Strait of Hormuz : नाकेबंदी की कोशिशों के बीच अमेरिकी नौसैनिक ताकत की सीमाएं उजागर, कई टैंकरों ने सुरक्षित पार किया मार्ग
अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार के सबसे संवेदनशील और रणनीतिक मार्गों में शामिल Strait of Hormuz एक बार फिर वैश्विक चर्चा के केंद्र में है। ईरान और पश्चिमी देशों के बीच तनाव बढ़ने के बाद इस महत्वपूर्ण जलमार्ग को लेकर नाकेबंदी और नियंत्रण की कोशिशें तेज हुईं, लेकिन हालात ने यह दिखा दिया कि आधुनिक नौसैनिक ताकतें भी इस तरह के वैश्विक व्यापार मार्गों को पूरी तरह रोकने में सक्षम नहीं हैं।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के रुख में नरमी न आने के बाद अमेरिका ने इस क्षेत्र में अपनी नौसैनिक मौजूदगी बढ़ाई और होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों पर निगरानी शुरू की। हालांकि, इसके बावजूद कई टैंकर इस समुद्री मार्ग से सुरक्षित रूप से गुजरने में सफल रहे, जिससे पूरी नाकेबंदी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
अमेरिकी नौसेना की तैनाती और निगरानी
अमेरिकी नौसेना ने ओमान की खाड़ी और आसपास के समुद्री क्षेत्रों में अपनी तैनाती बढ़ाई, ताकि होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। उद्देश्य यह था कि ईरान पर दबाव बनाया जाए और उसके तेल निर्यात को सीमित किया जाए।
हालांकि, रिपोर्टों में यह सामने आया है कि दर्जनों तेल टैंकर इस क्षेत्र से सफलतापूर्वक निकल चुके हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि समुद्री मार्गों पर पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना तकनीकी और कूटनीतिक रूप से बेहद जटिल प्रक्रिया है।
खार्ग द्वीप से मुंबई तक संभावित मार्ग
विशेषज्ञों के अनुसार, एक वैकल्पिक समुद्री मार्ग भी मौजूद है, जिसके जरिए जहाज ईरान के खार्ग द्वीप से सीधे भारत के पश्चिमी तटों तक पहुंच सकते हैं। यह मार्ग फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी होते हुए आगे बढ़ता है और फिर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में प्रवेश करता है।
इस मार्ग के जरिए जहाज महाराष्ट्र, गुजरात, गोवा, कर्नाटक और केरल जैसे भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकते हैं। हालांकि, यह मार्ग भू-राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है।
भारतीय जहाज ‘देश गरिमा’ का मामला
हाल ही में भारतीय जहाज ‘देश गरिमा’ ने इसी क्षेत्र से गुजरकर मुंबई तक सफल यात्रा पूरी की। यह जहाज कतर के रस लाफान से लगभग 97,000 मीट्रिक टन कच्चा तेल लेकर भारत आया था।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यात्रा के दौरान इस जहाज पर ईरानी फायरिंग की भी घटना हुई, लेकिन इसके बावजूद यह सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य तक पहुंच गया। इस घटना ने समुद्री सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों की संवेदनशीलता को एक बार फिर उजागर किया है।
टैंकरों की आवाजाही और नाकेबंदी पर सवाल
विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, 13 अप्रैल से शुरू हुई कथित नाकेबंदी के बावजूद 30 से अधिक टैंकर इस स्ट्रेट को पार कर चुके हैं। कुछ रिपोर्टों में यह भी कहा गया है कि लगभग 34 टैंकर, जिनका संबंध ईरान से बताया जाता है, इस क्षेत्र से गुजर चुके हैं।
इस स्थिति ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आधुनिक नौसैनिक रणनीतियां वास्तव में इतने बड़े और व्यस्त समुद्री मार्ग को पूरी तरह नियंत्रित कर सकती हैं या नहीं।
भारतीय जहाजों की स्थिति
भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, फिलहाल लगभग 14 भारतीय जहाज इस समय होर्मुज क्षेत्र में मौजूद हैं या इसके आसपास के समुद्री मार्गों से गुजर रहे हैं।
इन जहाजों की सुरक्षा के लिए समय-समय पर कूटनीतिक और नौसैनिक समन्वय किया जाता है, ताकि किसी भी संभावित खतरे से बचा जा सके।
समुद्री कानून और ‘इनोसेंट पैसेज’ अधिकार
अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून (UNCLOS) के तहत प्रत्येक देश के तटीय जल क्षेत्र से 12 नॉटिकल मील तक नियंत्रण होता है। हालांकि, विदेशी जहाजों को “इनोसेंट पैसेज” यानी बिना बाधा के गुजरने का अधिकार प्राप्त होता है, बशर्ते वे किसी प्रकार की आक्रामक गतिविधि में शामिल न हों।
विशेषज्ञों का कहना है कि यही नियम इस क्षेत्र में पूर्ण नाकेबंदी को लगभग असंभव बना देता है।
पाकिस्तान और ईरान के जलक्षेत्र का विकल्प
विशेषज्ञों के अनुसार, कुछ जहाज पाकिस्तान के मकरान तट के पास से गुजरते हुए ईरानी जलक्षेत्र से सीधे पाकिस्तानी जलक्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं। हालांकि, भारत और पाकिस्तान के बीच मौजूदा राजनीतिक संबंधों और समुद्री प्रतिबंधों को देखते हुए यह मार्ग व्यवहारिक रूप से बेहद कठिन और जोखिम भरा माना जाता है।
इसके अलावा, कुछ जहाज ईरान के तटीय मार्ग से होते हुए चाबहार पोर्ट तक पहुंचते हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में प्रवेश कर भारत की ओर बढ़ते हैं।
भारतीय नौसेना की भूमिका
पूर्व नौसेना अधिकारियों के अनुसार, भारतीय जहाजों की सुरक्षा में भारतीय नौसेना की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। जहाजों के लिए पहले कूटनीतिक स्तर पर अनुमति ली जाती है, जिसके बाद ओमान की खाड़ी में उन्हें सुरक्षित एस्कॉर्ट प्रदान किया जाता है।
इसके बाद जहाज सीधे अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग से होते हुए भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचते हैं, जिससे उन्हें किसी विवादित क्षेत्र से गुजरने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
अमेरिका की रणनीति और सीमाएं
अमेरिका ने अब तक कई जहाजों को वापस लौटने का निर्देश दिया है और कुछ को रोकने का दावा भी किया है। राष्ट्रपति स्तर पर इसे एक बड़ी रणनीतिक सफलता बताया गया है।
लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी देश के लिए अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में पूर्ण नियंत्रण स्थापित करना संभव नहीं है। यही कारण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद कई टैंकर इस क्षेत्र से गुजरते रहे हैं।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल परिवहन मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह की बाधा सीधे अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार और ऊर्जा कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
हालांकि, मौजूदा स्थिति में यह स्पष्ट हो रहा है कि पूरी तरह नाकेबंदी लागू करना संभव नहीं है, जिससे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति कुछ हद तक स्थिर बनी हुई है।
निष्कर्ष
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लेकर चल रहे घटनाक्रम ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आधुनिक भू-राजनीति और नौसैनिक शक्ति की सीमाएं भी होती हैं। अमेरिका जैसी महाशक्ति की मौजूदगी के बावजूद कई टैंकरों का सुरक्षित निकलना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और वैकल्पिक मार्ग किसी भी पूर्ण नाकेबंदी को जटिल बना देते हैं।
भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति ऊर्जा सुरक्षा और कूटनीतिक रणनीति दोनों के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण है। आने वाले समय में यह क्षेत्र वैश्विक राजनीति और ऊर्जा आपूर्ति का प्रमुख केंद्र बना रहेगा।
