Datia Upchunav Result: दतिया उपचुनाव में बीजेपी की हार की 2 बड़ी वजह, अंदरूनी कलह और ASP फैक्टर ने बदला चुनावी समीकरण
Datia मध्यप्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) को मिली हार के बाद अब सियासी गलियारों में इसकी वजहों पर चर्चा तेज हो गई है। बीजेपी ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। सत्ता और संगठन के बड़े नेताओं ने प्रचार अभियान में कोई कसर नहीं छोड़ी, लेकिन इसके बावजूद पार्टी जीत हासिल नहीं कर सकी।
Datia उपचुनाव के नतीजों ने कई राजनीतिक समीकरणों को बदलकर रख दिया है। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज कर बीजेपी के आशुतोष तिवारी को हराया। वहीं आजाद समाज पार्टी (ASP) के उम्मीदवार दमोदर यादव ने भी बड़ी संख्या में वोट हासिल कर मुकाबले को त्रिकोणीय बना दिया।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार बीजेपी की हार के पीछे मुख्य रूप से दो बड़े कारण सामने आए हैं। पहला कारण पार्टी के अंदर की नाराजगी और भितरघात बताया जा रहा है, जबकि दूसरा कारण ASP उम्मीदवार दमोदर यादव द्वारा वोटों में सेंध लगाना माना जा रहा है।
पहली वजह: नरोत्तम मिश्रा समर्थकों की नाराजगी और अंदरूनी विरोध
Datia विधानसभा क्षेत्र को लंबे समय तक बीजेपी के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा का मजबूत गढ़ माना जाता रहा है। हालांकि विधानसभा चुनाव 2023 में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था। इसके बाद भी उन्होंने क्षेत्र में अपनी सक्रियता बनाए रखी।
उपचुनाव की स्थिति बनने के बाद माना जा रहा था कि नरोत्तम मिश्रा एक बार फिर बीजेपी के उम्मीदवार हो सकते हैं। उन्होंने चुनावी तैयारी भी शुरू कर दी थी। लेकिन ऐन समय पर पार्टी ने टिकट बदलते हुए आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार घोषित कर दिया।
इसके बाद नरोत्तम मिश्रा समर्थकों में नाराजगी खुलकर सामने आई। टिकट नहीं मिलने से समर्थकों ने विरोध जताया और पार्टी के अंदर असंतोष की स्थिति बनी। शुरुआती दिनों के बाद भले ही ऐसा लगा कि मामला शांत हो गया है, लेकिन चुनावी मैदान में अंदर ही अंदर विरोध का असर दिखाई देता रहा।
बताया जा रहा है कि मतदान के दिन तक यह नाराजगी पूरी तरह खत्म नहीं हुई थी। चुनाव के दौरान बीजेपी को कई बूथों पर भितरघात की शिकायतें मिलीं। पार्टी ने स्थिति संभालने की कोशिश की और करीब 150 से ज्यादा ऐसे कार्यकर्ताओं को बूथों से हटाया गया, जिन पर पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का संदेह था।
हालांकि, चूंकि ये सभी बीजेपी से जुड़े कार्यकर्ता थे, इसलिए उनके खिलाफ कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की गई। मामले की जानकारी संगठन और भोपाल तक पहुंची, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की गई।
नतीजों में भी इसका असर दिखाई दिया। जानकारी के अनुसार नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव वाले बूथ नंबर 121 पर बीजेपी पीछे रही। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नरोत्तम मिश्रा समर्थकों की नाराजगी और ब्राह्मण वोटों में आई कमी ने बीजेपी के प्रदर्शन को प्रभावित किया।
दूसरी वजह: ASP उम्मीदवार दमोदर यादव का प्रभाव
Datia उपचुनाव में आजाद समाज पार्टी (ASP) के उम्मीदवार दमोदर यादव की एंट्री ने चुनावी समीकरणों को काफी हद तक बदल दिया।
शुरुआत में मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच माना जा रहा था, लेकिन दमोदर यादव ने चुनाव में मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, दलित और ओबीसी वर्ग के मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ बनाई और बड़ी संख्या में वोट हासिल किए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दमोदर यादव को मिले वोटों का एक हिस्सा ऐसा था, जो पहले बीजेपी के खाते में जा सकता था। लेकिन ASP उम्मीदवार की सक्रियता के कारण यह वोट बैंक अलग दिशा में चला गया।
कुछ स्थानीय नेताओं का दावा है कि बीजेपी से नाराज नेताओं ने भी दमोदर यादव को अप्रत्यक्ष समर्थन दिया, जिससे उनका चुनावी अभियान मजबूत हुआ। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दमोदर यादव ने इस चुनाव में 22,527 वोट हासिल किए और खुद को एक मजबूत राजनीतिक चेहरे के रूप में स्थापित किया। उनका प्रदर्शन यह बताता है कि क्षेत्र में तीसरे मोर्चे के लिए भी जगह बन रही है।
Datia उपचुनाव के नतीजे
दतिया विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने जीत दर्ज की। उन्हें कुल 66,757 वोट मिले।
वहीं बीजेपी के उम्मीदवार आशुतोष तिवारी दूसरे स्थान पर रहे और उन्हें 60,741 वोट प्राप्त हुए।
आजाद समाज पार्टी के उम्मीदवार दमोदर यादव तीसरे स्थान पर रहे। उन्होंने 22,527 वोट हासिल कर सभी को चौंका दिया।
इस चुनाव परिणाम ने बीजेपी के सामने संगठनात्मक चुनौती खड़ी कर दी है। जहां पार्टी को अपने अंदरूनी मतभेदों को दूर करने की जरूरत है, वहीं विपक्षी दलों के बढ़ते प्रभाव को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आगे की राजनीति पर असर
Datia उपचुनाव के नतीजे सिर्फ एक सीट की हार-जीत तक सीमित नहीं माने जा रहे हैं। यह परिणाम बीजेपी के लिए संगठन और कार्यकर्ताओं के बीच तालमेल की परीक्षा भी है।
यदि पार्टी समय रहते अंदरूनी नाराजगी को दूर नहीं करती है तो आने वाले चुनावों में इसका असर दिखाई दे सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस को इस जीत से राजनीतिक मजबूती मिली है और ASP जैसे दलों ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है।
फिलहाल दतिया उपचुनाव ने यह साफ कर दिया है कि चुनाव केवल बड़े नेताओं के प्रचार से नहीं, बल्कि बूथ स्तर पर संगठन की एकजुटता और वोट प्रबंधन से जीते जाते हैं।
