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	<title>Jain Puja &#8211; Swaraj Vani</title>
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	<title>Jain Puja &#8211; Swaraj Vani</title>
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		<title>मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी</title>
		<link>https://swarajvani.com/simplicity-in-thought-speech-and-action-defines-uttam-aarjav-dharma-aryika-sangammati/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 18 Sep 2026 08:31:01 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी अम्बाह जैन बगीची में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन हुई उत्तम आर्जव धर्म की आराधना, अभिषेक ... <a title="मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी" class="read-more" href="https://swarajvani.com/simplicity-in-thought-speech-and-action-defines-uttam-aarjav-dharma-aryika-sangammati/" aria-label="Read more about मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>मन, वचन और काया में सरलता ही उत्तम आर्जव धर्म : आर्यिका संगममति माताजी</strong></h1>
<h2><strong>अम्बाह जैन बगीची में दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन हुई उत्तम आर्जव धर्म की आराधना, अभिषेक और शांतिधारा में उमड़े श्रद्धालु</strong></h2>
<p><strong>मनोज जैन नायक</p>
<p>मुरैना </strong> दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन अम्बाह स्थित जैन बगीची में उत्तम आर्जव धर्म की श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ आराधना की गई। आचार्य श्री सिद्धांत सागर महाराज की शिष्या गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ससंघ के पावन सानिध्य में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में बड़ी संख्या में जैन समाज के महिला, पुरुष, युवा और बच्चे शामिल हुए।</p>
<p>प्रातःकाल भगवान जिनेंद्र का संगीतमय अभिषेक और शांतिधारा की गई। इसके बाद श्रद्धालुओं ने विधि-विधान से पूजन करते हुए उत्तम आर्जव धर्म की आराधना की। मंत्रोच्चार और भक्तिमय संगीत के बीच आयोजित कार्यक्रम से जैन बगीची का वातावरण धर्ममय हो गया। श्रद्धालुओं ने भगवान के चरणों में श्रीफल अर्पित कर आत्मशुद्धि और सदाचारपूर्ण जीवन की कामना की।</p>
<h2><strong>मन, वचन और कर्म में एकरूपता जरूरी</strong></h2>
<p>धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणिनी आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ने कहा कि मन, वचन और काया में सरलता, निष्कपटता एवं एकरूपता होना ही उत्तम आर्जव धर्म है। आर्जव का सामान्य अर्थ सीधापन और सरलता है। मनुष्य के मन में जो भाव हों, उसकी वाणी और आचरण भी उन्हीं भावों के अनुरूप होना चाहिए।</p>
<p>उन्होंने कहा कि मन में कुछ और विचार रखना, वाणी से कुछ और कहना तथा व्यवहार में उसके विपरीत आचरण करना कुटिलता है। ऐसी प्रवृत्ति आत्मा को अशुद्ध बनाती है और व्यक्ति को धर्ममार्ग से दूर ले जाती है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति अपने विचारों, शब्दों और कार्यों में समानता रखता है, वह उत्तम आर्जव धर्म की वास्तविक साधना करता है।</p>
<p>आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि सरल होने का अर्थ कमजोर होना नहीं है। सरलता व्यक्ति की आंतरिक शक्ति, पवित्रता और आत्मविश्वास को प्रदर्शित करती है। निष्कपट व्यक्ति को अपने जीवन में किसी प्रकार का दिखावा करने या सत्य छिपाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।</p>
<h2><strong>छल-कपट का त्याग आर्जव धर्म का आधार</strong></h2>
<p>माताजी ने उत्तम आर्जव धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मायाचारी अर्थात छल, कपट और धोखे का त्याग करना इस धर्म का प्रमुख आधार है। मनुष्य अनेक बार अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए छल और असत्य का सहारा लेता है। इससे भले ही उसे कुछ समय के लिए सांसारिक लाभ मिल जाए, लेकिन आत्मिक शांति और वास्तविक सुख प्राप्त नहीं हो सकता।</p>
