित करने के लिए अस्पतालों एवं स्वास्थ्य केंद्रों में पर्याप्त संख्या में कंप्यूटर, टैबलेट और अन्य उपकरणों की आवश्यकता होगी। इसके साथ निर्बाध इंटरनेट कनेक्टिविटी, बिजली और तकनीकी सहायता भी जरूरी है।
यदि अस्पतालों में पर्याप्त उपकरण उपलब्ध नहीं कराए गए तो कर्मचारियों को मरीजों की जानकारी दर्ज करने में परेशानी हो सकती है। एक ही उपकरण पर कई कर्मचारियों के निर्भर रहने से काम की गति धीमी पड़ सकती है। विशेष रूप से ऐसे अस्पतालों में चुनौती बढ़ सकती है, जहां रोजाना बड़ी संख्या में मरीज ओपीडी में पहुंचते हैं।
डिजिटल प्रणाली में तकनीकी खराबी आने पर तत्काल सहायता उपलब्ध कराने की व्यवस्था भी करनी होगी। सर्वर बंद होने, इंटरनेट बाधित होने अथवा सॉफ्टवेयर में तकनीकी समस्या आने की स्थिति में मरीजों का उपचार प्रभावित न हो, इसके लिए वैकल्पिक व्यवस्था तैयार रखना जरूरी होगा।
मरीजों को मिल सकते हैं कई लाभ
यदि पेपरलेस व्यवस्था पूरी तैयारी के साथ लागू होती है तो मरीजों को कई प्रकार की सुविधाएं मिल सकती हैं। ओपीडी पर्चा मोबाइल पर मिलने से उसे खोने अथवा खराब होने की समस्या कम होगी। मरीजों के पुराने रिकॉर्ड डिजिटल रूप में सुरक्षित रहने से बार-बार एक ही जानकारी देने की जरूरत भी घट सकती है।
अस्पताल प्रशासन को मरीजों की संख्या, उपलब्ध सेवाओं और कार्यप्रणाली से संबंधित जानकारी व्यवस्थित रूप से मिल सकेगी। इससे स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी और संसाधनों के बेहतर प्रबंधन में सहायता मिलने की उम्मीद है।
कागज का उपयोग कम होने से अस्पतालों में रिकॉर्ड रखने का बोझ घटेगा। इससे सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने में भी मदद मिल सकती है।
पूरी तैयारी के बाद लागू करने की मांग
डिजिटल स्वास्थ्य सेवाओं की योजना को भविष्य की आवश्यकता माना जा रहा है, लेकिन इसके क्रियान्वयन से पहले सभी जरूरी तैयारियां पूरी होना आवश्यक है। कर्मचारियों को प्रशिक्षण, पर्याप्त डिजिटल उपकरण, मजबूत इंटरनेट कनेक्टिविटी और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराए बिना व्यवस्था लागू करने पर मरीजों एवं अस्पताल स्टाफ दोनों को परेशानी हो सकती है।
अब सबकी नजर इस बात पर रहेगी कि स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा विभाग 1 नवंबर से पहले अस्पतालों में आवश्यक संसाधन और प्रशिक्षण की व्यवस्था किस प्रकार करता है। योजना की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि डिजिटल परिवर्तन केवल घोषणा तक सीमित रहता है या मरीजों को जमीन पर भी सुविधाजनक और प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं।
