RBI Repo Rate: अक्टूबर में 0.25% बढ़ सकती है रेपो रेट, महंगी होगी होम और कार लोन की EMI; SBI रिसर्च का अनुमान
कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और महंगाई के दबाव के बीच SBI रिसर्च ने अक्टूबर और दिसंबर में 25-25 बेसिस प्वाइंट बढ़ोतरी की जताई संभावना
दैनिक स्वराज वाणी, बिजनेस डेस्क। अगर आपने बैंक से होम, कार, पर्सनल या एजुकेशन लोन लिया है तो आने वाले महीनों में आपकी EMI बढ़ सकती है। भारतीय स्टेट बैंक की रिसर्च रिपोर्ट में भारतीय रिजर्व बैंक को अक्टूबर 2026 की मौद्रिक नीति बैठक में रेपो रेट 25 बेसिस प्वाइंट यानी 0.25 प्रतिशत बढ़ाने का सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट में दिसंबर की बैठक में भी इतनी ही वृद्धि की संभावना जताई गई है।
हालांकि यह SBI रिसर्च का आकलन और सुझाव है, भारतीय रिजर्व बैंक का घोषित फैसला नहीं। रेपो रेट में बदलाव का अंतिम निर्णय RBI की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति यानी MPC आर्थिक आंकड़ों, खुदरा महंगाई, विकास दर, कच्चे तेल की कीमत और वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों की समीक्षा के बाद करेगी।
अक्टूबर में 5.50 प्रतिशत हो सकती है रेपो रेट
RBI ने दिसंबर 2025 में रेपो रेट 25 आधार अंक घटाकर 5.25 प्रतिशत कर दी थी। इसके बाद केंद्रीय बैंक ने इसे इसी स्तर पर बनाए रखा। यदि अक्टूबर की बैठक में 25 आधार अंक की बढ़ोतरी होती है तो रेपो रेट 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो जाएगी।
यदि दिसंबर में भी SBI रिसर्च के अनुमान के अनुसार 25 आधार अंक की दूसरी वृद्धि होती है तो रेपो रेट 5.75 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इसका असर बैंकों द्वारा दिए जाने वाले नए कर्ज और रेपो रेट से जुड़े मौजूदा फ्लोटिंग रेट लोन पर पड़ सकता है।
SBI की Ecowrap रिपोर्ट में बढ़ती महंगाई, महंगा कच्चा तेल और वैश्विक बॉन्ड यील्ड को मौद्रिक नीति के सामने बड़ी चुनौती बताया गया है।
क्यों बढ़ सकती है रेपो रेट?
SBI रिसर्च के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारत में महंगाई का दबाव बढ़ा सकती है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ता है।
कच्चा तेल महंगा होने का प्रभाव केवल पेट्रोल और डीजल की कीमतों तक सीमित नहीं रहता। परिवहन लागत बढ़ने से फल, सब्जी, अनाज, दूध और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है। उत्पादन और माल ढुलाई महंगी होने का असर उद्योगों पर भी पड़ता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि महंगाई का दायरा बढ़ने और बाहरी आर्थिक झटकों से निपटने के लिए ब्याज दर में वृद्धि आवश्यक हो सकती है। SBI रिसर्च ने अनुमान लगाया है कि तेल की कीमत लंबे समय तक ऊंची रहने पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा महंगाई 6.5 प्रतिशत तक पहुंच सकती है।
रेपो रेट क्या होती है?
रेपो रेट वह ब्याज दर है, जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक वाणिज्यिक बैंकों को अल्प अवधि के लिए पैसा उधार देता है। रेपो रेट कम होने पर बैंकों के लिए RBI से धन लेना सस्ता होता है। ऐसी स्थिति में बैंक ग्राहकों को कम ब्याज दर पर कर्ज उपलब्ध करा सकते हैं।
इसके विपरीत, रेपो रेट बढ़ने पर बैंकों के लिए धन की लागत बढ़ जाती है। इसके बाद बैंक होम, कार, पर्सनल और अन्य प्रकार के लोन की ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकते हैं। दरें बढ़ने से नए ग्राहकों का लोन महंगा हो जाता है, जबकि मौजूदा फ्लोटिंग रेट कर्जदारों की EMI या लोन की अवधि बढ़ सकती है।
किन ग्राहकों पर पड़ेगा सीधा असर?
