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ठेके की 12 एकड़ जमीन पर शुरू की अश्वगंधा की खेती, पारंपरिक फसलों से हटकर किसान ने बनाया कमाई का नया रास्ता

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Published On: 22 August 2026

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ठेके की 12 एकड़ जमीन पर शुरू की अश्वगंधा की खेती, पारंपरिक फसलों से हटकर किसान ने बनाया कमाई का नया रास्ता

संवाददाता — सोनू अठया, स्वराज वाणी, दमोह (मध्य प्रदेश)

भाटखमरिया के किसान अरविंद सिंह लोधी और इंजीनियर बेटे ओम लोधी ने अपनाई औषधीय खेती; वैज्ञानिक योजना और बाजार से सीधे जुड़ने की रणनीति पर किया काम, प्रति एकड़ 2.3 लाख रुपये से अधिक सकल आय का दावा

दमोह। खेती में लगातार बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और पारंपरिक फसलों से अपेक्षित आमदनी नहीं मिलने के बीच दमोह जिले के भाटखमरिया गांव के किसान अरविंद सिंह लोधी ने एक अलग रास्ता अपनाया है। वर्षों तक सोयाबीन, गेहूं और चना जैसी परंपरागत फसलों की खेती करने के बाद उन्होंने अब औषधीय फसल अश्वगंधा की खेती की ओर कदम बढ़ाया है। खास बात यह है कि परिवार के पास पर्याप्त स्वयं की कृषि भूमि नहीं होने के बावजूद उन्होंने 12 एकड़ जमीन ठेके पर लेकर अश्वगंधा की खेती शुरू की।

इस बदलाव के पीछे अरविंद सिंह के इंजीनियर बेटे ओम लोधी की महत्वपूर्ण भूमिका बताई जा रही है। ओम ने खेती को केवल पारंपरिक तरीके से करने के बजाय बाजार की मांग, उत्पादन लागत और फसल के विभिन्न हिस्सों से होने वाली संभावित आय को ध्यान में रखकर योजना बनाने पर जोर दिया। पिता-पुत्र की यह पहल अब क्षेत्र के दूसरे किसानों के बीच भी चर्चा का विषय बन रही है।

पारंपरिक खेती में मेहनत के अनुरूप नहीं मिल रही थी आमदनी

अरविंद सिंह लोधी लंबे समय से खेती से जुड़े हुए हैं। वे सोयाबीन, गेहूं और चना जैसी फसलों का उत्पादन करते रहे हैं, लेकिन बदलते मौसम, उत्पादन लागत और बाजार भाव में उतार-चढ़ाव के कारण मेहनत के अनुरूप आमदनी हासिल करना चुनौती बनता जा रहा था।

बीज, खाद, सिंचाई, मजदूरी और अन्य कृषि खर्चों के बाद बचने वाली राशि से परिवार की आय में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हो पा रही थी। इसी दौरान परिवार ने ऐसी फसल तलाशने पर विचार किया, जिसकी बाजार में मांग हो और जिसे बेहतर योजना के साथ उगाकर खेती की आय बढ़ाने की संभावना तैयार की जा सके।

इंजीनियर बेटे ओम लोधी ने दिया अश्वगंधा की खेती का सुझाव

किसान अरविंद सिंह के बेटे ओम लोधी इंजीनियर हैं। उन्होंने आधुनिक कृषि और औषधीय फसलों से जुड़ी संभावनाओं को समझने के बाद पिता को अश्वगंधा की खेती करने का सुझाव दिया।

परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्याप्त कृषि भूमि का अभाव था। इसके बावजूद पिता-पुत्र ने योजना को छोड़ने के बजाय जमीन ठेके पर लेने का फैसला किया। इसके बाद करीब 12 एकड़ कृषि भूमि ठेके पर ली गई और उस पर अश्वगंधा की खेती शुरू की गई।

इस फैसले के साथ परिवार ने यह भी तय किया कि खेती केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रखी जाएगी, बल्कि फसल की बिक्री और बाजार तक पहुंच की रणनीति भी पहले से तैयार की जाएगी।

वैज्ञानिक तरीके से तैयार की खेती की योजना

अश्वगंधा की खेती शुरू करने से पहले उत्पादन लागत और संभावित बाजार को समझने पर जोर दिया गया। परिवार ने वैज्ञानिक तरीके और बेहतर कृषि प्रबंधन के माध्यम से कम लागत में अच्छा उत्पादन प्राप्त करने की दिशा में काम किया।

औषधीय फसलों की खेती में केवल उत्पादन करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि उपज की गुणवत्ता और उसके खरीदार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण होती है। इसी कारण अरविंद सिंह और ओम लोधी ने फसल तैयार होने के बाद बिक्री की समस्या से बचने के लिए बल्क खरीदारों से सीधे संपर्क स्थापित करने की रणनीति अपनाई।

इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और उपज का बेहतर मूल्य हासिल करने की संभावना बढ़ी।

सिर्फ जड़ नहीं, बीज-पत्ती और तने से भी आमदनी का प्रयास

अश्वगंधा की खेती में आमतौर पर इसकी सूखी जड़ को प्रमुख उत्पाद माना जाता है। लेकिन अरविंद सिंह के परिवार ने केवल जड़ की बिक्री पर निर्भर रहने के बजाय पौधे के दूसरे उपयोगी हिस्सों से भी अतिरिक्त आय हासिल करने की योजना बनाई।

अश्वगंधा की जड़ के साथ बीज, पत्तियों और तने के उपयोग तथा उनकी बाजार मांग को समझते हुए इन्हें भी बेचने का प्रयास किया गया। इससे एक ही फसल के विभिन्न हिस्सों का आर्थिक उपयोग करने का रास्ता तैयार हुआ।

परिवार का मानना है कि यदि किसान फसल उत्पादन के साथ उसकी प्रोसेसिंग, बाजार और अलग-अलग उत्पादों की उपयोगिता की जानकारी जुटाए तो खेती से होने वाली आय के अतिरिक्त स्रोत विकसित किए जा सकते हैं।

प्रति एकड़ करीब 16,500 रुपये लागत का दावा


उपलब्ध जानकारी के अनुसार परिवार का दावा है कि अश्वगंधा की खेती में प्रति एकड़ करीब 16,500 रुपये की उत्पादन लागत आई। इस लागत में खेती से संबंधित प्रमुख खर्चों को शामिल किया गया है।

वहीं, प्रति एकड़ लगभग 4 से 6 क्विंटल सूखी अश्वगंधा जड़ का उत्पादन होने की बात कही गई है। परिवार के मुताबिक जड़ को बाजार में करीब 350 से 450 रुपये प्रति किलोग्राम तक की दर से बेचा गया।

इन आंकड़ों के आधार पर परिवार ने प्रति एकड़ 2.3 लाख रुपये से अधिक तक सकल आय होने की बात कही है। हालांकि वास्तविक आय उत्पादन की मात्रा, गुणवत्ता, बिक्री मूल्य, भूमि के ठेके, मजदूरी और अन्य खर्चों के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

बीज, पत्ती और तने की बिक्री से होने वाली संभावित आय को इसके अतिरिक्त बताया गया है।

बाजार की जानकारी को बनाया खेती का महत्वपूर्ण हिस्सा

पिता-पुत्र का मानना है कि आधुनिक समय में खेती की सफलता केवल अच्छी पैदावार पर निर्भर नहीं करती। किसान को यह भी पता होना चाहिए कि उसकी फसल का खरीदार कौन है, बाजार कहां है और किस गुणवत्ता के उत्पाद की मांग अधिक है।

इसी सोच के तहत उन्होंने अश्वगंधा की खेती शुरू करने से पहले बाजार और संभावित खरीदारों के बारे में जानकारी जुटाने पर ध्यान दिया। उत्पादन तैयार होने के बाद सीधे बल्क खरीदारों तक पहुंचने की रणनीति ने फसल के विपणन में मदद की।

यह तरीका उन किसानों के लिए भी उपयोगी हो सकता है जो नई या गैर-पारंपरिक फसलों की खेती करना चाहते हैं। हालांकि विशेषज्ञ सलाह, स्थानीय जलवायु, मिट्टी, बाजार और खरीदार की उपलब्धता की जानकारी लेने के बाद ही बड़े स्तर पर निवेश करना बेहतर माना जाता है।

ठेके की जमीन पर प्रयोग बना चर्चा का विषय

इस पहल की सबसे खास बात यह है कि अश्वगंधा की खेती स्वयं की बड़ी कृषि भूमि पर नहीं, बल्कि ठेके पर ली गई 12 एकड़ जमीन पर शुरू की गई। इससे परिवार ने यह संदेश देने का प्रयास किया कि सीमित संसाधन होने के बावजूद सही योजना और जोखिम के आकलन के साथ कृषि में नए प्रयोग किए जा सकते हैं।

हालांकि ठेके पर खेती में भूमि किराया भी एक महत्वपूर्ण खर्च होता है। ऐसे में किसी भी नई फसल को अपनाने से पहले कुल लागत, संभावित उत्पादन और बाजार मूल्य का आकलन जरूरी है।

दूसरे किसानों के लिए प्रेरणा बन रही पिता-पुत्र की पहल

भाटखमरिया के अरविंद सिंह लोधी और उनके बेटे ओम लोधी का यह प्रयोग क्षेत्र के उन किसानों के लिए एक उदाहरण के रूप में सामने आया है, जो पारंपरिक फसलों के साथ आय के वैकल्पिक स्रोत तलाश रहे हैं।

औषधीय फसलों की खेती में बाजार की मांग, सही किस्म, तकनीकी जानकारी और खरीदार की उपलब्धता महत्वपूर्ण होती है। इसलिए इस तरह की खेती शुरू करने से पहले किसानों के लिए कृषि विशेषज्ञों और संबंधित विभागों से जानकारी लेना उपयोगी हो सकता है।

शिक्षित युवाओं की कृषि में भागीदारी खोल सकती है नई संभावनाएं

ओम लोधी की भूमिका यह भी दिखाती है कि शिक्षित युवा आधुनिक तकनीक, बाजार की जानकारी और नई कृषि पद्धतियों को गांवों तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि युवा परिवार की खेती से जुड़कर उत्पादन के साथ मार्केटिंग, तकनीक और लागत प्रबंधन पर काम करें तो कृषि क्षेत्र में नए अवसर विकसित हो सकते हैं।

अरविंद सिंह लोधी के परिवार के लिए अश्वगंधा की खेती केवल एक नई फसल का प्रयोग नहीं, बल्कि खेती को व्यवसायिक दृष्टिकोण से देखने की दिशा में उठाया गया कदम है। ठेके की 12 एकड़ भूमि से शुरू हुआ यह प्रयास बताता है कि पारंपरिक खेती के साथ नवाचार, वैज्ञानिक योजना और बाजार की समझ को जोड़ा जाए तो किसानों के लिए आय के नए विकल्प तलाशे जा सकते हैं।

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