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पर्युषण पर्व: आत्मशुद्धि, क्षमा और अहिंसा का संदेश, मन का अंधियारा मिटाकर रिश्तों में प्रेम जगाने का आह्वान

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Published On: 7 September 2026
पर्युषण

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पर्युषण पर्व आत्मशुद्धि, क्षमा और अहिंसा का संदेश देता है

मन का अंधियारा मिटाकर राग-द्वेष और अहंकार त्यागने का पर्व है पर्युषण

राजस्थान। श्री मार्तंड फाउंडेशन की ओर से पर्युषण पर्व के अवसर पर आत्मशुद्धि, तप, साधना, क्षमा और अहिंसा का संदेश दिया गया। इस अवसर पर पूनम रमेश गांधी ने अपनी भावपूर्ण रचना के माध्यम से पर्युषण पर्व की आध्यात्मिक महत्ता को रेखांकित करते हुए लोगों से आत्मचिंतन करने और अपने व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाने का आह्वान किया।

उन्होंने कहा कि पर्युषण महापर्व भक्ति, तप और साधना के माध्यम से आत्मा को शुद्ध करने का अवसर प्रदान करता है। यह पर्व मन के भीतर छाए अंधकार को दूर करने, क्रोध को कम करने, अहंकार का त्याग करने और धर्म के प्रति मन को एकाग्र करने की प्रेरणा देता है।

पर्युषण के दौरान व्यक्ति को अपने भीतर झांककर अपनी गलतियों और कमियों को पहचानने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में किसी से मनमुटाव हो गया हो तो उसे दूर कर रिश्तों में फिर से प्रेम और अपनापन स्थापित करना चाहिए। जो लोग रूठे हैं, उन्हें मनाना और जो दुखी हैं, उन्हें प्रेमपूर्वक गले लगाना ही इस पर्व की सार्थकता है।

क्षमा से मजबूत होते हैं रिश्ते

पूनम रमेश गांधी ने कहा कि पर्युषण पर्व हमें अहंकार को मन से निकालने और क्षमा की भावना अपनाने की सीख देता है। मनुष्य से जाने-अनजाने अनेक गलतियां हो सकती हैं। कभी हमारे शब्दों से किसी को ठेस पहुंच सकती है तो कभी हमारे व्यवहार से किसी का मन दुखी हो सकता है। ऐसे में आत्मचिंतन कर अपनी भूल स्वीकार करना और सामने वाले से क्षमा मांगना आवश्यक है।

क्षमा केवल एक औपचारिकता नहीं, बल्कि मन की निर्मलता का प्रतीक है। जब व्यक्ति अहंकार और क्रोध को छोड़कर क्षमा का मार्ग अपनाता है, तो रिश्तों में आई दूरियां कम होती हैं और समाज में प्रेम, सौहार्द एवं भाईचारे की भावना मजबूत होती है।

अहिंसा को जीवन में अपनाने का आह्वान

पर्युषण पर्व का एक प्रमुख संदेश अहिंसा है। प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और संवेदना रखना जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं में शामिल है। इस अवसर पर लोगों से ऐसा आचरण करने की प्रेरणा दी गई, जिससे किसी भी व्यक्ति या जीव को हमारी वजह से दुख या ठेस न पहुंचे।

सच्चा धर्म वही है, जिससे किसी हृदय को पीड़ा न हो और हमारे कारण किसी जीव के प्रति हिंसा न हो। पर्युषण का संदेश मनुष्य को अपने विचारों, वाणी और कर्मों में संयम रखने की प्रेरणा देता है।

आत्मचिंतन से जीवन में आए सकारात्मक बदलाव

पर्युषण पर्व व्यक्ति को बाहरी गतिविधियों के साथ-साथ आत्मचिंतन का अवसर भी देता है। इस दौरान मनुष्य को अपने बीते व्यवहार पर विचार करना चाहिए और यह समझने का प्रयास करना चाहिए कि उससे जाने-अनजाने किसी को दुख तो नहीं पहुंचा।

यदि किसी व्यक्ति को हमारी वजह से पीड़ा हुई हो, तो मन, वचन और काया से क्षमा मांगना आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसी भावना के साथ ‘मिच्छामि दुक्कड़म्’ कहा जाता है, जिसका भाव है कि जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करना।

श्री मार्तंड फाउंडेशन की ओर से दिए गए इस संदेश में कहा गया कि पर्युषण केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने का अवसर है। यह हमें सिखाता है कि क्रोध के स्थान पर शांति, अहंकार के स्थान पर विनम्रता, द्वेष के स्थान पर प्रेम और कटुता के स्थान पर क्षमा को अपनाया जाए।

पर्युषण पर्व के माध्यम से समाज में आपसी प्रेम, सद्भाव, करुणा और अहिंसा की भावना को मजबूत करने का संदेश दिया गया। आत्मा की शुद्धि के साथ-साथ यदि व्यक्ति अपने व्यवहार में भी परिवर्तन लाए और दूसरों के प्रति संवेदनशील बने, तभी इस महापर्व की वास्तविक भावना सार्थक होगी।

संदेश: किसी के मन को हमारी वजह से ठेस लगी हो या जाने-अनजाने कोई भूल हुई हो तो मन, वचन और काया से क्षमा याचना करें— मिच्छामि दुक्कड़म्। 🙏

पूनम रमेश गांधी, राजस्थान

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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