<p>उन्होंने कहा कि छल-कपट व्यक्ति के मन को लगातार अशांत रखता है। कुटिल व्यवहार से विश्वास टूटता है और रिश्तों में दूरी पैदा होती है। जब व्यक्ति सरलता एवं निष्कपटता को अपनाता है तो उसके आचरण में शुद्धता आती है। सरल व्यक्ति के जीवन में दिखावा नहीं होता और उसका व्यवहार दूसरों के लिए भी प्रेरणा बनता है।</p>
<p>उत्तम आर्जव धर्म हमें यह संदेश देता है कि व्यक्ति जैसा भीतर से है, वैसा ही बाहर भी दिखाई दे। विचार, वाणी और व्यवहार की एकरूपता से जीवन में विश्वास, संतोष तथा शांति का विकास होता है।</p>
<h2><strong>आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग से जुड़ा है आर्जव धर्म</strong></h2>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="wp-image-358702 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/dgfdsfgsd-300x155.jpg" alt="dgfdsfgsd" width="381" height="197" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/dgfdsfgsd-300x155.jpg 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/dgfdsfgsd-1024x530.jpg 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/dgfdsfgsd-768x397.jpg 768w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/dgfdsfgsd.jpg 1289w" sizes="(max-width: 381px) 100vw, 381px" /><span style="font-size: inherit;">आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि जैन दर्शन में उत्तम आर्जव धर्म को आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग की साधना से जोड़ा गया है। आत्मा का स्वभाव निर्मल और सरल है, लेकिन मोह, माया और कषायों के कारण उसमें कुटिलता के भाव उत्पन्न हो जाते हैं। इन भावों का त्याग कर आत्मा को उसके वास्तविक स्वरूप की ओर ले जाना ही धर्म साधना का उद्देश्य है।</span></p>
<p>उन्होंने कहा कि धार्मिक क्रियाएं तभी सार्थक होती हैं, जब व्यक्ति अपने भीतर के छल और कपट को समाप्त करने का प्रयास करे। केवल बाहरी पूजा-अर्चना पर्याप्त नहीं है। भगवान की आराधना के साथ अपने विचारों, व्यवहार और जीवनशैली को भी शुद्ध बनाना आवश्यक है।</p>
<p>कुटिलता का त्याग कर सरल एवं पवित्र भावों के साथ धर्माराधना करना ही उत्तम आर्जव धर्म का सार है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने दैनिक जीवन में सत्य, सरलता और निष्कपटता अपनाने का संकल्प लेना चाहिए।</p>
<h2><strong>दिखावा और पाखंड से बचने का संदेश</strong></h2>
<p>धर्मसभा में माताजी ने कहा कि वर्तमान समय में लोग कई बार दूसरों को प्रभावित करने के लिए दिखावे का सहारा लेते हैं। धार्मिक और सामाजिक जीवन में भी बाहरी प्रदर्शन बढ़ता जा रहा है। आर्जव धर्म व्यक्ति को पाखंड तथा दिखावे से बचने की प्रेरणा देता है।</p>
<p>उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि धर्म का संबंध बाहरी प्रदर्शन से अधिक आंतरिक परिवर्तन से है। यदि व्यक्ति पूजा-अर्चना तो करे, लेकिन उसके व्यवहार में छल, क्रोध और अहंकार बना रहे तो उसकी साधना अधूरी है। धर्म का वास्तविक प्रभाव व्यक्ति के विचारों, वाणी और व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।</p>
<p>परिवार और समाज में भी सरल एवं स्पष्ट व्यवहार अपनाने से विवाद कम होते हैं। जब व्यक्ति बिना छल-कपट के अपनी बात रखता है तो आपसी विश्वास और प्रेम बढ़ता है। उत्तम आर्जव धर्म व्यक्तिगत जीवन के साथ सामाजिक संबंधों को भी मजबूत बनाने का मार्ग दिखाता है।</p>
<h2><strong>श्रद्धालुओं ने उत्साह से लिया धर्मलाभ</strong></h2>
<p>दशलक्षण महापर्व के तीसरे दिन आयोजित अभिषेक, शांतिधारा और पूजन में समाज के लोगों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। महिलाओं और युवाओं ने संगीतमय पूजन में सहभागिता की, जबकि बच्चों ने भी धार्मिक गतिविधियों में शामिल होकर जैन धर्म के संस्कारों को समझा।</p>
