दिल्ली के कैलाश नगर में आचार्य श्री विशुद्धसागर जी महाराज ने चिंता को चिता के समान बताया। सम्यक चिंतन और सकारात्मक जीवन के 10 महत्वपूर्ण सूत्र दिए।
*पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी ने कहा – चिंता छोड़ो, क्योंकि चिंता चिता समान है – सम्यक चिंतन से ही होगा महा-भयंकर रोग का नाश*
*चिता जलाती है मुर्दे को, चिंता जलाती है जिंदे को – गुरुदेव की आज की देशना में उमड़ा जनसैलाब*
राजेश जैन दद्दू
*नई दिल्ली / कैलाश नगर, 20 अक्टूबर 2026।* परम पूज्य पट्टाचार्य चर्या शिरोमणि श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज ने आज कैलाश नगर, दिल्ली में अपनी अमृतमयी देशना में मानव जीवन के सबसे बड़े शत्रु ‘चिंता’ पर गहन प्रहार करते हुए कहा कि चिंता को त्यागना ही सुखी जीवन का मूल मंत्र है।
गुरुदेव ने अपने प्रवचन का प्रारंभ इस प्राचीन दोहे से किया –
*चिंता छोड़ो, क्योंकि – चिन्ता चिता समान*
*पट्टाचार्य श्री विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने कहा कि -*
*चिंता चितासमान, बिन्दु मात्र अन्तर लखो।*
*चिता दहत निःप्राण, चिंता दहत सजीव को॥*
गुरुदेव ने कहा – _”अहो भव्यात्मन् ! चिता और चिन्ता में मात्र एक बिन्दु की ही विशेषता है। चिता तो निर्जीव मृत शरीर को अग्नि में झुलसाती है, पर चिन्ता सजीव-मानव का सर्वनाश कर देती है।”_
*चिंता से आत्मविश्वास कोसों दूर चला जाता है -*
गुरुदेव ने बताया कि दुनिया में सबसे अधिक और खतरनाक रोग चिंता के कारण ही होते हैं। चिंता करने वाले का आत्म-विश्वास कोसों दूर चला जाता है।
चिन्ता अर्थात् भविष्य की सुखद-चाह में वर्तमान की शान्ति भंग करना। अनावश्यक विपरीत सोच ही चिंता को जन्म देती है। जैसे भीषण अग्नि महावन के हरे-भरे वृक्षों को जलाकर राख कर देती है, वैसे ही व्यर्थ की चिन्ता व्यक्ति के ओज, सौन्दर्य, तेज, बल, उत्साह, बुद्धि, ज्ञान, भूख-प्यास सबको नष्ट कर देती है। इससे रक्त का क्षय होता है, प्रतिरोधक शक्ति क्षीण होती है और व्यक्ति जीते जी मृतक समान हो जाता है।
*चिंता वह नागिन है जो प्राण लेकर ही छोड़ती है -*
अपनी देशना के दूसरे भाग में गुरुदेव ने कहा –
_”नागिन का डसा व्यक्ति उपचार से ठीक हो सकता है, खाई में गिरा मानव बच सकता है, परन्तु चिंता में फँसे व्यक्ति का चिरकाल तक जीना सम्भव नहीं है। चिंता वह नागिन है जो एक डसले तो प्राण लेकर ही छोड़ती है।”_
पुण्यक्षीणता, असफलता, अपयश, योग्यता से अधिक अपेक्षा, निराशा, आगामी विपत्ति की आशंका, मान-भंग और मोह ही चिंता के मूल कारण हैं।
गुरुदेव ने आगे कहा – _”चिन्ता कपोल-कल्पना का वह रास्ता है, जो काल्पनिक पागलपन के गड्ढे में गिरा देता है और फिर वह सत्य तक पहुँचने ही नहीं देता। चिन्ता बहता हुआ दरिया है, जो हमारी समस्त ऊर्जा और शक्ति को बहाकर ले जाता है।”_
चिंता के दुष्प्रभाव गिनाते हुए गुरुदेव ने कहा कि चिंता से चेहरे की चमक समाप्त हो जाती है, मुख के जबड़े सूखने लगते हैं, आँखें धंस जाती हैं, चेहरे पर झुर्रियाँ और बाल सफेद हो जाते हैं, त्वचा काली व तेजहीन हो जाती है। चिंता एक प्रकार का पागलपन ही है।
*समाधान क्या है – सम्यक चिंतन -*
अंत में गुरुदेव ने समाधान देते हुए कहा – _”चिंतन के अनुसार ही चरण चलते हैं। चिंतन से ही चिंता का अंत सम्भव है।”_
*चिंता से दूर रहने के 10 सूत्र -*
1. अच्छी संगति करें, 2. श्रेष्ठ साहित्य पढ़ें, 3. कुछ बातें भाग्य और समय पर छोड़ दें, 4. हँसमुख और आशावादी बनें, 5. पूर्ण निद्रा लें, 6. संतुलित शुद्धाहार करें, 7. संतोषी बनें, 8. सकारात्मक विचार करें, 9. अपनों पर विश्वास करें, 10. उन क्षणों का स्मरण करें जब आप बहुत खुश थे।
प्रवचन का समापन करते हुए गुरुदेव ने कहा – _”जो होना होता है वही होता है, तो फिर हम व्यर्थ में क्यों चिंता करें। जिसे जो करना होता है, वो वही करता है, फिर हमारी चिंता से क्या लाभ? जो होना होगा सो हो जायेगा, उसी समय निपट लेंगे, अभी से चिंता क्यों करें?”_
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के इस अमृतमय उद्बोधन का जयकारों के साथ अनुमोदन किया।
