स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारिया को मरणोपरांत “प्रतिक्रमण रत्न” की उपाधि से किया अलंकृत
त्रिदिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव में दी भावभीनी श्रद्धांजलि, प्रतिक्रमण, नवकार आराधना और जीवदया के क्षेत्र में उल्लेखनीय सेवाओं को किया याद
Jhabua । स्थानीय जैन श्वेतांबर तीर्थ श्री ऋषभदेव बावन जिनालय झाबुआ श्री संघ के वरिष्ठ संरक्षक, नियमित प्रतिक्रमण एवं नवकार आराधक तथा जीवदया के प्रति समर्पित रहे स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारिया के धर्ममय जीवन और धार्मिक सेवाओं को स्मरण करते हुए उन्हें मरणोपरांत “प्रतिक्रमण रत्न” की उपाधि से अलंकृत किया गया। इस अवसर पर आयोजित त्रिदिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव में श्रद्धालुओं और समाजजनों ने उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की।
स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारियाजी ने अपने जीवन में नियमित रूप से प्रतिक्रमण आराधना की तथा नवकार मंत्र के प्रति गहरी आस्था रखी। इसके साथ ही वे जीवदया और विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक सेवा कार्यों से भी जुड़े रहे। उनके धर्मनिष्ठ जीवन, साधना और सेवा भावना को समाज के लिए प्रेरणादायी बताते हुए श्री संघ झाबुआ की ओर से उन्हें यह सम्मान प्रदान किया गया।
त्रिदिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव का आयोजन
स्व. श्री कटारियाजी के आत्मश्रेयार्थ त्रिदिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव का आयोजन पुण्य सम्राट श्रीमद् विजय जयंतसेन सुरीश्वरजी महाराज साहेब के पट्टधर गच्छाधिपति आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय नित्यसेन सुरीश्वरजी म.सा. एवं आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय जयरत्न सुरीश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनी साध्वी श्री शशिकलाश्रीजी म.सा. की सुशिष्या विदुषी साध्वी श्री अविचलदृष्टाजी श्री म.सा. आदि ठाणा-7 की पावन निश्रा में संपन्न हुआ।
महोत्सव के दौरान साध्वी भगवंत के प्रवचन के साथ विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन किया गया। श्री आदिनाथ पंचकल्याणक पूजन, दादा गुरुदेव श्री राजेंद्रसूरीश्वरजी महाराज साहेब की अष्टप्रकारी पूजन, नवकार मंत्र जाप, सामूहिक सामायिक और प्रभु भक्ति सहित अनेक धार्मिक कार्यक्रम हुए।
तीन दिनों तक चले इस आयोजन में समाजजनों और श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से स्व. श्री कटारियाजी के आत्मकल्याण की भावना से प्रार्थना की गई और उनके धर्ममय जीवन का स्मरण किया गया।
“प्रतिक्रमण आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ माध्यम”
धर्मसभा को संबोधित करते हुए विदुषी साध्वी श्री अविचलदृष्टाजी श्री म.सा. ने प्रतिक्रमण के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि प्रतिक्रमण आत्मशुद्धि का श्रेष्ठ माध्यम है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में हुई भूलों और पापों का प्रायश्चित करते हुए आत्मा को निर्मल बनाने का प्रयास करता है।
साध्वीजी ने कहा कि प्रतिक्रमण करने वाला जीव आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि के मार्ग पर आगे बढ़ता है। नवकार मंत्र के प्रति श्रद्धा और नियमित आराधना व्यक्ति के जीवन को धर्ममय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उन्होंने धर्म के प्रति निष्ठा, आत्मसंयम और सत्कर्मों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया।
उन्होंने स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारियाजी के जीवन का उल्लेख करते हुए कहा कि नियमित प्रतिक्रमण, नवकार आराधना और जीवदया के प्रति उनकी निष्ठा समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत रही। उनके जीवन से धर्म के प्रति समर्पण, आत्मचिंतन और सेवा की भावना सीखने को मिलती है।
