*दैनिक स्वराज वाणी न्यूज
घनेन्द्र सिंह बुन्देला
जिला व्यूरो चीफ छतरपुर मध्य प्रदेश 9630972569
आबकारी विभाग में फिर बड़ा फेरबदल, शिवम मिश्रा ने छह से अधिक दुकानें छोड़ीं
बड़ामलहरा की दो समेत नौगांव, महेवा, मऊसहानिया, लुगासी और दौनी की दुकानें दूसरे कारोबारियों को देने की प्रक्रिया
बैंक गारंटी और लाइसेंस फीस समेत 3 से 4 करोड़ रुपये के नुकसान का दावा, पहले संतु-मंटू के ग्रुप भी छोड़ चुका है करीब 20 दुकानों का कारोबार
छतरपुर-छतरपुर जिले की आबकारी व्यवस्था को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। आबकारी विभाग के एक और बड़े ठेकेदार शिवम मिश्रा से जुड़ा प्रेस नोट सामने आया है, जिसमें व्यापारिक समझौते के तहत कई शासकीय मदिरा दुकानों को दूसरे कारोबारियों को दिए जाने की जानकारी दी गई है। दस्तावेज के अनुसार बड़ामलहरा क्रमांक-1, बड़ामलहरा क्रमांक-2, नौगांव, महेवा, मऊसहानिया, लुगासी और दौनी की दुकानों के संबंध में हस्तांतरण की प्रक्रिया जारी है।
ठेकेदार को 3 से 4 करोड़ के नुकसान का दावा
सूत्रों के अनुसार इन दुकानों से पीछे हटने की स्थिति में ठेकेदार को बैंक गारंटी, लाइसेंस फीस और अन्य वित्तीय दायित्वों के चलते करीब 3 से 4 करोड़ रुपये के नुकसान का सामना करना पड़ सकता है। हालांकि वास्तविक नुकसान कितना है, यह संबंधित अभिलेखों और विभागीय जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
प्रेस नोट में कहा गया है कि उक्त दुकानें व्यापारिक समझौते के तहत अन्य व्यक्तियों को दी गई हैं और 10 अगस्त 2026 की मध्यरात्रि से समझौते लागू होने की बात कही गई है। ऐसे में अब यह भी महत्वपूर्ण होगा कि आबकारी विभाग ने इन हस्तांतरणों को किन नियमों और शर्तों के तहत स्वीकृति दी है तथा लाइसेंस संबंधी सभी औपचारिकताएं पूरी हुई हैं या नहीं।
पहले संतु-मंटू के ग्रुप ने छोड़ी थीं करीब 20 दुकानें
यह पहला मामला नहीं है, जब छतरपुर जिले में बड़े आबकारी कारोबारी समूह द्वारा दुकानों से पीछे हटने की स्थिति सामने आई हो। इससे पहले संतु-मंटू के ग्रुप द्वारा जिले की करीब 20 शराब दुकानों का कारोबार छोड़ने का मामला भी सामने आया था। उस समय भी शराब आपूर्ति, विभागीय व्यवस्था और कारोबारियों के बीच तालमेल को लेकर सवाल उठे थे।
अब शिवम मिश्रा से जुड़ी दुकानों के हस्तांतरण की खबर सामने आने के बाद दोनों घटनाओं को लेकर आबकारी विभाग की कार्यप्रणाली पर नए सिरे से सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या ठेकेदारों का पीछे हटना विभागीय विफलता का संकेत?
लगातार बड़े कारोबारियों द्वारा दुकानों से पीछे हटने की घटनाएं महज व्यापारिक निर्णय हैं या इनके पीछे विभागीय व्यवस्था से जुड़ी कोई समस्या है—यह जांच का विषय है। यदि कारोबारियों को लाइसेंस लेने के बाद लगातार आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है और वे अपनी दुकानों का संचालन दूसरे लोगों को सौंपने या कारोबार से बाहर निकलने को मजबूर हो रहे हैं, तो विभाग को इसकी समीक्षा करनी चाहिए।
आबकारी विभाग के सामने अब बड़ा सवाल यही है कि आखिर ऐसी परिस्थितियां क्यों बन रही हैं कि बड़े ठेकेदार अपने कारोबार से पीछे हट रहे हैं?
नए कलेक्टर के सामने भी बड़ी चुनौती
कलेक्टर मृणाल मीणा के पदभार संभालने के बाद जिले की प्रशासनिक व्यवस्थाओं में सक्रियता बढ़ने की चर्चा है। ऐसे में आबकारी विभाग से जुड़े मामलों, विशेषकर शराब दुकानों के हस्तांतरण और बड़े ठेकेदारों के कारोबार से पीछे हटने की घटनाओं की प्रशासनिक स्तर पर समीक्षा महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लगातार सामने आ रहे इन मामलों को देखते हुए विभागीय प्रक्रिया, नियमों और वित्तीय व्यवस्थाओं की पारदर्शिता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
शराब दुकानों के टेंडर, लाइसेंस फीस, बैंक गारंटी, शराब की आपूर्ति, उपलब्ध स्टॉक, बिक्री के आंकड़े तथा ठेकेदारों के बीच हुए व्यापारिक समझौतों की विस्तृत जांच से वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जा सकता है कि दुकानों के संचालन से पीछे हटने के पीछे महज व्यापारिक कारण हैं या इसके पीछे अन्य प्रशासनिक अथवा आर्थिक परिस्थितियां भी जिम्मेदार हैं।
प्रशासन के सामने यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि दुकानों के हस्तांतरण की प्रक्रिया आबकारी नियमों और निर्धारित शर्तों के अनुरूप ही हो। लाइसेंसधारी से संबंधित सभी औपचारिकताओं, देनदारियों और बैंक गारंटी की स्थिति की जांच के बाद ही आगे की प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया जाना चाहिए।
यदि बड़े कारोबारी लगातार दुकानों से पीछे हट रहे हैं, तो इसके कारणों का निष्पक्ष आकलन आवश्यक है। इससे न केवल आबकारी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए आवश्यक सुधारात्मक कदम भी उठाए जा सकेंगे।
