जब जूते किताबों से महँगे हो गए
ज्ञान कभी जीवन की सबसे बड़ी संपत्ति माना जाता था
मुरैना/द्रोणगिरी (मनोज जैन नायक) एक समय था जब शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन को दिशा देने वाला पवित्र साधन मानी जाती थी। ज्ञान प्राप्त करने के लिए लोग कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करते थे। वे घने जंगलों से गुजरते, दुर्गम पहाड़ों को पार करते और अनेक संघर्षों के बाद गुरु और ज्ञान तक पहुँचते थे। उनके लिए ज्ञान केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी पूंजी हुआ करता था।
प्राचीन काल में गुरु और शिक्षा का स्थान समाज में सर्वोच्च था। विद्यार्थी ज्ञान प्राप्ति के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने को तैयार रहते थे। उन्हें विश्वास था कि ज्ञान का प्रकाश जीवन के हर अंधकार को दूर कर सकता है।
एकलव्य का त्याग आज भी प्रेरणादायक
इतिहास में एकलव्य का उदाहरण शिक्षा और गुरु-भक्ति के अद्भुत प्रतीक के रूप में दिया जाता है। जब गुरु ने उससे गुरु-दक्षिणा के रूप में अंगूठा माँगा, तो उसने बिना किसी संकोच के अपना अंगूठा अर्पित कर दिया। उसके लिए शिक्षा और गुरु का सम्मान शरीर के किसी भी अंग से अधिक महत्वपूर्ण था।
यह घटना बताती है कि उस समय ज्ञान और शिक्षा के प्रति लोगों में कितना गहरा सम्मान था। शिक्षा को जीवन का आभूषण माना जाता था और पुस्तकें ज्ञान का सबसे बड़ा माध्यम थीं।
डिजिटल युग में घटता पुस्तकों का सम्मान
आज हम आधुनिक और डिजिटल युग में जी रहे हैं। इंटरनेट और मोबाइल के माध्यम से दुनिया भर की जानकारी कुछ ही क्षणों में उपलब्ध हो जाती है। ज्ञान हमारी उंगलियों तक पहुँच चुका है, लेकिन इसके बावजूद पुस्तकों के प्रति सम्मान में कमी दिखाई दे रही है।
जिन पुस्तकों को घरों की शोभा और पुस्तकालयों की पहचान बनना चाहिए था, वे आज कई जगहों पर अलमारियों में बंद या दुकानों में धूल खाती नजर आती हैं। दूसरी ओर, फैशन और दिखावे से जुड़ी वस्तुओं पर लोग बड़ी आसानी से हजारों रुपये खर्च कर देते हैं।
जूते महँगे, लेकिन किताबों पर सोच-विचार
आज की स्थिति पर नजर डालें तो एक अजीब विरोधाभास दिखाई देता है। लोग पाँच हजार रुपये या उससे अधिक कीमत के जूते खरीदने में संकोच नहीं करते, लेकिन जब दो सौ रुपये की कोई अच्छी पुस्तक खरीदने की बात आती है, तो कई सवाल खड़े हो जाते हैं।
मन में विचार आता है—”क्या इसकी जरूरत है? मोबाइल में तो सब जानकारी मिल जाती है। पुस्तक खरीदकर क्या लाभ होगा?” लेकिन यही व्यक्ति कपड़े, जूते और अन्य फैशन सामग्री पर बिना सोचे हजारों रुपये खर्च कर देता है।
यह सोच हमें यह समझने के लिए मजबूर करती है कि हमने आवश्यकता और दिखावे के बीच संतुलन खो दिया है।

जूते चाल बदलते हैं, पुस्तकें सोच बदल देती हैं
वास्तविकता यह है कि जूते केवल हमारे पैरों की सुरक्षा और बाहरी व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं, जबकि पुस्तकें हमारे विचारों और व्यक्तित्व का निर्माण करती हैं।
जूते हमारी चाल को बेहतर बना सकते हैं, लेकिन पुस्तकें हमारे जीवन की दिशा बदल सकती हैं। जूते कुछ वर्षों तक साथ रहते हैं, लेकिन एक अच्छी पुस्तक जीवनभर मार्गदर्शन देती है। एक श्रेष्ठ विचार केवल एक व्यक्ति को नहीं, बल्कि कई पीढ़ियों को प्रभावित कर सकता है।
नैतिक संकट का कारण ज्ञान से दूरी
आज समाज में दिखाई देने वाले वैचारिक और नैतिक संकट का एक कारण यह भी है कि हमने पुस्तकों और ज्ञान के महत्व को कम कर दिया है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि अच्छे विचारों, संस्कारों और विवेक का विकास करना भी है।
जब समाज में दिखावे को अधिक महत्व मिलने लगता है और ज्ञान पीछे छूटने लगता है, तो आने वाली पीढ़ियों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। यदि बच्चे घरों में पुस्तकों का सम्मान नहीं देखेंगे, तो उनमें पढ़ने की रुचि कैसे विकसित होगी?
