आठनेर में माटी गणेश–सिद्ध गणेश अभियान की विकासखंड स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला सम्पन्न
संवाददाता : आशीष ठाकरे
मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने का दिया प्रशिक्षण, पर्यावरण संरक्षण और भारतीय संस्कृति के संरक्षण का संदेश
आठनेर। प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मार्गदर्शन एवं मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद के उपाध्यक्ष पद्मश्री मोहन नागर के निर्देशन में “माटी गणेश–सिद्ध गणेश” अभियान के अंतर्गत विकासखंड स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन आठनेर में किया गया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य गणेशोत्सव को पर्यावरण हितैषी बनाने के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्था के मूल स्वरूप को संरक्षित करना रहा। कार्यक्रम में उपस्थित प्रतिभागियों को मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने का प्रशिक्षण दिया गया तथा पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक किया गया।
कार्यशाला में विशेषज्ञ प्रशिक्षक एवं मूर्तिकार प्रदीप शनिसरे ने प्रतिभागियों को मिट्टी से गणेश प्रतिमा तैयार करने की विभिन्न प्रक्रियाओं की जानकारी दी। उन्होंने प्रतिमा निर्माण के लिए आवश्यक मिट्टी के चयन, आकार देने, प्रतिमा को आकर्षक स्वरूप प्रदान करने सहित अन्य महत्वपूर्ण बिंदुओं का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया। प्रतिभागियों ने पूरे उत्साह के साथ प्रशिक्षण में भाग लिया और स्वयं मिट्टी से गणेश प्रतिमा बनाने का प्रयास किया।
प्रकृति और संस्कृति के सामंजस्य का संदेश
कार्यशाला में उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए सामाजिक कार्यकर्ता आशुतोष सिंह चौहान ने कहा कि गणेशोत्सव केवल धार्मिक आस्था और पूजा का पर्व नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और संस्कृति के बीच संतुलन स्थापित करने का भी अवसर है। उन्होंने कहा कि भारतीय परंपरा में मिट्टी से निर्मित गणेश प्रतिमाओं की स्थापना का विशेष महत्व रहा है। मिट्टी प्रकृति का हिस्सा है और इससे निर्मित प्रतिमाओं का उपयोग पर्यावरण की दृष्टि से भी अधिक अनुकूल माना जाता है।
उन्होंने कहा कि आधुनिक समय में त्योहारों को मनाने के तौर-तरीकों में बदलाव आया है। ऐसे में जरूरी है कि धार्मिक आस्था के साथ पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता दी जाए। गणेशोत्सव के दौरान प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा करना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
आशुतोष सिंह चौहान ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि अधिक से अधिक परिवार माटी गणेश की स्थापना करें और पर्यावरण हितैषी गणेशोत्सव मनाने का संदेश आगे बढ़ाएं। उन्होंने कहा कि माटी गणेश की स्थापना प्रकृति और पर्यावरण के सामंजस्य का प्रतीक है।
पीओपी एवं रासायनिक रंगों से बचने की अपील
मध्यप्रदेश जन अभियान परिषद, आठनेर की विकासखंड समन्वयक मधु चौहान ने कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि प्लास्टर ऑफ पेरिस (पीओपी) और रासायनिक रंगों से निर्मित प्रतिमाओं के विसर्जन से जलस्रोतों की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है। प्रतिमाओं में इस्तेमाल होने वाली कुछ सामग्री पानी में घुलने के बाद जल एवं जलीय पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है।
उन्होंने कहा कि मिट्टी से बनी प्राकृतिक गणेश प्रतिमाओं को अपनाना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक सहज और महत्वपूर्ण पहल है। इसके माध्यम से धार्मिक परंपरा का निर्वहन करते हुए प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी भी निभाई जा सकती है।
उन्होंने प्रतिभागियों से कहा कि वे प्रशिक्षण से प्राप्त जानकारी को अपने-अपने गांवों, मोहल्लों और सामाजिक समूहों तक पहुंचाएं, ताकि माटी गणेश अभियान को व्यापक जनभागीदारी मिल सके।
घर में विसर्जन को बताया उपयोगी विकल्प
ताप्ती प्रवास नागरिक सेवा समिति सावंगी के अध्यक्ष दिनेश माकोड़े ने गणेश प्रतिमा के विसर्जन को लेकर भी लोगों को जागरूक किया। उन्होंने कहा कि मिट्टी से बनी गणेश प्रतिमा का विसर्जन घर में अथवा किसी उपयुक्त स्थान पर किया जा सकता है। प्रतिमा के मिट्टी में परिवर्तित होने के बाद उस मिट्टी का उपयोग पौधारोपण या अन्य उपयोगी कार्यों में किया जा सकता है।
दिनेश माकोड़े ने कहा कि यदि प्रत्येक घर में माटी गणेश विराजमान होंगे तो अभियान का उद्देश्य व्यापक स्तर पर सफल होगा। उन्होंने कहा कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलने की आवश्यकता है। भक्ति वही है जो प्रकृति का सम्मान करे।
उन्होंने लोगों से अपील की कि गणेशोत्सव के दौरान जलस्रोतों की स्वच्छता और पर्यावरण की सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाए तथा ऐसे विकल्प अपनाए जाएं, जिनसे प्रकृति को कम से कम नुकसान हो।

भारतीय परंपरा और पर्यावरण संरक्षण को जोड़ने का प्रयास
