—Advertisement—

भारतीय रेल के इतिहास में नाना जगन्नाथ शंकरशेठ की भूमिका पर फिर उठे सवाल

Author Picture
Published On: 7 September 2026
भारतीय रेल के इतिहास में नाना जगन्नाथ शंकरशेठ की भूमिका पर फिर उठे सवाल

—Advertisement—

भारतीय रेल की शुरुआत में नाना जगन्नाथ शंकरशेठ की भूमिका

रेलवे की शुरुआती भारतीय पहल में योगदान और जैन पहचान पर शोध की जरूरत

✍️ डॉ. जयेन्द्र जैन ‘निप्पू’, चंदेरी

भारत आज दुनिया के सबसे बड़े रेल नेटवर्कों में शामिल है। वंदे भारत से लेकर सेमी हाईस्पीड ट्रेनों तक भारतीय रेल ने लंबा सफर तय किया है। लेकिन क्या हमने कभी यह जानने का प्रयास किया कि भारत में रेल के शुरुआती दौर में भारतीयों की क्या भूमिका थी?

16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर से ठाणे के लिए पहली यात्री रेल चली। इस ऐतिहासिक घटना में अंग्रेज अधिकारी, इंजीनियर, कंपनी और तकनीक की भूमिका का उल्लेख मिलता है। लेकिन उस दौर में भारतीय समाज के भीतर रेलवे के लिए वातावरण बनाने वाले भारतीयों की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। इसी संदर्भ में नाना जगन्नाथ शंकरशेठ का नाम सामने आता है।

रेल की शुरुआती पहल में नाना की भूमिका

उन्नीसवीं सदी के मध्य में भारत में रेल एक नई तकनीक थी। इसके लिए अंग्रेजी सत्ता, पूंजी, इंजीनियरिंग और प्रशासनिक स्वीकृति की आवश्यकता थी। ऐसे समय में मुंबई के प्रभावशाली भारतीयों ने रेलवे की आवश्यकता को सामने रखा।

नाना जगन्नाथ शंकरशेठ इसी भारतीय पहल के प्रमुख चेहरों में थे। 1845 में नाना शंकरशेठ और सर जमशेदजी जीजीभॉय ने Indian Railway Association के निर्माण में भूमिका निभाई। आगे चलकर यह प्रयास Great Indian Peninsula Railway के विकास से जुड़ा। नाना उसके शुरुआती भारतीय निदेशकों में भी शामिल रहे।

इससे स्पष्ट होता है कि भारत में रेल की शुरुआत केवल सरकारी प्रयासों का परिणाम नहीं थी। भारतीय समाज के भीतर भी रेलवे को लेकर सोच, पहल और सहयोग का वातावरण तैयार हो रहा था।

WhatsApp Image 2026 09 06 at 8.11.44 PM

पहली रेल और नाना शंकरशेठ

18 नवंबर 1852 को मुंबई से ठाणे तक निर्माणाधीन रेल लाइन पर एक परीक्षण यात्रा हुई, जिसमें नाना शंकरशेठ सहित रेलवे से जुड़े प्रमुख लोग शामिल हुए।

इसके लगभग पांच महीने बाद 16 अप्रैल 1853 को मुंबई के बोरीबंदर से ठाणे के लिए भारत की पहली यात्री रेल चली। लगभग 34 किलोमीटर की इस यात्रा में 14 डिब्बे और तीन भाप इंजन—साहिब, सिंध और सुल्तान—शामिल थे।

नाना शंकरशेठ को भारत में रेल के तकनीकी निर्माण का अकेला श्रेय देना उचित नहीं होगा। रेल लाइन के निर्माण में ब्रिटिश इंजीनियरों, तकनीकी विशेषज्ञों और GIPR की महत्वपूर्ण भूमिका थी। लेकिन रेलवे की शुरुआती भारतीय पहल, उसके लिए समर्थन जुटाने और संगठनात्मक स्तर पर भारतीय भागीदारी में नाना की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर उन्हें भारतीय रेल के शुरुआती प्रमुख अग्रदूतों में से एक कहना अधिक उचित होगा।

जैन पहचान का प्रश्न

नाना जगन्नाथ शंकरशेठ की जैन पहचान को लेकर अलग-अलग दावे सामने आते रहे हैं। अनेक आधुनिक जैन प्रकाशनों में उन्हें “जगन्नाथ शंकरशेठ जैन” के रूप में प्रस्तुत किया गया है। ऐसे में यह प्रश्न महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस दावे के समर्थन में ऐतिहासिक दस्तावेज क्या कहते हैं।

क्या उनके परिवार से संबंधित कोई वंशावली, बही, दानपत्र या धार्मिक अभिलेख उपलब्ध हैं? क्या पुराने जैन भंडारों अथवा मंदिरों में उनके परिवार से संबंधित कोई प्रमाण सुरक्षित है? क्या समकालीन जैन समाज ने उन्हें अपने समुदाय के व्यक्ति के रूप में दर्ज किया था?

इन प्रश्नों पर गंभीर शोध की आवश्यकता है।

जब तक पर्याप्त दस्तावेज सामने न आएं, नाना शंकरशेठ की जैन पहचान को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय शोध और प्रमाण का विषय मानना अधिक संतुलित होगा।

इतिहास में भारतीय योगदान को उचित स्थान

भारत में पहली रेल केवल किसी एक व्यक्ति या समुदाय के प्रयास का परिणाम नहीं थी। इसके पीछे औपनिवेशिक शासन, तकनीक, पूंजी, इंजीनियरिंग, प्रशासन और भारतीय समाज के विभिन्न वर्गों की भूमिका थी।

इस पूरे परिदृश्य में नाना जगन्नाथ शंकरशेठ का योगदान महत्वपूर्ण था। उन्होंने रेलवे की शुरुआती भारतीय पहल में भाग लिया, उसके संगठनात्मक विकास में भूमिका निभाई और पहली रेल के ऐतिहासिक दौर से जुड़े रहे।

आज आवश्यकता इस बात की है कि उनके योगदान का मूल्यांकन भावनाओं या सामुदायिक आग्रहों के आधार पर नहीं, बल्कि उपलब्ध प्रमाणों और दस्तावेजों के आधार पर किया जाए।

मुंबई से ठाणे तक चली पहली रेल की वह यात्रा भारतीय आधुनिक इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय थी। उस अध्याय में नाना जगन्नाथ शंकरशेठ की भूमिका को उचित स्थान मिलना चाहिए।

और यदि भविष्य के शोध में उनकी जैन पहचान से जुड़े प्रमाण सामने आते हैं, तो वह भारतीय इतिहास के साथ-साथ जैन समाज के लिए भी महत्वपूर्ण खोज होगी।

इतिहास केवल गौरव का विषय नहीं, बल्कि प्रमाण और शोध का विषय भी है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp