ग्रामीण अंचल में आज भी जीवित है संझा की परंपरा, दीवारों पर गोबर से उकेरी जा रही आस्था
पडाना। शहरों में जहां संझा अब कागजों तक सिमट गई है, वहीं ग्रामीण अंचल में आज भी कुंवारी कन्याएं गोबर, पत्तों, छलकन और फूलों से घरों की दीवारों पर संझा उकेरकर इस लोक परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। ऐसा ही एक मनोरम दृश्य समीप के ग्राम साधनखेड़ी में देखने को मिला, जहां हर शाम गांव की बेटियां पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ संझा पूजन कर रही हैं।
गोबर से लीपी जाती है दीवार, फिर बनती है संझा
शाम ढलते ही गांव की कुंवारी कन्याएं एकत्रित होती हैं और घर की बाहरी दीवार को गोबर से लीपती हैं। इसके बाद उस पर संझा की आकृति उकेरी जाती है। संझा को सुंदर और आकर्षक बनाने के लिए गोबर के साथ आटे, हल्दी, कुमकुम, पत्तियों और छलकन का उपयोग किया जाता है। रंग-बिरंगे फूलों और प्राकृतिक सामग्री से सजी यह आकृति देखने वालों का मन मोह लेती है।
लोकगीतों से गूंजता है गांव
संझा तैयार होने के बाद सभी कन्याएं गोल घेरा बनाकर खड़ी हो जाती हैं और पारंपरिक संझा लोकगीत गाती हैं। “छोटी सी गाड़ी लुढ़कती जाए” जैसे पारंपरिक गीतों की स्वर लहरियां पूरे गांव में गूंज उठती हैं। दीपक की रोशनी में जगमगाती संझा और कन्याओं के मधुर स्वर पूरे माहौल को भक्तिमय बना देते हैं।
16 दिन के पूजन की मान्यता
मान्यता है कि कुंवारी कन्याओं द्वारा 16 दिन तक संझा का पूजन करने से मनचाहा वर और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। गांव की बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि संझा को माता पार्वती का ही रूप माना जाता है। इसी आस्था के चलते पीढ़ी दर पीढ़ी यह परंपरा निभाई जाती रही है।
बाजार की कागजी संझा से लुप्त हो रही परंपरा
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, आजकल बाजार में छपी हुई कागज की संझा आसानी से उपलब्ध है। इसके कारण गांवों में भी हाथ से गोबर की संझा बनाने की परंपरा धीरे-धीरे कम होती जा रही है। बदलते समय और आधुनिकता के प्रभाव में लोक संस्कृति की यह अनमोल धरोहर खतरे में पड़ती दिखाई दे रही है।
साधनखेड़ी की बेटियां सहेज रहीं धरोहर
इन सबके बावजूद साधनखेड़ी की काजल, अर्पिता, दिव्या, वेदिका सहित अन्य बेटियों ने इस लोक-संस्कृति को आज भी सहेजकर रखा है। उनके प्रयासों से गांव में संझा की परंपरा जीवित है और नई पीढ़ी को भी अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा मिल रही है। ग्रामीणों ने इन बेटियों के प्रयासों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसी परंपराओं को बचाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है।
