दालों के बढ़ते आयात के बीच महंगाई की चिंता, क्या अरहर-मसूर और चना बिगाड़ेंगे किचन का बजट?
पांच महीनों में दालों का आयात 67% बढ़कर 20.6 लाख टन पहुंचा, अरहर और उड़द की कीमतों में भी हुई बढ़ोतरी
नई दिल्ली। भारतीय रसोई में दालें रोजमर्रा के भोजन का अहम हिस्सा हैं। अरहर, मसूर, चना और उड़द जैसी दालें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत होने के साथ ही आम परिवारों के मासिक बजट से भी सीधे जुड़ी हुई हैं। ऐसे में दालों की कीमतों में होने वाला बदलाव घरेलू खर्च को प्रभावित कर सकता है। अब भारत में दालों के विदेशी आयात में हुई बढ़ोतरी और बाजार में कई दालों के महंगे होने से उपभोक्ताओं के बीच चिंता बढ़ गई है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आने वाले दिनों में दालों की कीमतों में और इजाफा हो सकता है?
पांच महीनों में 67 प्रतिशत बढ़ा दालों का आयात
उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026-27 में अप्रैल से अगस्त के बीच भारत में दालों का आयात बढ़कर 20.6 लाख टन यानी 2.06 मिलियन टन हो गया। पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में यह लगभग 67 प्रतिशत अधिक है।
आयात में यह बढ़ोतरी घरेलू मांग को पूरा करने और बाजार में दालों की उपलब्धता बनाए रखने की जरूरत को दर्शाती है। जब देश में उत्पादन मांग के अनुरूप नहीं होता या भविष्य में आपूर्ति को लेकर चिंता रहती है, तब आयात के माध्यम से कमी पूरी करने का प्रयास किया जाता है।
हालांकि, आयात बढ़ने का मतलब यह जरूरी नहीं है कि बाजार में दालों की कीमतें भी बढ़ेंगी। कीमतों पर घरेलू उत्पादन, उपलब्ध स्टॉक, अंतरराष्ट्रीय बाजार के भाव और सरकारी नीतियों का भी असर पड़ता है।
पिछले साल के मुकाबले कितनी महंगी हुईं दालें?
दिए गए आंकड़ों के अनुसार, कई प्रमुख दालों की कीमतों में पिछले साल की तुलना में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
- अरहर दाल: 132.75 रुपये प्रति किलोग्राम, पिछले साल के मुकाबले लगभग 15 प्रतिशत महंगी।
- उड़द दाल: 125.46 रुपये प्रति किलोग्राम, लगभग 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी।
- चना दाल: 93.48 रुपये प्रति किलोग्राम, लगभग 7.5 प्रतिशत महंगी।
इन कीमतों से संकेत मिलता है कि दालों की महंगाई का असर आम उपभोक्ताओं की खरीदारी पर पड़ सकता है। खासकर उन परिवारों के लिए, जिनके भोजन में दालों का नियमित इस्तेमाल होता है, कीमतों में लगातार वृद्धि मासिक बजट पर अतिरिक्त दबाव डाल सकती है।
हालांकि, वास्तविक खुदरा कीमतें शहर, बाजार, दाल की गुणवत्ता और बिक्री के स्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
आखिर क्यों बढ़ रही हैं दालों की कीमतें?
दालों की कीमतों में बदलाव के पीछे कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारण हो सकते हैं। इनमें विदेशी आपूर्ति, आयात की लागत, मौसम और कृषि उत्पादन प्रमुख हैं।
1. अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति पर असर: रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक व्यापार में आने वाली बाधाओं का असर कृषि उत्पादों की आपूर्ति तथा परिवहन लागत पर पड़ सकता है। कनाडा जैसे देशों से आने वाली मसूर और पीली मटर की कीमतें भी अंतरराष्ट्रीय बाजार की परिस्थितियों से प्रभावित हो सकती हैं।
2. आयात शुल्क और खरीद लागत: कुछ दालों पर लागू आयात शुल्क और अन्य खर्च विदेशी बाजार से खरीदारी को महंगा बना सकते हैं। यदि आयात की कुल लागत बढ़ती है, तो उसका असर घरेलू बाजार में उपलब्ध दालों की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
3. कम बारिश की चिंता: महाराष्ट्र और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में कम बारिश को लेकर फसलों की पैदावार पर असर पड़ने की आशंका जताई गई है। यदि उत्पादन प्रभावित होता है, तो घरेलू बाजार में आपूर्ति घट सकती है। हालांकि, वास्तविक असर का आकलन फसल उत्पादन के अंतिम आंकड़ों से ही किया जा सकेगा।
दालों के आयात पर खर्च भी बढ़ा
भारत में दालों का आयात केवल मात्रा के लिहाज से ही नहीं बढ़ा है, बल्कि इन्हें विदेश से खरीदने पर होने वाला खर्च भी बढ़ा है।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2026-27 के अप्रैल से अगस्त के बीच दालों के आयात पर लगभग 1.18 अरब डॉलर खर्च किए गए। यह पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में करीब 38 प्रतिशत अधिक है।
आयात की मात्रा में 67 प्रतिशत और खर्च में 38 प्रतिशत की वृद्धि के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि दालों के विदेशी व्यापार में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। हालांकि, कुल खर्च में बदलाव को केवल कीमतों से जोड़कर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि आयात की मात्रा, दालों के प्रकार और उनके अंतरराष्ट्रीय भाव भी इसमें भूमिका निभाते हैं।
क्या आने वाले दिनों में और महंगी होंगी दालें?
दालों की कीमतों को लेकर फिलहाल निश्चित रूप से यह कहना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में कितना इजाफा होगा। कीमतों का रुख इस बात पर निर्भर करेगा कि घरेलू फसल का उत्पादन कैसा रहता है, विदेशों से आपूर्ति कितनी होती है और बाजार में मांग के मुकाबले कितना स्टॉक उपलब्ध रहता है।
इसके अलावा, सरकार की आयात नीति, शुल्क में संभावित बदलाव और बाजार में उपलब्ध भंडार भी कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं।
दी गई जानकारी के मुताबिक, सरकार के पास लगभग 45 लाख टन दालों का भंडार है। यदि यह आंकड़ा संबंधित अवधि के आधिकारिक स्टॉक से मेल खाता है और उपलब्ध भंडार बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के लिए पर्याप्त है, तो इससे कीमतों पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, भंडार का वास्तविक उपयोग, उसकी संरचना और उपलब्धता भी महत्वपूर्ण होगी।
आम लोगों को क्या करना चाहिए?
दालों की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच उपभोक्ता अपने मासिक बजट की बेहतर योजना बना सकते हैं। इसके लिए अलग-अलग दुकानों में कीमतों की तुलना करना, जरूरत के अनुसार खरीदारी करना और उपलब्ध विकल्पों का इस्तेमाल करना उपयोगी हो सकता है।
फिलहाल दालों की कीमतों में आगे बढ़ोतरी की संभावना को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता, लेकिन महंगाई बढ़ना भी तय नहीं है। घरेलू उत्पादन, अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति और सरकारी कदम आने वाले समय में बाजार की दिशा निर्धारित करेंगे। ऐसे में उपभोक्ताओं की नजर अब दालों की नई फसल, बाजार भाव और सरकार की नीतियों पर रहेगी।
