आचार्य पद केवल परंपरा नहीं, संघ को आगे बढ़ाने का दायित्व: मुनि प्रमाण सागर जी
योग्य साधु को समाज आचार्य पद देना चाहे तो उसकी क्या व्यवस्था है? गुणायतन जनक मुनि श्री प्रमाण सागर जी ने दिया शास्त्रीय समाधान गुरु-शिष्य और संघ-परम्परा दोनों से मिलता है आचार्य पद, समाज को भी है अधिकार — प्रमाण सागर जी ने दिये 3 ऐतिहासिक उदाहरण
इंदौर | राजेश जैन दद्दू,
आजकल भारत वर्षीय जैन समाज में एक प्रश्न बहुत चर्चित और गर्म है कि — एक योग्य साधु परमेष्ठि है, जिनको समाज या कोई आचार्य पद देना चाहे तो उसकी क्या प्रोसेस होती है? कैसे दिये जाते हैं और एक अच्छे आचार्य में क्या-क्या गुण होने चाहिए?”धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू ने कहा कि श्रंमण संस्कृति के महाश्रमण प्रमाण सागर जी इस गहन शंका का समाधान किया शंका समाधान प्रणेता, गुणायतन जनक, परम पूज्य मुनिवर श्री 108 प्रमाण सागर जी महाराज ने। विशेष उद्बोधन में पूज्य मुनि श्री ने आगम और इतिहास के प्रमाण देकर स्पष्ट किया।
“देखो साधु के आचार्य पद की जो बात करते हैं, ये दो रूप में चली आयी है। हम अपनी पूरी परम्परा से देखते हैं।”
1. एक गुरु शिष्य की परम्परा,
2. दूसरा संघ की परम्परा।
और संघ की परम्परा भी दो रूप में — एक चतुर्विध संघ में खुद संघ हो, एक ही आचार्य बना हो, अथवा समाज की परम्परा।
इतिहास के दो बड़े उदाहरण दिये —
मुनि श्री ने कहा — “हम अतीत में चलते हैं। तो आचार्य धरसेन के पास पुष्पदंत और भूतबलि नाम के दो मुनिराज आए। ये दोनों मुनि थे पर दोनों के दोनों आचार्य बने।”
“इसी प्रकार आचार्य अर्हद्बली ने उसी काल में मुनियों का महासम्मेलन किया। वहाँ पर जब सब मुनि इकट्ठे हुए महिमा नगरी में तो उन्होंने पूछा सब आ गए? बोले हाँ हम लोग अपने-अपने संघ के साथ आ गए। तब उन्हें लगा कि अब संघ भेद का समय आ गया है। तो अब संघ का पुनर्गठन करना चाहिए और उन्होंने अलग-अलग संघ बना दिया — नंदी संघ, सिंह संघ, सेन संघ और देव संघ, ये चार मूल संघ हैं जिसकी परम्परा वर्षों से चली आ रही है। गुरु देव ने उदाहरण देते हुए कहा कि
आचार्य चक्रवर्ती शांति सागर जी महाराज बीसवीं शताब्दी के सबसे महान आचार्य हुए। जिस समय वो मुनि बने उस समय ऐसे कोई योग्य मुनि नहीं थे, बाद में चतुर्विध संघ ने उन्हें आचार्य बनाया।
गुरुदेव आचार्य श्री ज्ञानसागर जी महाराज — उनके गुरु शिवसागर जी थे, उनकी समाधि हुई, समाधि के उपरांत धर्मसागर जी महाराज उनके पट्ट पर आचार्य बने। तो ज्ञानसागर जी महाराज चूँकि उनके ज्येष्ठ शिष्य थे, समाज के प्रगाढ़ आग्रह से आचार्य पद पर अधिष्ठित हुए।
तो इन बातों को देखते हुए मुनि श्री ने कहा, “मैं ज्यादा लम्बे विस्तार पर नहीं जाना चाहूंगा। दो उदाहरण आपको दिये। ये परम्परा देखने में मिलती है, ये क्रम चला है। तो ये आचार्य पद को दोनों-तीनों तरीके से एक-दूसरे को देने की परम्परा रही है।” और आगे समाज को संबोधित करते हुए बताया कि
आचार्यत्व क्या है?
मुनि श्री ने स्पष्ट किया — “पर आचार्यत्व मूलतः एक दायित्व है। संघ को सुगठित करके आगे बढ़ाने का, संघ की परम्परा को आगे बढ़ाने का, जिन शासन की प्रभावना को बनाए रखने का।”
“अब जो उसके लायक हो। अगर आम शब्दों में मैं कहूँ —जो अपनी चर्या में शुद्ध रहते हुए संघ को अच्छे से लीड करने में समर्थ हो, वह आचार्य होने के योग्य हो सकता है।*”
शास्त्र में आचार्य के गुण —
मुनि श्री ने शास्त्रीय प्रमाण दिये — “शास्त्रों में इसके विषय में काफी चर्चाएं हैं। पिधमो, दिरधमो, धीरो, आगम कुशलो आदि विशेषण आचार्य भट्टारक स्वामी ने मूलाचार में दिये। आचार्य कुन्दकुन्द ने देश, कुल, जाति, श्रद्धा आदि के लक्षण से आचार्य के स्वरूप का वर्णन किया है।”
“तो ये जो भी व्यवस्था है, ये शास्त्रीय व्यवस्था के अंतर्गत है और हमें उसी मर्यादा में इसे स्वीकार करना चाहिए।”
निष्कर्ष —
पूज्य प्रमाण सागर जी के इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि —
1. आचार्य पद गुरु द्वारा भी दिया जाता है।
2. चतुर्विध संघ द्वारा भी दिया जाता है।
3. समाज के प्रगाढ़ आग्रह से भी योग्य साधु को आचार्य पद देकर सुशोभित किया जा सकता है।
यह व्यवस्था पूर्णतः शास्त्र सम्मत है। नमोस्तु शासन जयवंत हो।
