Morena में कांग्रेस का हाईवे जाम, NH-44 पर थमा ट्रैफिक
किसानों के मुआवजे और गेहूं खरीदी को लेकर बड़ा प्रदर्शन, 200 कार्यकर्ताओं ने दी गिरफ्तारी
मध्य प्रदेश के Morena जिले में कांग्रेस ने किसानों से जुड़े मुद्दों को लेकर बड़ा आंदोलन करते हुए आगरा–मुंबई नेशनल हाईवे (NH-44) को जाम कर दिया। इस चक्काजाम के कारण ग्वालियर, भिंड और मुरैना रूट पर यातायात पूरी तरह ठप हो गया और हजारों वाहन कई घंटों तक फंसे रहे।
कांग्रेस का यह प्रदर्शन किसानों की समस्याओं, गेहूं खरीदी में आ रही दिक्कतों और ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के लिए भूमि अधिग्रहण के बदले चार गुना मुआवजे की मांग को लेकर किया गया।
निरावली तिराहा से शुरू हुआ प्रदर्शन
यह आंदोलन मुरैना जिले के बानमोर थाना क्षेत्र स्थित निरावली तिराहा पर सुबह करीब 11 बजे शुरू हुआ। शुरुआत में प्रदर्शन शांत और सांकेतिक नजर आया, लेकिन कुछ ही समय में बड़ी संख्या में कार्यकर्ता और नेता वहां पहुंच गए।
भीड़ बढ़ने के साथ ही कांग्रेस कार्यकर्ता हाईवे की दोनों लेनों पर बैठ गए और नारेबाजी शुरू कर दी। इसके बाद NH-44 पर यातायात पूरी तरह रुक गया और सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं।
हाईवे पर पूरी तरह ठप हुआ यातायात
जैसे ही प्रदर्शनकारियों ने हाईवे पर कब्जा किया, आगरा, ग्वालियर, मुरैना और भिंड की ओर जाने वाला ट्रैफिक पूरी तरह बाधित हो गया।
बसें, ट्रक, निजी वाहन और एंबुलेंस तक जाम में फंस गए। कई किलोमीटर तक वाहनों की कतारें लग गईं और यात्रियों को घंटों तक परेशान होना पड़ा।
स्थानीय लोगों का कहना था कि अचानक लगे इस जाम ने पूरे क्षेत्र की आवाजाही को प्रभावित कर दिया।
किसानों के मुद्दों को लेकर कांग्रेस का आरोप
कांग्रेस नेताओं ने राज्य सरकार पर किसानों की अनदेखी का आरोप लगाया। उनका कहना था कि गेहूं खरीदी केंद्रों पर किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
इसके अलावा ग्रीनफील्ड एक्सप्रेस-वे के लिए अधिग्रहित जमीनों का उचित मुआवजा नहीं दिया जा रहा है, जिससे किसान आर्थिक रूप से प्रभावित हो रहे हैं।
प्रदर्शनकारियों ने मांग की कि किसानों को उनकी जमीन का चार गुना मुआवजा दिया जाए और समर्थन मूल्य पर खरीद व्यवस्था को आसान बनाया जाए।
ढाई घंटे चला आंदोलन, फिर दी गिरफ्तारी
करीब ढाई घंटे तक चले इस चक्काजाम के बाद दोपहर लगभग 1 बजे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने गिरफ्तारी देना शुरू किया।
करीब 200 कार्यकर्ताओं ने पुलिस के सामने गिरफ्तारी दी, जिसके बाद प्रशासन ने जाम हटाने की प्रक्रिया शुरू की। धीरे-धीरे हाईवे पर यातायात सामान्य हुआ।
हालांकि, कुछ समय तक ट्रैफिक धीमा बना रहा, लेकिन शाम तक स्थिति पूरी तरह सामान्य हो गई।
बड़े नेता भी पहुंचे प्रदर्शन में
इस आंदोलन में कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता भी शामिल हुए। इनमें पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल, राज्यसभा सांसद अशोक सिंह, पूर्व मंत्री पीसी शर्मा, सुरेंद्र यादव और प्रभुदयाल जौहरे जैसे नेता मौजूद रहे।
इसके अलावा ग्वालियर, मुरैना और भिंड क्षेत्र के कई विधायक और संगठन पदाधिकारी भी इस प्रदर्शन में शामिल हुए और सरकार के खिलाफ नारेबाजी की।
पुलिस प्रशासन रहा अलर्ट
प्रदर्शन को देखते हुए मुरैना पुलिस प्रशासन पहले से ही सतर्क था। एसपी धर्मराज मीणा ने स्पष्ट किया था कि हाईवे जाम की अनुमति नहीं दी जाएगी और केवल सांकेतिक प्रदर्शन की अनुमति है।
उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि सड़क जाम की गई तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
मौके पर 250 से अधिक पुलिसकर्मी और रिजर्व फोर्स तैनात की गई थी ताकि किसी भी स्थिति से निपटा जा सके।
प्रशासन और प्रदर्शनकारियों के बीच तनाव
प्रदर्शन के दौरान प्रशासन और कांग्रेस नेताओं के बीच कई बार तनावपूर्ण स्थिति भी बनी। प्रशासन ने लगातार प्रदर्शनकारियों से सड़क खाली करने की अपील की, लेकिन कार्यकर्ता अपनी मांगों पर अड़े रहे।
कांग्रेस नेताओं का कहना था कि सरकार जब तक किसानों की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं देगी, तब तक आंदोलन जारी रहेगा।
आम जनता को भारी परेशानी
इस चक्काजाम का सबसे ज्यादा असर आम लोगों पर पड़ा। स्कूल बसें, ऑफिस जाने वाले कर्मचारी, मरीज और एंबुलेंस तक जाम में फंस गए।
कई यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचने के लिए वैकल्पिक रास्तों का सहारा लेना पड़ा। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने इस जाम को लेकर नाराजगी जताई।
राजनीतिक माहौल हुआ गरम
इस घटना के बाद मुरैना और आसपास के क्षेत्रों में राजनीतिक माहौल गरमा गया है। कांग्रेस इसे किसानों के अधिकारों की लड़ाई बता रही है, जबकि प्रशासन इसे कानून व्यवस्था का उल्लंघन मान रहा है।
भविष्य में ऐसे आंदोलनों को लेकर प्रशासन और अधिक सख्ती बरतने की तैयारी में है।
निष्कर्ष
मुरैना में हुआ यह चक्काजाम केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि किसानों के मुद्दों को लेकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश बन गया है।
हालांकि जाम हटने के बाद स्थिति सामान्य हो गई है, लेकिन इस आंदोलन ने किसानों की समस्याओं और प्रशासनिक व्यवस्था दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