उपहारों में पुस्तकों की परंपरा बढ़ानी होगी
समय आ गया है कि हम अपनी सामाजिक परंपराओं में सकारात्मक बदलाव लाएँ। विवाह, जन्मदिन, सम्मान समारोह या अन्य शुभ अवसरों पर महँगे और कुछ समय बाद समाप्त हो जाने वाले उपहारों की जगह प्रेरणादायक पुस्तकें भेंट करने की आदत विकसित करनी चाहिए।
फूल कुछ दिनों में मुरझा जाते हैं, मिठाइयाँ कुछ समय में समाप्त हो जाती हैं, लेकिन एक अच्छी पुस्तक वर्षों तक प्रेरणा देती है। वह व्यक्ति के विचारों को समृद्ध करती है और जीवन की दिशा बदलने की क्षमता रखती है।
पुस्तकें घर में विचारों का प्रकाश लाती हैं
जिस घर में पुस्तकें होती हैं, वहाँ केवल कागज के पन्ने नहीं होते, बल्कि विचारों का प्रकाश और संस्कारों की नींव होती है। पुस्तकें मनुष्य को केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि उसे समझदार, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाती हैं।
पुस्तकें सभ्यता की धरोहर हैं। उन्होंने समाजों को आगे बढ़ाने, विचारों को जन्म देने और मानवता को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
नई पीढ़ी को पुस्तकों से जोड़ना जरूरी
आज आवश्यकता है कि माता-पिता बच्चों को केवल आधुनिक सुविधाएँ और भौतिक वस्तुएँ ही न दें, बल्कि उन्हें पढ़ने की आदत भी विकसित कराएँ। घर में पुस्तकों का वातावरण बनेगा तो बच्चों में ज्ञान के प्रति रुचि और सम्मान बढ़ेगा।
मोबाइल और इंटरनेट उपयोगी साधन हैं, लेकिन पुस्तकें गहराई से सोचने, समझने और जीवन के अनुभवों को समृद्ध करने का माध्यम हैं।
ज्ञान को दें सबसे अधिक सम्मान
हमें यह याद रखना होगा कि बाहरी सुंदरता कुछ समय के लिए आकर्षण पैदा कर सकती है, लेकिन ज्ञान व्यक्ति को जीवनभर सम्मान दिलाता है। महँगे जूते हमें अच्छी सड़क पर चलना सिखा सकते हैं, लेकिन अच्छी पुस्तकें हमें जीवन की सही राह दिखाती हैं।
आइए, हम संकल्प लें कि जितना सम्मान हम अपने पहनावे और बाहरी व्यक्तित्व को देते हैं, उससे कहीं अधिक सम्मान पुस्तकों और ज्ञान को देंगे। क्योंकि सच्ची संपत्ति वही है, जो हमारे विचारों को समृद्ध करे और हमारे जीवन को बेहतर बनाए।
— अंशुल जैन शास्त्री
