पड़ाना में 500 साल पुराना मां आशापुरी का दरबार, बरगद के नीचे आज भी विराजित है चंदन की प्रतिमा
1785 विक्रम संवत में हुई थी प्रतिमा की विधिवत प्रतिष्ठा, संतान प्राप्ति की मनोकामना के लिए उल्टा स्वास्तिक बनाने की अनूठी परंपरा; शेर के पदचिह्नों से जुड़ी है ‘शेर की बाट’ की मान्यता
Sarangpur । आस्था, परंपरा और ऐतिहासिक मान्यताओं को अपने भीतर समेटे पड़ाना नगर के दक्षिणांचल में सघन वन क्षेत्र के बीच स्थित मां आशापुरी का प्राचीन धाम श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। शेर की बाट के नाम से प्रसिद्ध वन मार्ग पर स्थित यह मंदिर करीब पांच शताब्दी पुराना बताया जाता है। पुजारी परिवार के अनुसार, यहां मां की चंदन निर्मित प्रतिमा बरगद के पेड़ के नीचे आज भी अपने मूल स्थान पर विराजित है। विक्रम संवत 1785, यानी वर्ष 1728 ईस्वी में प्रतिमा की विधिवत प्रतिष्ठा की गई थी। इस लिहाज से प्रतिष्ठा के लगभग 298 वर्ष पूरे हो चुके हैं।500-Year-Old Maa Ashapuri Shrine in Padana:
नवरात्रि के दौरान मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। ग्रामीण क्षेत्रों के साथ-साथ शहरी इलाकों से भी भक्त मां के दर्शन करने पहुंचते हैं। मान्यता है कि मां आशापुरी अपने दरबार में आने वाले भक्तों की मनोकामनाएं सुनती हैं।
बरगद के नीचे विराजित चंदन की प्रतिमा से जुड़ी है प्राचीन कथा
पुजारी परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही जानकारी के अनुसार, रियासतकाल से पहले इस क्षेत्र में घना जंगल हुआ करता था। इसी स्थान पर रंगरेज समाज का एक संतानहीन दंपति कपड़े रंगने का काम करता था। बताया जाता है कि दंपति बरगद के नीचे विराजित चंदन की प्रतिमा के समक्ष संतान प्राप्ति की कामना करता था।
इस प्राचीन स्थल की विशेषता यह है कि चंदन से निर्मित प्रतिमा आज भी उसी बरगद के नीचे स्थापित है। बाद में मंदिर का पक्का निर्माण इस तरह कराया गया कि बरगद के पेड़ को सुरक्षित रखा जा सके। पेड़ और प्रतिमा का यह साथ मंदिर की प्राचीन पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।
राजा जीवाजी राव पवार ने कराई थी विधिवत प्रतिष्ठा
स्थानीय परंपरा के अनुसार, देवास की छोटी पाती रियासत के संस्थापक राजा जीवाजी राव पवार को मां आशापुरी ने स्वप्न में दर्शन दिए थे। इसके बाद विक्रम संवत 1785 में बरगद के नीचे बने कच्चे चबूतरे पर प्रतिमा की विधिवत प्रतिष्ठा कराई गई और नियमित पूजा-अर्चना का क्रम शुरू हुआ।
बताया जाता है कि बाद में राजा ने सारंगपुर के कुशल कारीगरों की सहायता से चबूतरे का जीर्णोद्धार कराया और पक्का निर्माण करवाया। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह निर्माण आज भी अपने मूल स्वरूप की झलक प्रस्तुत करता है। इसी कालखंड में हाट बॉडी रोड पर स्थित टाल वाली माता मंदिर का निर्माण भी कराया गया था।

संतान प्राप्ति के लिए उल्टा स्वास्तिक बनाने की परंपरा
मां आशापुरी के दरबार में संतान प्राप्ति की कामना से जुड़ी एक अनूठी परंपरा प्रचलित है। मान्यता के अनुसार, संतान की इच्छा रखने वाले दंपति मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाकर मां से मन्नत मांगते हैं। मनोकामना पूरी होने पर वे दोबारा मंदिर पहुंचकर सीधा स्वास्तिक बनाते हैं और विधिवत पूजा-अर्चना करते हैं।
यह परंपरा पीढ़ियों से श्रद्धालुओं की आस्था का हिस्सा बनी हुई है। नवरात्रि के दौरान इस मान्यता के चलते भी बड़ी संख्या में भक्त मंदिर पहुंचकर मां आशापुरी के दर्शन करते हैं।
हलवा और पान का विशेष भोग
मंदिर में मां आशापुरी को हलवा और पान का विशेष भोग अर्पित किए जाने की परंपरा है। समय के साथ ग्रामीणों के जनसहयोग से यह प्राचीन धार्मिक स्थल भव्य मंदिर का रूप ले चुका है। इसके बावजूद बरगद के नीचे विराजित प्रतिमा और उससे जुड़ी पुरानी परंपराएं मंदिर की विशिष्ट पहचान बनी हुई हैं।
नवरात्रि के नौ दिनों में यहां विशेष धार्मिक गतिविधियां होती हैं। श्रद्धालु पूजा-अर्चना कर परिवार की सुख-समृद्धि और मनोकामनाओं की पूर्ति की प्रार्थना करते हैं।
‘शेर की बाट’ नाम के पीछे की रोचक मान्यता
मां आशापुरी मंदिर तक पहुंचने वाले वन मार्ग को ‘शेर की बाट’ कहा जाता है। बुजुर्गों के अनुसार, जब मंदिर में कच्चा चबूतरा हुआ करता था, तब सुबह पुजारी को चबूतरे पर शेर के पदचिह्न दिखाई देते थे। स्थानीय मान्यता थी कि मां स्वयं शेर पर सवार होकर यहां आती हैं।
इसी मान्यता के चलते पड़ाना से काकरिया तक जाने वाले वन मार्ग का नाम ‘शेर की बाट’ प्रचलित हो गया। आज भी स्थानीय लोग इस मार्ग को इसी नाम से जानते हैं। यह कथा मंदिर से जुड़ी लोकआस्था और पीढ़ियों से चली आ रही परंपराओं का हिस्सा है।
आस्था और विरासत का अनूठा संगम
मां आशापुरी का प्राचीन धाम केवल पूजा-अर्चना का स्थल नहीं, बल्कि पड़ाना क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। बरगद के नीचे स्थापित चंदन की प्रतिमा, रियासतकाल से जुड़ी कथाएं, संतान प्राप्ति की मान्यता और ‘शेर की बाट’ की लोककथा इस मंदिर को विशिष्ट बनाती हैं। नवरात्रि के अवसर पर यहां उमड़ने वाली श्रद्धालुओं की भीड़ इस प्राचीन धाम के प्रति लोगों की गहरी आस्था को दर्शाती है।
