पितृपक्ष में फिर याद आए कौवे, श्राद्ध का पहला ग्रास लेकर इंतजार कर रहे लोग
पेड़ों की कमी और बदलते पर्यावरण को लेकर चिंता; पड़ाना के बुजुर्ग बोले—पहले छतों पर दिखते थे झुंड
पड़ाना। कभी घर की मुंडेर पर बैठकर कांव-कांव करने वाला कौवा मेहमान आने का संकेत माना जाता था। पितृपक्ष में उसका इंतजार और भी बढ़ जाता था। लोग पितरों के निमित्त तैयार भोजन का पहला ग्रास लेकर छत पर पहुंचते और कौवे के लिए अन्न के साथ जल भी रखते थे। पड़ाना के कुछ बुजुर्गों का कहना है कि पहले भोजन रखते ही कौवे आ जाते थे, जबकि अब कई बार लंबे समय तक उनका इंतजार करना पड़ता है।
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक चलने वाले पितृपक्ष में कौवे को भोजन कराने की पुरानी परंपरा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितर कौवे के रूप में आकर श्राद्ध का अन्न ग्रहण करते हैं। इसी श्रद्धा से परिवार भोजन का पहला ग्रास उसके लिए निकालते हैं। पीपल को जल अर्पित करना और पक्षियों के लिए भोजन रखना भी इस दौरान निभाई जाने वाली परंपराओं में शामिल है।
पहले भोजन रखते ही आ जाते थे कौवे
स्थानीय बुजुर्ग भागीरथ शर्मा, रमेश चंद गुप्ता और गंगाराम मालवीय पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि सुबह होते ही घरों की छतों और आसपास के पेड़ों पर कौवों के झुंड दिखाई देते थे। श्राद्ध का भोजन रखने के कुछ ही देर बाद कौवे पहुंच जाते थे। उनके मुताबिक, अब कई घरों में पहला ग्रास लंबे समय तक छत पर रखा रहता है, लेकिन कौवा दिखाई नहीं देता।
बुजुर्गों का कहना है कि इस बदलाव का असर पितृपक्ष में अधिक महसूस होता है। बाकी दिनों में लोग शायद कौवों की ओर उतना ध्यान न देते हों, लेकिन श्राद्ध के समय उन्हें खोजते हैं। घर की छत पर भोजन रखकर प्रतीक्षा करना कई परिवारों के लिए पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का हिस्सा है।
पेड़ों और पर्यावरण को लेकर चिंता
स्थानीय लोगों ने आबादी बढ़ने, पेड़ों की संख्या घटने, प्रदूषण और पर्यावरण में बदलाव को कौवों के कम दिखाई देने के संभावित कारणों में गिनाया है। हालांकि, पड़ाना में कौवों की संख्या में कितनी कमी आई है, इसका कोई सर्वे या आंकड़ा सामने नहीं आया है। लोगों की चिंता अपने आसपास पहले की तुलना में कम कौवे दिखाई देने के अनुभव पर आधारित है।
उनका कहना है कि पेड़ पक्षियों को बैठने और आश्रय पाने की जगह देते हैं। आसपास के पेड़ कम होने पर कौवों समेत अन्य पक्षियों की मौजूदगी में भी बदलाव महसूस होता है। पितृपक्ष ने एक बार फिर लोगों का ध्यान इस ओर खींचा है।
परंपरा के साथ प्रकृति की चिंता भी
पंडित गौरव शर्मा बताते हैं कि पितृपक्ष में पुरखों की आत्मा की शांति की कामना से श्राद्ध के भोजन का पहला ग्रास कौवे को देने की परंपरा है। उनके अनुसार, कौवों का कम दिखाई देना श्रद्धालुओं के लिए चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि इस पर केवल धार्मिक परंपरा के संदर्भ में नहीं, प्रकृति के संतुलन के संदर्भ में भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
पड़ाना के लोगों के अनुभव में कौवे की कांव-कांव कभी घरों के आसपास की परिचित आवाज थी। अब पितृपक्ष में उसी आवाज की प्रतीक्षा उन्हें बदलते आसपास की याद दिलाती है। श्राद्ध का पहला ग्रास लेकर छत पर पहुंचने वाले परिवार चाहते हैं कि पक्षियों के लिए सुरक्षित वातावरण बना रहे, ताकि यह पुरानी परंपरा आने वाली पीढ़ियां भी निभा सकें।