आयोजकों ने बताया कि “माटी गणेश–सिद्ध गणेश” अभियान का उद्देश्य केवल मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं बनवाना या स्थापित करवाना नहीं है। अभियान के माध्यम से भारतीय संस्कृति, धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण को एक-दूसरे से जोड़ते हुए इसे जन-जागरूकता का व्यापक अभियान बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
कार्यशाला में प्रतिभागियों को बताया गया कि धार्मिक आयोजनों में पर्यावरणीय जिम्मेदारी को शामिल करने से समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी को मिट्टी की प्रतिमाओं के निर्माण और पर्यावरण हितैषी त्योहारों के प्रति जागरूक करने पर जोर दिया गया।
प्रशिक्षण के दौरान उपस्थित प्रतिभागियों ने संकल्प लिया कि वे अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को माटी गणेश की स्थापना के लिए प्रेरित करेंगे। साथ ही गणेशोत्सव के दौरान पर्यावरण संरक्षण का संदेश घर-घर तक पहुंचाने का प्रयास करेंगे।
सावंगी में भी हुआ प्रशिक्षण कार्यक्रम
आठनेर सेक्टर के ग्राम सावंगी में भी इसी अभियान के अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। यहां भी प्रतिभागियों को मिट्टी से गणेश प्रतिमा तैयार करने की जानकारी दी गई। कार्यक्रम के माध्यम से ग्रामीण क्षेत्र में पर्यावरण हितैषी गणेशोत्सव के प्रति जागरूकता बढ़ाने का प्रयास किया गया।
सावंगी सहित आसपास के क्षेत्रों में अभियान को जनभागीदारी से जोड़ने पर जोर दिया गया। आयोजकों ने कहा कि अभियान तभी सफल होगा, जब समाज के विभिन्न वर्ग इसके साथ जुड़कर पर्यावरण संरक्षण को अपनी जिम्मेदारी समझेंगे।
विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारियों और विद्यार्थियों की सहभागिता
कार्यशाला में सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ नवांकुर संस्थाओं, प्रस्फुटन समितियों के पदाधिकारियों तथा मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास कार्यक्रम (सीएमसीएलडीपी) के छात्र-छात्राओं ने सहभागिता की।
विद्यार्थियों ने प्रशिक्षण में विशेष रुचि दिखाई। मिट्टी से प्रतिमा बनाने की प्रक्रिया को समझने के साथ उन्होंने यह भी जाना कि धार्मिक उत्सवों के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश किस तरह समाज तक पहुंचाया जा सकता है।
कार्यशाला में उपस्थित वक्ताओं ने कहा कि युवाओं की भागीदारी से इस प्रकार के अभियानों को नई गति मिल सकती है। विद्यार्थियों और सामाजिक संस्थाओं के सदस्य अपने-अपने क्षेत्रों में लोगों को जागरूक कर अभियान को मजबूत आधार प्रदान कर सकते हैं।

मटकी फोड़ कार्यक्रम से बढ़ा उत्साह
माटी गणेश प्रशिक्षण कार्यक्रम के बाद मुख्यमंत्री सामुदायिक नेतृत्व क्षमता विकास कार्यक्रम के छात्र-छात्राओं द्वारा उत्साहपूर्ण वातावरण में मटकी फोड़ कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया। विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में उत्साहपूर्वक सहभागिता की।
इस आयोजन ने कार्यशाला के वातावरण को और अधिक जीवंत बना दिया। धार्मिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के साथ पर्यावरण संरक्षण के संदेश को जोड़ते हुए कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने उत्साह के साथ भाग लिया।
आयोजकों का कहना था कि त्योहारों का आनंद और उत्साह तभी सार्थक है, जब उनके माध्यम से समाज में सकारात्मक संदेश भी पहुंचे। पर्यावरण संरक्षण को धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों का हिस्सा बनाकर जन-जागरूकता को मजबूत किया जा सकता है।
पर्यावरण हितैषी गणेशोत्सव का लिया संकल्प
कार्यशाला के समापन अवसर पर उपस्थित लोगों ने माटी गणेश की स्थापना को प्रोत्साहित करने तथा पर्यावरण संरक्षण का संदेश समाज के प्रत्येक वर्ग तक पहुंचाने का संकल्प लिया। प्रतिभागियों ने कहा कि वे अपने क्षेत्रों में लोगों को मिट्टी की गणेश प्रतिमाएं स्थापित करने के लिए प्रेरित करेंगे और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री के उपयोग से बचने के लिए जागरूक करेंगे।
कार्यक्रम के माध्यम से यह संदेश दिया गया कि धार्मिक आस्था और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। प्रकृति का सम्मान करते हुए धार्मिक परंपराओं को निभाना समाज की जिम्मेदारी है।
माटी गणेश अभियान के माध्यम से लोगों को यह समझाने का प्रयास किया गया कि यदि प्रत्येक परिवार छोटे स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की दिशा में कदम उठाए तो उसका सामूहिक प्रभाव काफी व्यापक हो सकता है। मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देकर परंपरा को जीवित रखने के साथ जलस्रोतों और प्रकृति की सुरक्षा में भी योगदान दिया जा सकता है।
कार्यशाला का समापन पर्यावरण संरक्षण, भारतीय संस्कृति के सम्मान और माटी गणेश की स्थापना को जन-जन तक पहुंचाने के संकल्प के साथ हुआ। कार्यक्रम में वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि गणेशोत्सव को आस्था, संस्कृति और प्रकृति के सम्मान का पर्व बनाया जाना चाहिए।
“भक्ति वही है, जो प्रकृति का सम्मान करे” के संदेश के साथ आयोजित इस कार्यशाला ने आठनेर क्षेत्र में पर्यावरण हितैषी गणेशोत्सव की दिशा में जागरूकता बढ़ाने का महत्वपूर्ण प्रयास किया।

