शासकीय महाविद्यालय आठनेर में ‘सोमनाथ संवाद’ व्याख्यानमाला आयोजित
सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के तहत ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ विषय पर वक्ताओं ने रखे विचार
आठनेर। शासकीय महाविद्यालय आठनेर में गुरुवार को सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के उपलक्ष्य में ‘सोमनाथ संवाद’ व्याख्यानमाला का आयोजन किया गया। कार्यक्रम महाविद्यालय की प्राचार्य डॉ. सरोज पाटील की अध्यक्षता में हुआ। व्याख्यान का विषय ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ रखा गया। वक्ताओं ने भारतीय संस्कृति, इतिहास, आत्मसम्मान और सामाजिक परिवर्तन के संदर्भ में इस विषय पर अपने विचार साझा किए।
कार्यक्रम की शुरुआत मां सरस्वती के चित्र पर पुष्प अर्पित कर की गई। इसके बाद मुख्य वक्ता डॉ. विकेश कुमार सिंह ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास में सांस्कृतिक पुनर्जागरण एक युगांतकारी घटना रही है। इसके माध्यम से समाज को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ने का अवसर मिला।
अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझने पर जोर
डॉ. सिंह ने कहा कि किसी भी समाज के लिए अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझना जरूरी है। संस्कृति केवल पुरानी परंपराओं का संग्रह नहीं, बल्कि समाज के विचारों, मूल्यों और जीवनशैली से जुड़ी पहचान भी है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण लोगों को अपने इतिहास और परंपराओं के प्रति जागरूक करता है तथा उनमें आत्मगौरव की भावना विकसित करने में मदद करता है।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि वे भारतीय इतिहास और संस्कृति का अध्ययन करते हुए उसके विभिन्न पक्षों को समझें। अपनी विरासत से परिचित होना समाज को अपनी पहचान और मूल्यों के प्रति सजग बनाता है। साथ ही, परंपराओं को वर्तमान समय के संदर्भ में समझकर उनके उपयोगी पक्षों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
आत्मचेतना और रचनात्मकता की प्रक्रिया
दूसरे वक्ता डॉ. निर्मल कुमार बिश्वास ने सांस्कृतिक पुनर्जागरण को किसी राष्ट्र की आत्मचेतना, आत्मसम्मान और रचनात्मक क्षमता को जागृत करने की प्रक्रिया बताया। उन्होंने कहा कि जब समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझता है, तब उसमें आत्मविश्वास और नई दिशा में आगे बढ़ने की क्षमता विकसित होती है।
डॉ. बिश्वास ने बताया कि सांस्कृतिक चेतना समाज को अपने अनुभवों और परंपराओं पर विचार करने का अवसर देती है। यह प्रक्रिया लोगों को अपनी पहचान के प्रति जागरूक करने के साथ-साथ नए विचारों और रचनात्मक कार्यों के लिए भी प्रेरित करती है। उन्होंने विद्यार्थियों को इतिहास और समाज से जुड़े विषयों पर गंभीरता से विचार करने की प्रेरणा दी।
परंपरा और आधुनिकता में संतुलन जरूरी
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्राचार्य डॉ. सरोज पाटील ने कहा कि भारत के लिए सांस्कृतिक पुनर्जागरण का अर्थ अपनी समृद्ध विरासत को समझना और उसकी उपयोगी परंपराओं को आगे बढ़ाना है। उन्होंने कहा कि सामाजिक कुरीतियों से मुक्त होकर आधुनिकता के साथ संतुलन स्थापित करना भी इस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
उन्होंने कहा कि संस्कृति के नाम पर हर पुरानी प्रथा को अपनाना आवश्यक नहीं है। समाज को उन परंपराओं को आगे बढ़ाना चाहिए, जो मानवीय मूल्यों और सामाजिक विकास में सहायक हों। वहीं, कुरीतियों को छोड़कर शिक्षा, विवेक और आधुनिक सोच को अपनाना चाहिए। इस तरह परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन बनाया जा सकता है।
विद्यार्थियों और स्टाफ की रही सहभागिता
व्याख्यानमाला में महाविद्यालय के शैक्षणिक और अशैक्षणिक स्टाफ के साथ बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने वक्ताओं के विचार सुने और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के विभिन्न पहलुओं को समझा। कार्यक्रम का मंच संचालन डॉ. गजानंद ठाकरे ने किया। अंत में प्रो. हरिकिशन कोगे ने आभार व्यक्त किया।
‘सोमनाथ संवाद’ व्याख्यानमाला के माध्यम से विद्यार्थियों को भारतीय इतिहास, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक परिवर्तन से जुड़े विषयों पर विचार करने का अवसर मिला। कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि अपनी विरासत को समझते हुए उपयोगी परंपराओं को आगे बढ़ाना और सामाजिक कुरीतियों से मुक्त रहना ही सांस्कृतिक जागरूकता का सार है।
