CJP प्रदर्शन मामले में गिरफ्तार स्वतंत्र भारद्वाज की याचिका पर दिल्ली हाईकोर्ट में तत्काल सुनवाई मंजूर
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के जरिए गिरफ्तारी और हिरासत को दी गई चुनौती; अदालत ने मामले को उसी दिन सूचीबद्ध करने की दी अनुमति
नई दिल्ली। दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी के प्रदर्शन के दौरान एक छात्र कार्यकर्ता के पिता संजय कुमार पर कथित हमले के मामले में गिरफ्तार सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई है। हाईकोर्ट ने मामले में तत्काल सुनवाई का अनुरोध स्वीकार करते हुए याचिका को सोमवार, 7 सितंबर को ही सूचीबद्ध करने की अनुमति दे दी।
स्वतंत्र भारद्वाज की ओर से अधिवक्ता उमेश शर्मा ने दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ के समक्ष मामले का उल्लेख किया। अधिवक्ता ने अदालत से कहा कि भारद्वाज कई दिनों से हिरासत में हैं और उनकी गिरफ्तारी तथा हिरासत की वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर तत्काल सुनवाई की आवश्यकता है।
पीठ ने अनुरोध स्वीकार करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को दिन के दौरान सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अनुमति प्रदान कर दी। हालांकि, याचिका सूचीबद्ध किए जाने का अर्थ गिरफ्तारी को अवैध घोषित करना या भारद्वाज को राहत मिलना नहीं है। मामले में अंतिम निर्णय दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत द्वारा लिया जाएगा।
पिता की ओर से दाखिल की गई याचिका
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, यह याचिका स्वतंत्र भारद्वाज के पिता के माध्यम से दाखिल की गई है। याचिका के साथ उन्होंने हलफनामा भी प्रस्तुत किया है। भारद्वाज के वकील ने पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए हिरासत को कथित रूप से गैर-कानूनी बताया है।
बचाव पक्ष ने हाईकोर्ट से भारद्वाज को अदालत के सामने प्रस्तुत करने और उनकी गिरफ्तारी से जुड़ी परिस्थितियों की जांच करने की मांग की है। इसके साथ ही तत्काल रिहाई की मांग भी याचिका में रखे जाने की जानकारी सामने आई है।
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का उपयोग उस स्थिति में किया जाता है, जब किसी व्यक्ति के परिजन या संबंधित पक्ष यह दावा करते हैं कि उसे गैर-कानूनी तरीके से हिरासत में रखा गया है। ऐसी याचिका पर अदालत हिरासत में रखने वाली एजेंसी से कानूनी आधार पूछ सकती है।
बुलंदशहर से हिरासत में लिए गए थे भारद्वाज
स्वतंत्र भारद्वाज को दिल्ली पुलिस ने उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर से हिरासत में लिया था। इसके बाद उन्हें ट्रांजिट प्रक्रिया के माध्यम से दिल्ली लाया गया और अदालत के समक्ष पेश किया गया। अदालत ने पहले पुलिस की मांग पर एक दिन की हिरासत में पूछताछ की अनुमति दी थी।
पुलिस हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद रविवार को भारद्वाज को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से ड्यूटी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। अदालत ने उन्हें एक दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। के अनुसार, अभियोजन पक्ष ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत की मांग भी रखी है, जिस पर सक्षम अदालत को निर्णय लेना है।
इस बीच भारद्वाज के वकील ने उनकी सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई है। बचाव पक्ष ने मामले को कथित रूप से राजनीतिक दबाव से प्रभावित बताया है। ये सभी बचाव पक्ष के दावे हैं और अदालत में इनकी कानूनी जांच होना बाकी है।
क्या है जंतर-मंतर से जुड़ा मामला?