<p>पूरे कार्यक्रम के दौरान भगवान जिनेंद्र के जयकारे गूंजते रहे। श्रद्धालुओं ने आर्यिका संगममति माताजी के प्रवचन सुनकर अपने जीवन से छल-कपट, दिखावा और कुटिलता दूर करने का संकल्प लिया।</p>
<h2><strong>प्रतिदिन हो रहे धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम</strong></h2>
<p><img decoding="async" class="wp-image-358703 alignright" src="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/fdsfdfd-300x128.jpg" alt="fdsfdfd" width="457" height="195" srcset="https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/fdsfdfd-300x128.jpg 300w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/fdsfdfd-1024x435.jpg 1024w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/fdsfdfd-768x327.jpg 768w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/fdsfdfd-1536x653.jpg 1536w, https://swarajvani.com/wp-content/uploads/2026/09/fdsfdfd.jpg 1592w" sizes="(max-width: 457px) 100vw, 457px" /><span style="font-size: inherit;">दशलक्षण महापर्व के उपलक्ष्य में अम्बाह जैन बगीची में प्रतिदिन विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। प्रातःकाल अभिषेक, शांतिधारा, पूजन एवं धर्मसभा आयोजित होती है। आर्यिका संगममति माताजी द्वारा प्रतिदिन दशलक्षण धर्म के अलग-अलग स्वरूपों की सरल भाषा में व्याख्या की जा रही है।</span></p>
<p>रात्रि में भगवान की आरती, लकी ड्रॉ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं। इनमें समाज के महिला, पुरुष, युवा और बच्चे उत्साहपूर्वक सहभागिता कर रहे हैं। सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के माध्यम से धर्म, संस्कार, अहिंसा और सदाचार का संदेश दिया जा रहा है।</p>
<p>आयोजन समिति ने समाज के सभी लोगों से दशलक्षण महापर्व के आगामी कार्यक्रमों में शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त करने की अपील की है। श्रद्धालुओं ने कहा कि आर्यिका संगममति माताजी के सानिध्य में आयोजित कार्यक्रमों से उन्हें धर्म को समझने और जीवन में उसके सिद्धांतों को अपनाने की प्रेरणा मिल रही है।</p>
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		<title>सारंगपुर में श्वेतांबर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व शुरू, प्रथम दिवस गूंजे भगवान महावीर के संदेश</title>
		<link>https://swarajvani.com/shwetambar-jain-community-begins-paryushan-mahaparv-in-sarangpur-with-devotion-and-spiritual/</link>
		
		<dc:creator><![CDATA[Palak Rajput]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 12 Sep 2026 11:19:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[सारंगपुर में श्वेतांबर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व शुरू, प्रथम दिवस गूंजे भगवान महावीर के संदेश आत्मशुद्धि, त्याग और तपस्या के साथ हुई धर्म आराधना; पांच प्रमुख कर्तव्यों पर किया ... <a title="सारंगपुर में श्वेतांबर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व शुरू, प्रथम दिवस गूंजे भगवान महावीर के संदेश" class="read-more" href="https://swarajvani.com/shwetambar-jain-community-begins-paryushan-mahaparv-in-sarangpur-with-devotion-and-spiritual/" aria-label="Read more about सारंगपुर में श्वेतांबर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व शुरू, प्रथम दिवस गूंजे भगवान महावीर के संदेश">Read more</a>]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h1><strong>सारंगपुर में श्वेतांबर जैन समाज का पर्यूषण महापर्व शुरू, प्रथम दिवस गूंजे भगवान महावीर के संदेश</strong></h1>
<h2><strong>आत्मशुद्धि, त्याग और तपस्या के साथ हुई धर्म आराधना; पांच प्रमुख कर्तव्यों पर किया गया चिंतन</strong></h2>
