RSS 100वीं वर्षगांठ पर बड़ा संगठनात्मक बदलाव
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) 2025 में अपनी स्थापना का 100वां वर्ष पूरा कर रहा है। इस शताब्दी वर्ष के मौके पर संघ ने अपनी संगठनात्मक संरचना में बड़े और ऐतिहासिक बदलाव की योजना बनाई है। समय के साथ संघ ने अपने ढांचे और पदों में सुधार किए हैं, ताकि संगठन अधिक प्रभावी और ज़मीनी स्तर पर सशक्त बन सके। पिछले सालों में संघ ने अपनी पारंपरिक ड्रेस और आंतरिक पदनामों में बदलाव किए थे, जो चर्चा का विषय बने थे। इस बार का बदलाव न केवल पदों के नाम बदलने तक सीमित है, बल्कि पूरे संगठन के कार्यक्षेत्र और प्रशासनिक ढांचे को पुनर्गठित करने पर केंद्रित है।
संघ के सूत्रों के अनुसार, इस बदलाव का सबसे महत्वपूर्ण असर प्रांत प्रचारक पद पर होगा। नई व्यवस्था के तहत प्रांत प्रचारकों की जगह संभाग प्रचारक नियुक्त किए जाएंगे। संभाग प्रचारकों का कार्यक्षेत्र प्रांत प्रचारकों की तुलना में छोटा होगा, जिससे संगठन की कार्यकुशलता बढ़ेगी और ज़मीनी स्तर पर कामकाज अधिक प्रभावी होगा। इसके अलावा, प्रत्येक राज्य में एक राज्य प्रचारक की नियुक्ति की जाएगी, जो पूरे राज्य में संघ के कामकाज का समन्वय करेगा। नई संरचना के अनुसार लगभग दो सरकारी मंडलों (कमिश्नरी) को मिलाकर एक संभाग बनाया जाएगा, जिससे प्रत्येक संभाग के प्रचारक का कार्यक्षेत्र स्पष्ट और संतुलित होगा।
उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में नई संरचना
उत्तर प्रदेश उदाहरण के तौर पर देखें तो वर्तमान में यह राज्य छह प्रांतों में विभाजित है: ब्रज, अवध, मेरठ, कानपुर, काशी और गोरखपुर। प्रशासनिक दृष्टि से यहां 18 मंडल हैं। नई संरचना के अनुसार इन 18 मंडलों को मिलाकर 9 संभाग बनाए जाएंगे और प्रत्येक संभाग के लिए एक संभाग प्रचारक नियुक्त होगा। पूरे उत्तर प्रदेश के लिए एक राज्य प्रचारक कार्य करेगा। इससे पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के लिए अलग-अलग क्षेत्र प्रचारक थे, लेकिन नई व्यवस्था में एक ही क्षेत्र प्रचारक पूरे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का कार्य देखेगा। राजस्थान को अब संघ दृष्टि से उत्तर क्षेत्र के साथ जोड़ा जाएगा, जिसमें दिल्ली, जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और पंजाब शामिल हैं।
देश भर में संघ के वर्तमान में 11 क्षेत्र प्रचारक हैं, जिन्हें नई संरचना के बाद घटाकर 9 किया जाएगा। वहीं, लगभग 75 संभाग प्रचारक पूरे देश में कार्य करेंगे। इस बदलाव का उद्देश्य संघ की गतिविधियों और विस्तार को देखते हुए कार्यकुशलता और समन्वय बढ़ाना है। नए पदों और पुनर्गठन के बाद संघ की योजना यह सुनिश्चित करेगी कि सभी राज्यों में संगठन का कामकाज प्रभावी और समन्वित रूप से चल सके। हर राज्य और संभाग में कार्यों का दायरा स्पष्ट होगा, और ज़मीनी स्तर पर संघ की पहुँच और कार्य क्षमता मजबूत होगी।

RSS की बैठकों और कार्यप्रणाली में बदलाव
संघ की बैठक प्रणाली में भी बदलाव प्रस्तावित हैं। मार्च में होने वाली संघ की सबसे बड़ी बैठक, अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा अब हर साल नहीं होगी। नई व्यवस्था के अनुसार यह बैठक हर तीन साल में नागपुर में आयोजित की जाएगी। हालांकि, दीपावली के आसपास आयोजित होने वाली अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक हर साल नियमित रूप से जारी रहेगी। संघ के सूत्रों का कहना है कि पिछले 5–6 वर्षों से इन बदलावों पर मंथन चल रहा था। लंबे विचार-विमर्श और सहमति के बाद इन बदलावों को लागू करने का निर्णय लिया गया है।
यह बदलाव संघ के भविष्य के विस्तार और कार्यकुशलता को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है। संगठन के पदों और कार्यक्षेत्रों में बदलाव का असर सीधे संगठन की कार्यप्रणाली और निर्णय लेने की क्षमता पर पड़ेगा। क्षेत्र और राज्य स्तर पर एक स्पष्ट नेतृत्व संरचना के कारण निर्णय लेने में तेजी आएगी और स्थानीय स्तर पर संगठन की गतिविधियों का समन्वय बेहतर होगा। मार्च 2026 में होने वाली अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक में इन प्रस्तावों पर अंतिम मुहर लग सकती है और वर्ष 2027 से ये बदलाव ज़मीनी स्तर पर दिखाई देने लगेंगे।
संगठन के लिए अपेक्षित परिणाम
नई संरचना और पदनामों के बदलाव का उद्देश्य संघ के कार्य विस्तार, ज़मीनी स्तर पर सक्रियता और नेतृत्व की क्षमता को मजबूत करना है। संघ की नई योजना के तहत प्रांत प्रचारक की जगह संभाग प्रचारक होंगे, राज्य स्तर पर राज्य प्रचारक होंगे और देश में क्षेत्र प्रचारकों की संख्या घटाई जाएगी। इस बदलाव से न केवल संगठन का ढांचा छोटा और अधिक प्रभावी होगा, बल्कि राज्यों और संभागों में कार्य संचालन और निगरानी भी बेहतर होगी।
संघ के विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव संघ को 21वीं सदी के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य के अनुसार ढालने में मदद करेगा। स्थानीय स्तर पर प्रत्येक संभाग और राज्य में स्पष्ट नेतृत्व होने से संघ की योजनाओं और गतिविधियों का क्रियान्वयन अधिक संगठित और प्रभावी होगा। संघ के पदनाम, बैठक और कार्यप्रणाली में बदलाव से संगठन का प्रशासनिक ढांचा अधिक मजबूत, लचीला और समन्वित बन जाएगा।
