ज्ञान प्राप्त करना पर्याप्त नहीं, उसे जीवन में उतारना ही सच्ची धर्म साधना है: आचार्यश्री उदारसागर
मुरैना (मनोज जैन नायक)
आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का मार्ग
Morena : जैन दर्शन आत्मचिंतन, वैराग्य और आत्मशुद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। बड़े जैन मंदिर में विराजमान आचार्यश्री उदारसागरजी महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाएं करना, शास्त्रों का अध्ययन करना या दूसरों को उपदेश देना नहीं है। असली उद्देश्य प्राप्त ज्ञान को अपने जीवन और आचरण में उतारना है। जब तक मनुष्य अपने भीतर झांककर स्वयं को बदलने का प्रयास नहीं करता, तब तक उसका ज्ञान केवल पुस्तकों और शब्दों तक सीमित रहता है।
धर्म की बातें बहुत, अमल की बारी में स्वार्थ
आचार्यश्री ने कहा कि यह आत्मचिंतन का विषय है कि हम धर्म की बातें तो बहुत करते हैं, लेकिन जब उन्हीं सिद्धांतों को जीवन में अपनाने की बारी आती है, तब मोह और स्वार्थ आड़े आ जाता है। उन्होंने कहा कि मनुष्य संसार को समझाने में जितनी रुचि लेता है, उतना ही प्रयास यदि स्वयं को समझने और सुधारने में करे, तो जीवन में वास्तविक परिवर्तन आ सकता है। स्वाध्याय, अर्जित ज्ञान और जाने हुए धर्म के सिद्धांतों का उपयोग दूसरों की गलतियां निकालने में नहीं, बल्कि अपने दोषों को पहचानने और दूर करने में होना चाहिए।
दूसरों को उपदेश देना सरल, स्वयं पर अमल करना कठिन
इस संदर्भ में आचार्यश्री ने एक प्रेरक प्रसंग सुनाया। एक व्यक्ति का पुत्र गंभीर रूप से बीमार था। उसने अनेक उपचार कराए, लेकिन पुत्र स्वस्थ नहीं हो सका और उसका देहांत हो गया। पिता शोक में डूबकर फूट-फूटकर रोने लगा। तभी एक पड़ोसी आया और समझाने लगा कि यह शरीर नश्वर है, जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु निश्चित है, जो आया है उसे जाना ही पड़ेगा, होनी को कोई टाल नहीं सकता, इसलिए धैर्य रखो। पड़ोसी की बातों से पिता को कुछ सांत्वना मिली।
समय बीतता गया। एक दिन उसी पड़ोसी की बकरी मर गई और वह स्वयं रोने-बिलखने लगा। यह देखकर पुत्र खो चुके व्यक्ति ने पूछा कि तुम क्यों रो रहे हो, जब मेरे पुत्र का देहांत हुआ था तब तो तुम मुझे धैर्य की शिक्षा दे रहे थे, आज अपना उपदेश क्यों भूल गए। इस पर पड़ोसी ने सहज भाव से उत्तर दिया कि पुत्र तुम्हारा था, इसलिए तुम्हें समझा रहा था, बकरी मेरी थी, इसलिए मुझे दुख हो रहा है।

ज्ञान पीछे छूटता है, मोह हावी होता है
आचार्यश्री ने कहा कि यह प्रसंग मनुष्य के स्वभाव को उजागर करता है। जब दुख दूसरे के जीवन में आता है, तब हमें संसार की नश्वरता, कर्मों की गति और मृत्यु की अनिवार्यता याद रहती है। लेकिन जब वही परिस्थिति हमारे सामने आती है, तब ज्ञान पीछे छूट जाता है और मोह विवेक पर हावी हो जाता है।
मोह ही दुख का कारण: मुनिश्री उपशांत सागर
धर्मसभा में मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार संसार परिवर्तनशील है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के अनुसार जन्म-मरण के चक्र में परिभ्रमण करता है। शरीर नश्वर है, संयोग-वियोग स्वाभाविक हैं और कोई भी संबंध सदा एक जैसा नहीं रहता। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं कि प्रियजन के बिछुड़ने पर संवेदना रखना गलत है, बल्कि यह है कि शोक में डूबकर जीवन की वास्तविकता को भूल जाना उचित नहीं।
राजा हो या रंक, मृत्यु से कोई नहीं बच सकता
मुनिश्री ने बारह भावना के दोहे “राजा राणा छत्रपति, हाथिन के असवार। मरना सबको एक दिन, अपनी-अपनी बार” का उल्लेख किया और कहा कि इसका भाव अत्यंत गहरा है। कोई राजा हो, सम्राट हो या अपार धन-संपत्ति और शक्ति का स्वामी, मृत्यु के सामने किसी का वैभव काम नहीं आता। जिस शरीर पर मनुष्य गर्व करता है, जिस पद के लिए जीवन भर संघर्ष करता है और जिस संपत्ति को अपनी समझकर संग्रह करता है, वह सब यहीं रह जाता है।

जीवन को सार्थक बनाने का संदेश
मुनिश्री ने कहा कि जैन दर्शन बार-बार स्मरण कराता है कि संसार के सभी बाहरी सहारे अस्थायी हैं। इसलिए मनुष्य को अहंकार, लोभ और अत्यधिक मोह में पड़कर जीवन का वास्तविक उद्देश्य नहीं भूलना चाहिए। मृत्यु का चिंतन निराशा पैदा करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने के लिए है। जब यह ज्ञात है कि जीवन सीमित है, तो प्रत्येक क्षण का उपयोग आत्मकल्याण, सदाचार और परोपकार में करना चाहिए।