<p data-start="53" data-end="84"><strong data-start="53" data-end="84">रिपोर्टर: मनोज कुमार पुष्पद</strong></p>
<p><strong>दैनिक स्वराज वाणी, सारंगपुर।</strong> आत्मशुद्धि, त्याग, तपस्या, संयम और साधना के महान पर्व पर्यूषण महापर्व का मंगलवार को श्वेतांबर जैन समाज द्वारा श्रद्धा एवं भक्ति के साथ शुभारंभ किया गया। पर्व के पहले दिन श्रीसंघ में विशेष धार्मिक उत्साह दिखाई दिया। बड़ी संख्या में समाजजन जिनालय पहुंचे और भगवान महावीर के सिद्धांतों का स्मरण करते हुए धर्म आराधना की।</p>
<p>पर्यूषण पर्व जैन समाज के लिए केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और आत्मशुद्धि का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु मन, वचन और कर्म से हुई गलतियों पर चिंतन करते हुए सत्य, अहिंसा, करुणा, क्षमा और संयम को अपने जीवन में अपनाने का संकल्प लेते हैं। प्रथम दिवस पर प्रभु भक्ति, स्नात्र पूजन, केसर पूजा, दुग्धाभिषेक, महाआरती, प्रभावना, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और जप-तप सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए।</p>
<h2><strong>हृदयरत्न महाराज साहब की पावन निश्रा में आयोजन</strong></h2>
<p>पर्यूषण महापर्व के अंतर्गत आयोजित होने वाले सभी धार्मिक कार्यक्रम परम पूज्य हृदयरत्न महाराज साहब की पावन निश्रा में संपन्न हो रहे हैं। उनकी उपस्थिति से श्रीसंघ में आध्यात्मिक ऊर्जा और धर्म के प्रति विशेष उत्साह का वातावरण बना हुआ है।</p>
<p>धर्मसभा में श्रद्धालुओं को भगवान महावीर के बताए सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह और आत्मसंयम के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई। समाजजनों ने सामूहिक रूप से धार्मिक क्रियाओं में भाग लिया और अपने जीवन में त्याग एवं सदाचार को स्थान देने का संकल्प लिया।</p>
<h2><strong>भिवंडी से पहुंचे विशेष आराधक</strong></h2>
<p>पर्यूषण महापर्व की विशेष आराधना, जप-तप और विधिवत धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराने के लिए भिवंडी से किनाल जैन, सिद्धार्थ जैन और पारसमल जैन सारंगपुर पहुंचे हैं। आराधकों के श्रीसंघ में आगमन पर समाज के पदाधिकारियों और वरिष्ठजनों ने उनका भावभीना स्वागत किया।</p>
<p>बताया गया कि आगामी तीन दिनों तक श्रीसंघ में विशेष व्याख्यान एवं प्रवचन आयोजित किए जाएंगे। इनमें जैन दर्शन के गूढ़ सिद्धांतों को सरल भाषा में श्रद्धालुओं के सामने प्रस्तुत किया जाएगा। इसके माध्यम से नई पीढ़ी को भी धर्म के मूल सिद्धांतों, परंपराओं और जीवन में संयम के महत्व से परिचित कराया जाएगा।</p>
<h2><strong>पांच प्रमुख कर्तव्यों पर हुआ चिंतन</strong></h2>
<p>पर्व के प्रथम दिवस आयोजित धर्मसभा में पर्यूषण महापर्व के पांच प्रमुख कर्तव्यों पर विस्तार से प्रकाश डाला गया। वक्ताओं ने कहा कि पर्यूषण आत्मा को परमात्मा की दिशा में आगे बढ़ाने वाला आध्यात्मिक अनुष्ठान है। इसके लिए केवल पूजा-पाठ ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि व्यक्ति को अपने व्यवहार और जीवनशैली में भी सकारात्मक परिवर्तन लाना चाहिए।</p>
<p>श्रद्धालुओं को अमारी प्रवर्तन यानी जीवों की रक्षा और अहिंसा के पालन का महत्व समझाया गया। बताया गया कि पर्व के दौरान किसी भी जीव को कष्ट नहीं पहुंचे, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए। अहिंसा केवल शारीरिक क्रिया तक सीमित नहीं है। मन में किसी के प्रति द्वेष नहीं रखना, वचन से किसी को पीड़ा नहीं पहुंचाना और अपने कार्यों से किसी जीव को नुकसान नहीं पहुंचाना भी अहिंसा का हिस्सा है।</p>
<h2><strong>साधार्मिक भक्ति और सहयोग का संदेश</strong></h2>
<p>प्रवचन में साधार्मिक भक्ति के महत्व पर चर्चा करते हुए कहा गया कि अपने धर्मबंधुओं के प्रति प्रेम, सम्मान और सहयोग रखना जैन जीवन पद्धति का महत्वपूर्ण अंग है। समाज के जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करना, दुख के समय उसके साथ खड़ा होना और धर्म आराधना में परस्पर सहयोग करना ही सच्ची साधार्मिक भक्ति है।</p>
