सदियों पुरानी परंपरा आज भी जीवित, करौंदी में तीन साल में एक बार होती है मां शीतला माता की सामूहिक पूजा
तेरस के दिन पूरा गांव परिवार सहित होता है शामिल, चल समारोह, आरती और भंडारे का आयोजन
पड़ाना। नगर के समीप ग्राम करौंदी में सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा आज भी पूरी आस्था और श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। करीब 8 हजार की आबादी वाले गांव में हर तीन वर्ष में एक बार तेरस के दिन मां शीतला माता की सामूहिक पूजा-अर्चना की जाती है। इस आयोजन में गांव के सभी वर्गों के लोग परिवार सहित शामिल होते हैं। ग्रामीणों की मान्यता है कि सामूहिक पूजा से गांव और क्षेत्र को बीमारी, महामारी तथा प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा मिलती है।
12 साल से घटकर तीन वर्ष में पहुंची परंपरा
गांव के बुजुर्ग पटेल गजराज सिंह परमार और लक्ष्मी नारायण परमार ने बताया कि पहले मां शीतला माता की सामूहिक पूजा 12 वर्ष में एक बार होती थी। समय के साथ यह अवधि छह वर्ष हुई और बाद में तीन वर्ष में एक बार पूजा की परंपरा शुरू हुई। पिछले करीब 21 वर्षों से गांव में हर तीन वर्ष में निर्धारित तिथि पर सामूहिक पूजन किया जा रहा है।
इस आयोजन को ग्रामीण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि गांव की एकता और आपसी भाईचारे का प्रतीक भी मानते हैं। पूजा के अवसर पर ग्रामीण अपने-अपने घरों से पूजन सामग्री लेकर मंदिर पहुंचते हैं और सामूहिक रूप से माता की पूजा करते हैं।
पुजारी परिवार करता है सबसे पहले पूजन
मंदिर के पुजारी शिवनारायण शर्मा और दिनेश शर्मा ने बताया कि परंपरा के अनुसार सबसे पहले पुजारी परिवार द्वारा मां शीतला माता का विधि-विधान से पूजन किया जाता है। इसके बाद गांव के अन्य परिवार बारी-बारी से माता की पूजा-अर्चना करते हैं।
ग्रामीणों के अनुसार यह परंपरा लंबे समय से शर्मा परिवार द्वारा निभाई जा रही है। सामूहिक पूजन के दौरान महिलाएं, पुरुष, बच्चे और बुजुर्ग बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचते हैं और माता का आशीर्वाद लेते हैं।

शादी-विवाह से भी जुड़ी है परंपरा
करौंदी में मां शीतला माता के सामूहिक पूजन से शादी-विवाह की परंपरा भी जुड़ी हुई है। ग्रामीणों के अनुसार जब तक सामूहिक शीतला माता पूजन नहीं हो जाता, तब तक गांव में शादी-विवाह के अवसरों पर माता की अलग से पूजा नहीं की जाती। हर तीसरे वर्ष निर्धारित तिथि पर पूरा गांव परिवार सहित सामूहिक पूजन में शामिल होता है।
चल समारोह और भंडारे से बनता है उत्सवी माहौल
सामूहिक पूजन के अवसर पर गांव में चल समारोह निकाला जाता है। इसके बाद मंदिर में सामूहिक आरती होती है और भंडारे का आयोजन किया जाता है। आसपास के गांवों से भी श्रद्धालु माता के दर्शन और प्रसादी ग्रहण करने के लिए पहुंचते हैं।
गांव के सरपंच राकेश परमार, पूर्व सरपंच रामेश्वर परमार, सुनील परमार, राजेंद्र परमार, आत्माराम भिलाला, देवीसिंह भिलाला, इंदर मालवीय और महेश टेलर ने बताया कि आयोजन में पूरा गांव मिलकर सहयोग करता है। पूजन के दिन गांव में उत्सव जैसा माहौल रहता है।
2027 में फिर होगा सामूहिक पूजन
ग्रामीणों ने बताया कि मां शीतला माता का अगला सामूहिक पूजन वर्ष 2027 में किया जाएगा। उनका कहना है कि बदलते समय के बावजूद गांव की यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है। सामूहिक पूजा ग्रामीणों को अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ ही आपसी एकता और भाईचारे को मजबूत करने का अवसर भी देती है।
