कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर विधि-विधान से ग्रहण की जाएगी पवित्र कुशा
सालभर पूजा-पाठ, यज्ञ, श्राद्ध और तर्पण में होता है उपयोग, मंत्रोच्चार के साथ जड़ से उखाड़ने की परंपरा
बम्होरी। भाद्रपद मास की अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या, कुशग्रहणी अमावस्या अथवा कुशी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन पूजा-पाठ, हवन, यज्ञ, श्राद्ध और पितृ तर्पण जैसे धार्मिक कार्यों में उपयोग की जाने वाली पवित्र कुशा को विधि-विधान के साथ ग्रहण कर सुरक्षित रखा जाता है।
मान्यता है कि कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर विधिपूर्वक ग्रहण की गई कुशा का उपयोग पूरे वर्ष विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और कर्मकांडों में किया जा सकता है। इसी कारण पुरोहित, कर्मकांडी ब्राह्मण और श्रद्धालु इस दिन विशेष रूप से कुशा का संग्रह करते हैं।
प्रातः स्नान के बाद ग्रहण करें कुशा
पंडित लक्ष्मीनारायण आचार्य और अमित व्यास ने बताया कि धार्मिक परंपरा के अनुसार कुशा को प्रातःकाल स्नान करने के बाद ग्रहण करना शुभ माना गया है। कुशा ग्रहण करते समय व्यक्ति का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए।
उन्होंने बताया कि कुशा को चाकू, हंसिया या कैंची से काटने के बजाय दाहिने हाथ से जड़ सहित एक बार में उखाड़ने की परंपरा है। कुशा ग्रहण करते समय मन में श्रद्धा, पवित्रता और धार्मिक भावना का होना भी आवश्यक माना गया है।
स्वच्छ और हरी-भरी कुशा का करें चयन
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा और कर्मकांड के लिए हमेशा हरी-भरी, स्वच्छ, साबुत और बिना कटी-फटी कुशा का चयन करना चाहिए। गंदे स्थान, श्मशान अथवा रास्ते में उगी हुई कुशा को धार्मिक कार्यों में इस्तेमाल नहीं किया जाता।
कुशा ग्रहण करने से पहले आसपास के स्थान की स्वच्छता का ध्यान रखने की भी परंपरा है। उखाड़ी गई कुशा को जमीन पर इधर-उधर रखने के बजाय साफ कपड़े या पात्र में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
कुशा उखाड़ते समय करें मंत्रोच्चार
पंडितों के अनुसार कुशा ग्रहण करते समय मंत्रोच्चार करने की परंपरा है। इस दौरान श्रद्धालु निम्न मंत्र का जाप कर सकते हैं—
“विरंचिना सहोत्पन्न परमेष्ठिनिसर्गज।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव॥”
एक अन्य प्रचलित मंत्र इस प्रकार है—
“कुशाग्रे वसते रुद्रः कुशमध्ये तु केशवः।
कुशमूले वसते ब्रह्मा कुशमे देहि मेदिनि॥”
मान्यता है कि मंत्रोच्चार के साथ विधिपूर्वक ग्रहण की गई कुशा को घर के किसी स्वच्छ और पवित्र स्थान पर सुरक्षित रखना चाहिए। इसकी पवित्रता बनाए रखने के लिए इसे पैरों से छूने या अपवित्र स्थान पर रखने से बचना चाहिए।
एक वर्ष तक धार्मिक कार्यों में उपयोग
कुशा का उपयोग पूजा-पाठ के साथ हवन, यज्ञ, जप, श्राद्ध, पितृ तर्पण और अन्य वैदिक कर्मकांडों में किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान कुशा से बनी पवित्री को अंगुली में धारण करने की परंपरा भी है। इसके अतिरिक्त आसन और पूजन सामग्री के रूप में भी इसका प्रयोग किया जाता है।
मान्यता के अनुसार कुशोत्पाटिनी अमावस्या पर ग्रहण की गई कुशा वर्षभर उपयोग के योग्य रहती है। नई कुशा ग्रहण करने के बाद पिछले वर्ष की बची हुई कुशा को सम्मानपूर्वक अग्नि में समर्पित करने अथवा पवित्र जल में प्रवाहित करने की परंपरा भी बताई गई है।
वैदिक कर्मकांड में कुशा का विशेष महत्व
धार्मिक मान्यताओं में कुशा को सामान्य घास नहीं, बल्कि वैदिक अनुष्ठानों की महत्वपूर्ण और पवित्र सामग्री माना गया है। पूजा के दौरान शुद्धता बनाए रखने, संकल्प लेने और विभिन्न कर्मकांडों को विधिपूर्वक पूर्ण करने में इसका विशेष स्थान बताया गया है।
यही कारण है कि भाद्रपद अमावस्या के दिन कुशा ग्रहण करने की परंपरा प्राचीन समय से चली आ रही है। श्रद्धालु इस दिन स्नान और पूजा के बाद मंत्रोच्चार करते हुए कुशा ग्रहण करते हैं तथा उसे पूरे वर्ष के धार्मिक अनुष्ठानों के लिए श्रद्धापूर्वक सुरक्षित रखते हैं।