<p>श्रद्धालुओं से कहा गया कि पर्यूषण के दिनों में आपसी मतभेद और मनमुटाव को समाप्त कर समाज में प्रेम, एकता एवं भाईचारे की भावना मजबूत करें। धर्म का वास्तविक प्रभाव तभी दिखाई देता है, जब व्यक्ति के व्यवहार में विनम्रता, संवेदना और सहयोग का भाव प्रकट हो।</p>
<h2><strong>क्षमापना जैन दर्शन का मूल आधार</strong></h2>
<p>धर्मसभा में क्षमापना को जैन दर्शन का मूल स्तंभ बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि मनुष्य से जाने-अनजाने में कई गलतियां हो जाती हैं। इन गलतियों को स्वीकार कर निर्मल हृदय से क्षमा मांगना और दूसरों को क्षमा करना आत्मशुद्धि की दिशा में बड़ा कदम है।</p>
<p>समाजजनों से कड़वाहट, क्रोध, अहंकार और पुराने विवादों को त्यागने का आह्वान किया गया। बताया गया कि क्षमा मांगना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मबल और विनम्रता का प्रतीक है। जो व्यक्ति दूसरों को क्षमा करता है, वह स्वयं भी मानसिक बोझ से मुक्त होकर आध्यात्मिक उन्नति की ओर आगे बढ़ता है।</p>
<h2><strong>उपवास और अट्ठम तप का बताया महत्व</strong></h2>
<p>पर्यूषण काल में शरीर और इंद्रियों पर संयम रखने के लिए उपवास, एकासन, आयंबिल तथा अन्य तप-साधनाओं का विशेष महत्व है। धर्मसभा में श्रद्धालुओं को अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार तपस्या करने की प्रेरणा दी गई।</p>
<p>लगातार तीन दिनों तक किए जाने वाले अट्ठम तप का महत्व बताते हुए कहा गया कि तपस्या का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं है। इसके माध्यम से मन की इच्छाओं पर नियंत्रण, आत्मचिंतन और विकारों से मुक्ति पाने का प्रयास किया जाता है। तप तभी सार्थक माना जाता है, जब उसके साथ विनम्रता, करुणा और सकारात्मक विचार जुड़े हों।</p>
<h2><strong>जिनालय दर्शन से मन होता है एकाग्र</strong></h2>
<p>श्रद्धालुओं को प्रतिदिन जिनालय जाकर भगवान के दर्शन और पूजा करने की प्रेरणा दी गई। बताया गया कि जिन प्रतिमा के दर्शन से मन को शांति मिलती है और व्यक्ति को अपने भीतर मौजूद बुराइयों पर विजय प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है।</p>
<p>प्रभु दर्शन, स्नात्र पूजन और आत्मसमर्पण के माध्यम से श्रद्धालु अपने मन को एकाग्र करते हैं। जिनालय में बिताया गया समय व्यक्ति को सांसारिक चिंताओं से कुछ समय के लिए दूर कर आत्मचिंतन का अवसर प्रदान करता है।</p>
<h2><strong>दूसरे दिन 11 वार्षिक कर्तव्यों पर होगा व्याख्यान</strong></h2>
<p>श्रीसंघ के पदाधिकारियों ने बताया कि पर्यूषण पर्व के दूसरे दिन आयोजित विशेष व्याख्यान में जैन धर्म के 11 वार्षिक कर्तव्यों पर विस्तार से चर्चा की जाएगी। समाज के सभी श्रद्धालुओं से निर्धारित समय पर उपस्थित होकर धर्मलाभ लेने की अपील की गई है।</p>
<p>प्रथम दिवस का कार्यक्रम सामूहिक जप, प्रभु भक्ति, पूजन, स्वाध्याय और प्रवचन के साथ संपन्न हुआ। दिनभर जिनालय एवं धर्मसभा परिसर में धार्मिक उल्लास बना रहा।</p>
<h2><strong>ये परिवार रहे धार्मिक आयोजनों के लाभार्थी</strong></h2>
<p>आराधना कराने के लिए पहुंचे श्रावक भाइयों के सम्मान में साधार्मिक भक्ति का आयोजन किया गया। प्रथम दिवस साधार्मिक भक्ति के लाभार्थी प्रेमचंद जैन कानड़ वाला परिवार रहा। वहीं स्नात्र पूजन के कायमी लाभार्थी के रूप में सज्जन सिंह-अनिल कुमार श्रीमाल परिवार ने धर्मलाभ प्राप्त किया।</p>
<p>कार्यक्रम में श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप बरड़िया, विजय जैन, श्रेयांश पारख, अशोक श्रीमाल, संजय बरड़िया, गौरव श्रीमाल, सुभाष बावेल, संतोष बरड़िया, पारस पारख, विजय बरड़िया, मोहनलाल ललवानी, श्वेता-अंशुल श्रीमाल, तृप्ति लोढ़ा, अनुराधा बरड़िया, दीप्ति बरड़िया और दशा श्रीमाल सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।</p>
<p>&nbsp;</p>
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