समाजजनों ने अर्पित की भावांजलि
स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारियाजी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए विभिन्न जैन समाज एवं सामाजिक संगठनों के पदाधिकारियों ने उनके व्यक्तित्व और सेवाओं का स्मरण किया।
इस अवसर पर जैन श्वेतांबर श्री संघ के अध्यक्ष संजय मेहता, श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष प्रदीप रूनवाल, श्री तेरापंथ महासभा के अध्यक्ष मितेश गादिया, वरिष्ठ उपाध्यक्ष तेजप्रकाश कोठारी, मुकेश रूनवाल, नरेंद्र संघवी, राणापुर श्री संघ के वरिष्ठ सोहनलाल सेठ, समाजसेवी यशवंत भंडारी, भरतपुर तीर्थ के ट्रस्टी मनोहरलाल छाजेड़, पारिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकेश नाकोड़ा, सकल व्यापारी संघ के अध्यक्ष पंकज जैन मोगरा सहित अनेक समाजजन मौजूद रहे।
इसके अलावा भारतीय जनता पार्टी से सोमसिंग सोलंकी, नंदकिशोर जीरेती, महेश्वर सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्यजनों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की।
समाज के लोगों ने स्व. कटारियाजी के जीवन को याद करते हुए कहा कि उन्होंने धार्मिक आस्था को केवल व्यक्तिगत साधना तक सीमित नहीं रखा, बल्कि जीवदया और सामाजिक सेवा के माध्यम से भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाई। उनका सरल और धर्मनिष्ठ जीवन अनेक लोगों के लिए प्रेरणा का माध्यम रहा।
“प्रतिक्रमण रत्न” सम्मान को बताया सार्थक श्रद्धांजलि
धर्मसभा में उपस्थित श्रद्धालुओं और समाजजनों ने कहा कि स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारियाजी को प्रदान की गई “प्रतिक्रमण रत्न” की उपाधि उनके जीवन की साधना और धर्मनिष्ठा के अनुरूप है। नियमित प्रतिक्रमण और नवकार आराधना के प्रति उनकी प्रतिबद्धता तथा जीवदया के क्षेत्र में उनका योगदान उन्हें समाज में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।
समाजजनों ने कहा कि किसी व्यक्ति के निधन के बाद उसकी स्मृतियां तभी सार्थक होती हैं, जब उसके जीवन के अच्छे कार्यों और आदर्शों को आगे बढ़ाया जाए। स्व. कटारियाजी के जीवन से समाज को नियमित धार्मिक साधना, आत्मचिंतन, जीवदया और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती रहेगी।
आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा जीवन
श्रद्धांजलि कार्यक्रम के दौरान समाजजनों ने कहा कि स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारियाजी का जीवन आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा। उन्होंने धार्मिक परंपराओं को अपने जीवन में अपनाते हुए नियमित आराधना और सेवा को महत्व दिया। उनके जीवन की यही विशेषताएं उन्हें समाज के बीच सम्मानित और स्मरणीय बनाती हैं।
त्रिदिवसीय जिनेन्द्र भक्ति महोत्सव के माध्यम से उनके आत्मश्रेयार्थ धार्मिक अनुष्ठानों के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व और सेवाओं को भी श्रद्धापूर्वक याद किया गया। साध्वी भगवंत के प्रवचन और धार्मिक आयोजनों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन तथा धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
महोत्सव के समापन अवसर पर समाजजनों ने स्व. श्री कैलाशचंद्रजी कटारियाजी को भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके धार्मिक जीवन को नमन किया। “प्रतिक्रमण रत्न” की उपाधि उनके प्रति समाज की श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक बनी। उनका जीवन नियमित प्रतिक्रमण, नवकार आराधना, जीवदया और धार्मिक सेवा के माध्यम से समाज को सदैव प्रेरित करता रहेगा।