पूरा मामला 23 जून को जंतर-मंतर पर आयोजित सीजेपी के विरोध प्रदर्शन से जुड़ा बताया जा रहा है। प्रदर्शन के दौरान छात्र कार्यकर्ता निशु आजाद के पिता संजय कुमार पर कथित हमला हुआ था। इस मामले में स्वतंत्र भारद्वाज और अन्य लोगों पर आरोप लगाए गए।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि मामले की जांच कानूनी प्रक्रिया के अनुसार की गई। पुलिस ने राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों को भी निराधार बताया है। पुलिस के अनुसार, मेडिकल रिपोर्ट में संजय कुमार की खोपड़ी में फ्रैक्चर की पुष्टि नहीं हुई और चोट कथित रूप से धातु के कड़े से लगी थी। हालांकि, शिकायतकर्ता पक्ष ने घटना को गंभीर बताते हुए कठोर कार्रवाई की मांग की।
यह उल्लेख करना आवश्यक है कि भारद्वाज पर लगाए गए आरोप अभी न्यायिक परीक्षण के अधीन हैं। अदालत द्वारा दोष सिद्ध किए जाने तक उन्हें कानूनी रूप से आरोपी ही माना जाएगा।
वायरल पॉडकास्ट के बाद बढ़ा विवाद
मामला उस समय दोबारा चर्चा में आया, जब स्वतंत्र भारद्वाज का एक पॉडकास्ट वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। वीडियो में उन्होंने कथित रूप से संजय कुमार के साथ मारपीट करने और उनका सिर फोड़ने संबंधी टिप्पणी की थी। उन्होंने कथित तौर पर यह भी दावा किया कि राजनीतिक संपर्कों के कारण उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई नहीं हुई।
वीडियो सामने आने के बाद विपक्षी नेताओं, सामाजिक संगठनों और सीजेपी कार्यकर्ताओं ने भारद्वाज की गिरफ्तारी की मांग तेज कर दी। संसद मार्ग पुलिस स्टेशन के बाहर प्रदर्शन भी किया गया। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस से प्राथमिकी में कठोर कानूनी प्रावधान जोड़ने और आरोपी को गिरफ्तार करने की मांग की थी।
दिल्ली पुलिस ने वायरल वीडियो और अन्य साक्ष्यों को जांच का हिस्सा बनाए जाने की बात कही है। पॉडकास्ट में की गई कथित टिप्पणियों की प्रमाणिकता और कानूनी प्रभाव भी जांच तथा अदालत के विचार का विषय रहेगा।
FIR में जोड़ी गईं गंभीर धाराएं
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, संजय कुमार पर कथित हमले से संबंधित प्राथमिकी में अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम और आपराधिक धमकी से संबंधित प्रावधान जोड़े गए हैं। शिकायतकर्ता के कथित अतिरिक्त बयान के आधार पर जातिसूचक टिप्पणी से जुड़ा आरोप भी मामले में शामिल किया गया है।
इसके अतिरिक्त पॉक्सो अधिनियम और आपराधिक धमकी से संबंधित एक अलग मामला दर्ज किए जाने की जानकारी सामने आई है। यह मामला कथित तौर पर छात्र कार्यकर्ता को सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों से मिली धमकियों से जुड़ा है। अलग प्राथमिकी में भारद्वाज की कानूनी भूमिका और पुलिस की कार्रवाई जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होगी।
बचाव पक्ष ने पुलिस की कार्रवाई पर उठाए सवाल
भारद्वाज की ओर से पेश वकील का कहना है कि वह पहले पुलिस की जांच में शामिल हुए थे। इसके बाद धाराएं जोड़कर उन्हें गिरफ्तार किया गया। बचाव पक्ष ने आशंका जताई है कि यदि उन्हें एक मामले में राहत मिलती है तो दूसरी प्राथमिकी में गिरफ्तार किया जा सकता है।
वहीं, पुलिस का पक्ष है कि कार्रवाई उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के तहत की जा रही है। के मुताबिक, अदालत ने फिलहाल याचिका को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने की अनुमति दी है।
अदालत के फैसले पर टिकी नजर
अब सभी की नजर दिल्ली हाईकोर्ट की सुनवाई पर है। अदालत के सामने मुख्य सवाल यह होगा कि भारद्वाज की गिरफ्तारी और हिरासत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप हुई या नहीं। पुलिस को हिरासत का आधार और गिरफ्तारी से संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत करने पड़ सकते हैं, जबकि बचाव पक्ष अपनी आपत्तियां रखेगा।
हाईकोर्ट से राहत मिलने या याचिका खारिज होने का फैसला विस्तृत सुनवाई के बाद होगा। समाचार लिखे जाने तक याचिका पर अंतिम आदेश की जानकारी सामने नहीं आई थी। इसलिए तत्काल सुनवाई स्वीकार होने को भारद्वाज की गिरफ्तारी रद्द होने या उनकी रिहाई के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
