पर्व पर्युषण: आत्मशुद्धि, क्षमा और अहिंसा का पावन संदेश
मुंबई। जैन धर्म में पर्युषण पर्व को आत्मशुद्धि, संयम, तपस्या और आत्मचिंतन का पावन अवसर माना गया है। यह पर्व व्यक्ति को बाहरी आडंबर से दूर होकर अपने भीतर झांकने, राग-द्वेष और अहंकार का त्याग करने तथा आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। कवि छगनलाल मुथा ‘सान्डेराव’, मुंबई ने अपनी रचना के माध्यम से पर्युषण पर्व की आध्यात्मिक महत्ता और इसके जीवनोपयोगी संदेश को प्रभावी रूप से प्रस्तुत किया है।
पर्युषण के दौरान श्रद्धालु प्रभु भक्ति, पूजा-अर्चना, दान, तप और साधना के माध्यम से अपने जीवन को धर्ममय बनाने का प्रयास करते हैं। आठ दिनों की यह साधना व्यक्ति को अपने कर्मों पर विचार करने और आत्मसंयम के माध्यम से उन्हें क्षीण करने की प्रेरणा देती है। पर्व का मूल उद्देश्य केवल धार्मिक अनुष्ठान करना नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवहार और आचरण में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
कवि ने अपनी पंक्तियों के माध्यम से बताया है कि पर्युषण आत्मशुद्धि का त्योहार है। इस अवसर पर व्यक्ति को अपने हृदय से अहंकार निकालकर राग और द्वेष का त्याग करना चाहिए। जब मनुष्य अपने भीतर की नकारात्मक भावनाओं पर विजय प्राप्त करता है, तभी वह वास्तविक शांति और आत्मिक सुख की ओर बढ़ सकता है।
क्षमा और अहिंसा का संदेश
पर्युषण पर्व का सबसे महत्वपूर्ण संदेश क्षमा है। जीवन में जाने-अनजाने हुई गलतियों के लिए पश्चाताप करना और दूसरों की भूलों को क्षमा करना आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया है। कवि ने भी लोगों से अपने मन में किसी के प्रति कटुता न रखते हुए क्षमा के मार्ग पर चलने का आह्वान किया है।
क्षमा केवल शब्द नहीं, बल्कि मन की निर्मलता का प्रतीक है। जब व्यक्ति अहंकार, क्रोध, राग और द्वेष को छोड़कर क्षमा की भावना अपनाता है, तो उसके भीतर शांति का भाव विकसित होता है। यही भावना परिवार, समाज और व्यापक मानव समुदाय में आपसी प्रेम और सद्भाव को मजबूत करती है।
पर्युषण के माध्यम से विश्व को अहिंसा और शांति का संदेश देने की प्रेरणा भी मिलती है। जैन धर्म की मूल भावना के अनुरूप प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और सम्मान रखने का संदेश इस पर्व में निहित है।
आत्मचिंतन और जीवन सुधारने का अवसर
कवि छगनलाल मुथा ने अपनी रचना में व्यक्ति को बीती बातों को पीछे छोड़कर आत्मकल्याण पर ध्यान केंद्रित करने की प्रेरणा दी है। जीवन में किसी से कहा-सुनी हुई हो या किसी के साथ अच्छा-बुरा व्यवहार हुआ हो, पर्युषण आत्मचिंतन और सुधार का अवसर प्रदान करता है।
इस दौरान व्यक्ति को अपनी गलतियों को स्वीकार करते हुए उनका पश्चाताप करना चाहिए और भविष्य में उन्हें दोहराने से बचने का संकल्प लेना चाहिए। आत्मनिरीक्षण के माध्यम से मनुष्य अपने जीवन की कमियों को पहचान सकता है और उन्हें सुधारकर बेहतर जीवन की ओर बढ़ सकता है।
गुरु वाणी और धार्मिक साधना
पर्युषण पर्व के दौरान गुरु वाणी का श्रवण, पौषध, प्रतिक्रमण, पूजा, तपस्या और अन्य धार्मिक साधनाओं का विशेष महत्व है। इन साधनाओं के माध्यम से श्रद्धालु अपने मन को एकाग्र करते हैं और आत्मा की शुद्धि की दिशा में प्रयास करते हैं।
प्रतिक्रमण व्यक्ति को अपने द्वारा किए गए गलत कार्यों और विचारों का आत्मावलोकन करने का अवसर देता है। इससे मनुष्य अपनी भूलों को समझकर सुधार की दिशा में कदम बढ़ाता है। धार्मिक साधनाओं का उद्देश्य व्यक्ति को आत्मसंयम, सदाचार और मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ाना है।
कवि ने अपनी रचना के अंत में भगवान महावीर के प्रसिद्ध संदेश ‘जीओ और जीने दो’ की भावना को समाज तक पहुंचाने का आह्वान किया है। यह संदेश केवल जैन समाज के लिए ही नहीं, बल्कि संपूर्ण मानव समाज के लिए महत्वपूर्ण है।
पर्युषण पर्व हमें सिखाता है कि वास्तविक धर्म बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि मन की पवित्रता, विचारों की शुद्धता, व्यवहार की विनम्रता और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा में है। क्षमा, अहिंसा, संयम और आत्मचिंतन के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को अधिक शांत, सरल और सार्थक बना सकता है।