रेपो रेट बढ़ने का सबसे सीधा प्रभाव एक्सटर्नल बेंचमार्क लेंडिंग रेट यानी EBLR से जुड़े फ्लोटिंग रेट लोन पर पड़ सकता है। कई बैंकों के होम और रिटेल लोन सीधे RBI की रेपो रेट से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में रेपो रेट बढ़ने के बाद बैंक निर्धारित रीसेट अवधि के अनुसार ब्याज दर संशोधित कर सकते हैं।
फिक्स्ड ब्याज दर वाले कर्ज पर इसका तत्काल असर सामान्यतः नहीं पड़ता, क्योंकि उनकी ब्याज दर तय अवधि के लिए निश्चित रहती है। हालांकि फिक्स्ड रेट लोन के नियम प्रत्येक बैंक और ऋण समझौते के अनुसार अलग हो सकते हैं।
MCLR से जुड़े पुराने लोन पर भी प्रभाव बैंक की फंड लागत और रीसेट तारीख के आधार पर पड़ता है। इसलिए प्रत्येक ग्राहक को अपने लोन दस्तावेज में यह देखना चाहिए कि उसका कर्ज रेपो रेट, EBLR, RLLR या MCLR में से किससे जुड़ा है।
कितनी बढ़ सकती है आपकी EMI?
मान लीजिए किसी व्यक्ति पर 50 लाख रुपये का होम लोन बकाया है और उसकी शेष अवधि 20 वर्ष है। यदि मौजूदा ब्याज दर 8 प्रतिशत है तो उसकी अनुमानित मासिक EMI करीब 41,822 रुपये होगी। ब्याज दर 0.25 प्रतिशत बढ़कर 8.25 प्रतिशत होने पर EMI करीब 42,603 रुपये हो सकती है। यानी हर महीने लगभग 781 रुपये और साल में करीब 9,372 रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
इसी प्रकार 30 लाख रुपये के 20 वर्ष के होम लोन पर ब्याज दर 8 प्रतिशत से बढ़कर 8.25 प्रतिशत होने पर EMI लगभग 25,093 रुपये से बढ़कर करीब 25,562 रुपये हो सकती है। यह करीब 469 रुपये प्रतिमाह की वृद्धि होगी।
ये केवल अनुमानित उदाहरण हैं। वास्तविक EMI लोन की शेष मूल राशि, अवधि, मौजूदा ब्याज दर, बैंक की स्प्रेड दर और रीसेट नियमों पर निर्भर करेगी।
EMI नहीं बढ़ी तो अवधि हो सकती है लंबी
कई बैंक ब्याज दर बढ़ने पर तुरंत EMI बढ़ाने के बजाय सबसे पहले कर्ज की अवधि बढ़ा देते हैं। इससे ग्राहक की मासिक किस्त तो समान रहती है, लेकिन उसे अधिक महीनों या वर्षों तक EMI चुकानी पड़ती है। लंबी अवधि के कारण कुल ब्याज भुगतान काफी बढ़ सकता है।
यदि लोन की अवधि निर्धारित अधिकतम सीमा तक पहुंच चुकी है तो बैंक EMI बढ़ा सकता है या ग्राहक से आंशिक भुगतान करने के लिए कह सकता है। ग्राहकों को बैंक से संशोधित पुनर्भुगतान तालिका लेकर देखना चाहिए कि ब्याज दर बढ़ने से उनके कुल भुगतान पर कितना प्रभाव पड़ेगा।
कर्जदार अभी क्या कर सकते हैं?
फ्लोटिंग रेट लोन वाले ग्राहक अपने बैंक से मौजूदा ब्याज दर, बेंचमार्क और अगली रीसेट तारीख की जानकारी ले सकते हैं। अतिरिक्त धन उपलब्ध होने पर लोन का आंशिक पूर्व भुगतान करने से मूल राशि और कुल ब्याज का बोझ कम किया जा सकता है।
दूसरे बैंक में कम ब्याज दर मिलने पर बैलेंस ट्रांसफर भी एक विकल्प हो सकता है, लेकिन निर्णय से पहले प्रोसेसिंग फीस, कानूनी खर्च, दस्तावेज शुल्क और नई ब्याज दर की शर्तों को जोड़कर कुल बचत की गणना करनी चाहिए।
ग्राहकों को केवल SBI के अनुमान के आधार पर जल्दबाजी में वित्तीय फैसला नहीं लेना चाहिए। RBI की अगली मौद्रिक नीति के आधिकारिक फैसले और अपने बैंक की सूचना का इंतजार करना उचित होगा। अगस्त 2026 की बैठक में RBI ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर स्थिर रखा था।
