Morena में आचार्यश्री उदारसागर का प्रवचन: सम्यग्दर्शन से बड़ा कोई कल्याणकारी तत्व नहीं
बड़े जैन मंदिर में हुआ धर्मोपदेश
Morena (मनोज जैन नायक)। बड़े जैन मंदिर में परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज और परम पूज्य मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को धर्मोपदेश दिया। प्रवचन में आचार्यश्री ने सम्यग्दर्शन की महिमा बताई, जबकि मुनिश्री ने संसार के क्षणिक सुखों के पीछे जीवन न गंवाने का आह्वान किया। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने दोनों संतों की वाणी का श्रवण किया।
“तीनों लोक और तीनों काल में सम्यग्दर्शन से बड़ा कोई कल्याणकारी तत्व नहीं”
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने सम्यग्दर्शन की महिमा बताते हुए कहा कि तीनों लोक और तीनों काल में सम्यग्दर्शन से बड़ा कोई कल्याणकारी तत्व नहीं है, जबकि मिथ्यादर्शन के समान कोई दूसरा अकल्याणकारी तत्व नहीं है। उन्होंने कहा कि जीव अनादिकाल से जन्म-मरण के चक्र में भटक रहा है। ऐसे में सम्यग्दर्शन की प्राप्ति ही उसके वास्तविक कल्याण और मोक्षमार्ग की निर्णायक शुरुआत है।
मनुष्य पर्याय दुर्लभ, विषय-भोगों में न गंवाएं
आचार्यश्री ने कहा कि जीव अनंत भवों से संसार में परिभ्रमण कर रहा है। मनुष्य पर्याय अत्यंत दुर्लभ है और यह अवसर बार-बार प्राप्त नहीं होता। इसलिए मनुष्य को विषय-भोगों में अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ करने के बजाय सम्यग्दर्शन की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने बताया कि सम्यग्दर्शन के बाद सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र के माध्यम से जीव मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होता है।
मिथ्यादर्शन: संसार का सबसे बड़ा अंधकार
मिथ्यादर्शन की भयावहता समझाते हुए आचार्यश्री ने कहा, “विष तो एक भव में शरीर का मरण कराता है, लेकिन मिथ्यादर्शन जीव को भव-भव में भटकाता रहता है।” उन्होंने कहा कि मिथ्यात्व के कारण जीव वस्तु के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान पाता और जन्म-मरण के चक्र में उलझा रहता है। इसी कारण मिथ्यात्व को संसार का सबसे बड़ा अंधकार कहा गया है।
सूत्र के माध्यम से समझाया सम्यग्दर्शन का स्वरूप
प्रवचन के दौरान “निर्देशस्वामित्वसाधनाधिकरण स्थिति विधानतः” सूत्र के माध्यम से सम्यग्दर्शन के स्वरूप को समझाया गया। आचार्यश्री ने स्पष्ट किया कि सम्यग्दर्शन केवल पूजा-पाठ अथवा बाहरी धार्मिक क्रियाओं का नाम नहीं है। जिनेन्द्र भगवान, जिनवाणी और आत्मतत्व के प्रति यथार्थ श्रद्धा ही सम्यग्दर्शन का मूल स्वरूप है।

इन्द्रभूति गौतम का प्रसंग
आचार्यश्री ने इन्द्रभूति गौतम के प्रसंग के माध्यम से कहा कि सच्ची श्रद्धा और तत्त्वज्ञान जीव के जीवन की दिशा बदल सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि देव, नारकी और तिर्यंच जीव भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर सकते हैं। ऐसे में मनुष्य पर्याय का मिलना अत्यंत बड़ा सौभाग्य है, और इसका सदुपयोग आत्मकल्याण में किया जाना चाहिए।
मुनिश्री उपशांतसागर: संसार के क्षणिक सुखों के पीछे जीवन न गंवाएं
परम पूज्य मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि संसार में प्रत्येक जीव सुख और शांति की तलाश में है, लेकिन मनुष्य जिस सुख को धन, वैभव और भौतिक साधनों में खोज रहा है, वह क्षणिक है। उन्होंने कहा कि वास्तविक सुख आत्मा के कल्याण और जिनेन्द्र भगवान की वीतराग वाणी के प्रति यथार्थ श्रद्धा में निहित है।
मृत्यु के बाद केवल कर्म साथ जाते हैं
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य जीवन में धन-संपत्ति, पद और प्रतिष्ठा भले ही महत्वपूर्ण दिखाई दें, लेकिन मृत्यु के बाद इनमें से कुछ भी जीव के साथ नहीं जाता। जीव के साथ केवल उसके कर्म जाते हैं। इसलिए सांसारिक जिम्मेदारियों के साथ मनुष्य को अपने आत्मकल्याण के लिए भी पुरुषार्थ करना चाहिए।
आत्मजागरण का आह्वान
मुनिश्री ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान के प्रति सच्ची श्रद्धा और संतों की वाणी का श्रवण जीव को संसार की वास्तविकता का बोध कराता है तथा मोक्षमार्ग की दिशा दिखाता है। मनुष्य जीवन अनमोल और दुर्लभ है, इसलिए इसे केवल भोग-विलास में गंवाने के बजाय आत्मजागरण और आत्मकल्याण में लगाना चाहिए।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि संसार के क्षणिक सुखों के पीछे अपना अमूल्य जीवन व्यर्थ न गंवाएं। जीवन की वास्तविक उपलब्धि आत्मस्वरूप की पहचान, सम्यग्दर्शन की प्राप्ति और मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ने में है।

