सामर्थ्य को पहचानो, आत्मा के विष को छोड़कर कल्याण की ओर बढ़ो: मुनिश्री सुधासागर महाराज
धर्म असमर्थों का नहीं, समर्थों का मार्ग; सच्चा ज्ञान वही जो व्यवहार में बदलाव लाए
मुनिश्री ने कहा कि धर्म असमर्थों का नहीं, बल्कि समर्थ व्यक्तियों का मार्ग है। धर्म का अर्थ संसार से भागना नहीं, बल्कि अपनी सामर्थ्य को पहचानकर उसकी दिशा बदलना है। मनुष्य के भीतर संसार के कार्यों, क्रोध, हिंसा, असत्य और अन्य विकारों में शक्ति लगाने की जितनी क्षमता है, यदि उसी शक्ति को अहिंसा, सत्य, क्षमा, संयम, विनय और आत्मकल्याण में लगाया जाए तो जीवन का वास्तविक रूपांतरण हो सकता है।
अपनी शक्ति का ‘थर्मामीटर’ लगाएं
मुनिश्री ने आत्ममंथन की प्रेरणा देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपनी शक्ति का ‘थर्मामीटर’ लगाकर स्वयं से पूछना चाहिए कि उसके भीतर कितनी सामर्थ्य है। कमजोरी या असमर्थता के कारण किया गया त्याग महान नहीं माना जा सकता। सामर्थ्य और अवसर होने के बावजूद गलत मार्ग का त्याग करना ही वास्तविक त्याग है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को केवल अपने वर्तमान जीवन को देखकर स्वयं को बहुत बड़ा धर्मात्मा नहीं मान लेना चाहिए। जीव ने अनंत काल से संसार में अनेक प्रकार के राग, द्वेष, क्रोध, मोह और कषायों को भोगा है। ऐसे में अपने दोषों को छिपाने के बजाय उन्हें स्वीकार करना और उनसे बाहर निकलने का दृढ़ संकल्प लेना आवश्यक है।
अनंत बार किए कार्यों को फिर क्यों दोहराएं?
मुनिश्री ने श्रद्धालुओं से प्रश्न करते हुए कहा, “जो अनंत बार कर चुके हो, उसे फिर क्यों दोहराना?” संसार, राग-द्वेष और कषायों को बार-बार दोहराने के बजाय अब आत्मकल्याण की दिशा में कुछ नया करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि पूजा, अभिषेक, व्रत और मंदिर जाना महत्वपूर्ण धार्मिक क्रियाएं हैं, लेकिन इनके साथ व्यक्ति को यह भी देखना चाहिए कि उसके भीतर क्रोध कितना कम हुआ, अहंकार कितना घटा और आत्मा की ओर उसका उपयोग कितना बढ़ा। यदि धार्मिक क्रियाओं के बाद भी स्वभाव और व्यवहार में परिवर्तन नहीं आया तो व्यक्ति को अपनी साधना पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
गुरु भक्ति के नाम पर पक्षपात उचित नहीं
धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने बताया कि मुनिश्री ने ज्ञान के अहंकार से बचने की प्रेरणा देते हुए भगवान ऋषभदेव और मारीच के प्रसंग के माध्यम से धर्म में पक्षपात नहीं करने का संदेश दिया।
मुनिश्री ने कहा कि किसी एक गुरु के प्रति भक्ति रखते हुए दूसरे गुरु की निंदा करना सच्ची भक्ति नहीं, बल्कि पक्षपात है। सम्यक दृष्टि किसी व्यक्ति विशेष को नहीं, बल्कि उसके गुणों और सत्य को देखती है। इसलिए गुरु में व्यक्ति से अधिक उनके गुणों को देखना चाहिए। धर्म के क्षेत्र में अपने और पराए के भेद से ऊपर उठकर गुणों के प्रति श्रद्धा रखनी चाहिए।
आत्मा के लिए विष हैं क्रोध और अहंकार
मुनिश्री ने धर्मसभा में प्रभावशाली उदाहरण देते हुए कहा कि यदि किसी व्यक्ति को पता चल जाए कि उसके सामने रखे गिलास में जहर है तो वह उसे पीने के लिए अगले दिन का इंतजार नहीं करेगा, बल्कि उसे तुरंत फेंक देगा।
इसी प्रकार जब मनुष्य को यह बोध हो जाए कि क्रोध, राग, द्वेष, अहंकार, लोभ और आसक्ति आत्मा के लिए विष हैं, तो इन्हें छोड़ने का निर्णय भी भविष्य के लिए नहीं टालना चाहिए। बुराइयों के त्याग और आत्मकल्याण की शुरुआत उसी क्षण कर देनी चाहिए, जब सत्य का बोध हो जाए।
मुनिश्री ने कहा—
“ज्ञान वही है, जो निर्णय पैदा करे।
बोध वही है, जो व्यवहार बदल दे।
त्याग वही है, जो सत्य समझ में आते ही शुरू हो जाए।”
बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी रहे उपस्थित
धर्मसभा में ब्रह्मचारी प्रदीप भैया, पारस भैया, आनंद नवीन गोधा, चक्रवर्ती मनीष-सपना गोधा, सामाजिक संसद अध्यक्ष अशोक डोशी, हर्ष जैन, प्रिंसपाल टोंग्या, संजय पाटोदी, मयंक जैन, डॉ. जैनेन्द्र जैन, भूपेंद्र जैन, कमल जैन, विकास पाटोदी, अखिलेश सोधिया, कमल अग्रवाल, रानी डोशी, मुक्ता जैन, अर्चना गोधा और सोनाली बगड़िया सहित बड़ी संख्या में धर्मप्रेमी एवं समाजजन उपस्थित रहे। सभी श्रद्धालुओं ने मुनिश्री की अमृतवाणी का श्रवण कर धर्मलाभ प्राप्त किया।
