Vastu Tips: पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बनाएं भोजन, उत्तर-पूर्व में स्थापित करें पूजा घर
वास्तु विशेषज्ञ ने बताए घर, रसोई और पूजा स्थल से जुड़े उपाय; बिना तोड़फोड़ के वास्तु दोष कम करने के भी दिए सुझाव
भोपाल। भवन निर्माण के दौरान दिशाओं का चयन, मुख्य द्वार की स्थिति, रसोई और पूजा घर का स्थान जैसे विषयों को वास्तु शास्त्र में विशेष महत्व दिया जाता है। घर बनवाने या उसमें बदलाव करने वाले लोगों के मन में अक्सर यह सवाल रहता है कि कौन-सा कमरा किस दिशा में होना चाहिए और पूजा के दौरान किस दिशा की ओर मुंह रखना उचित माना जाता है।
इन्हीं जिज्ञासाओं के समाधान के लिए भोपाल में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में वास्तु विशेषज्ञ एवं सलाहकार सत्येंद्र सिंह ने लोगों के सवालों के जवाब दिए। उन्होंने घर में सकारात्मक वातावरण बनाए रखने, दैनिक पूजा-पाठ, रसोई की व्यवस्था और बिना तोड़फोड़ किए वास्तु संबंधी सुधार करने के उपाय बताए।
विशेषज्ञ ने कहा कि वास्तु शास्त्र भारतीय स्थापत्य परंपरा से जुड़ी ऐसी पद्धति है, जिसमें प्रकृति के पंचतत्वों और दिशाओं के संतुलन को महत्व दिया जाता है। इसके नियम पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित हैं। इनका पालन व्यक्तिगत आस्था और सुविधा के अनुसार किया जा सकता है।
पूर्व दिशा की ओर मुंह करके बनाएं भोजन
वास्तु विशेषज्ञ के अनुसार, रसोई में भोजन बनाते समय व्यक्ति का मुंह पूर्व दिशा की ओर होना शुभ माना जाता है। वास्तु परंपरा में पूर्व दिशा को सूर्य, ऊर्जा और सकारात्मकता से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए रसोई का चूल्हा या गैस इस प्रकार रखने की सलाह दी जाती है कि खाना बनाने वाले व्यक्ति का मुख पूर्व की ओर रहे।
हालांकि, रसोई की व्यवस्था करते समय केवल दिशा ही नहीं, बल्कि सुरक्षा, हवा और रोशनी का भी विशेष ध्यान रखना चाहिए। गैस सिलेंडर, चूल्हे, बिजली के उपकरण और पानी की व्यवस्था व्यावहारिक एवं सुरक्षित तरीके से की जानी चाहिए। रसोई में पर्याप्त वेंटिलेशन और नियमित साफ-सफाई परिवार के स्वास्थ्य के लिए अधिक महत्वपूर्ण है।
उत्तर-पूर्व दिशा में रखें पूजा घर
वास्तु मान्यताओं में घर की उत्तर-पूर्व दिशा को पूजा स्थल के लिए उपयुक्त माना गया है। इस दिशा को ईशान कोण भी कहा जाता है। विशेषज्ञ ने बताया कि यदि घर की संरचना और उपलब्ध स्थान अनुमति देते हैं तो पूजा घर या मंदिर उत्तर-पूर्व दिशा में स्थापित किया जा सकता है।
पूजा स्थल को स्वच्छ, शांत और व्यवस्थित रखना चाहिए। वहां अनावश्यक वस्तुएं नहीं रखनी चाहिए। मंदिर के आसपास पर्याप्त रोशनी और वायु का प्रबंध होना भी जरूरी है। यदि घर छोटा है और अलग पूजा कक्ष बनाना संभव नहीं है तो किसी स्वच्छ एवं शांत स्थान पर छोटा मंदिर स्थापित किया जा सकता है।
रसोई में पूजा घर रखने से बचें
कार्यक्रम में अवधपुरी निवासी विनीता तिवारी ने पूछा कि उनके घर का किचन खुला हुआ है और पूजा स्थल भी रसोई में ही बना है। क्या वास्तु के अनुसार यह व्यवस्था उचित है?
इस सवाल के जवाब में वास्तु विशेषज्ञ ने बताया कि रसोई में तेल, धुआं, भाप और खाद्य सामग्री के कारण पूजा स्थल की साफ-सफाई प्रभावित हो सकती है। इसलिए संभव हो तो रसोई और पूजा घर को अलग रखना चाहिए।
यदि घर में पर्याप्त स्थान उपलब्ध नहीं है तो रसोई के पूजा स्थल के लिए अलग विभाजन बनाया जा सकता है। लकड़ी, कांच या अन्य उपयुक्त सामग्री की मदद से पूजा क्षेत्र को रसोई के बाकी हिस्से से अलग किया जा सकता है। घर में कोई दूसरा स्वच्छ स्थान उपलब्ध हो तो मंदिर को वहां स्थानांतरित करना बेहतर माना गया है।
पूजा करते समय किस दिशा में हो चेहरा?
वास्तु विशेषज्ञ ने पूजा के समय दिशा का ध्यान रखने की भी सलाह दी। उन्होंने कहा कि मंदिर की दक्षिण दिशा में बैठकर पूजा की जा सकती है, जिससे पूजा करने वाले व्यक्ति का मुख उत्तर की ओर रहेगा। मान्यता है कि उत्तर दिशा की ओर मुख करके पूजा करने से घर में समृद्धि और धन-धान्य की वृद्धि होती है।
उन्होंने पश्चिम दिशा की ओर मुंह करके पूजा करने से बचने की सलाह दी। हालांकि, पूजा की दिशा से अधिक महत्वपूर्ण श्रद्धा, स्वच्छता, एकाग्रता और शांत वातावरण माना जाता है। घर की संरचना के कारण निर्धारित दिशा में बैठना संभव नहीं हो तो उपलब्ध स्थान के अनुसार सुविधाजनक व्यवस्था की जा सकती है।
शिवलिंग की स्थापना में रखें ध्यान
कार्यक्रम में एक पाठक ने सवाल किया कि उनके घर के छोटे मंदिर का मुख पूर्व दिशा की ओर है और शिवलिंग भी उसी दिशा में स्थापित है। ऐसी स्थिति में पूजा किस दिशा में बैठकर करनी चाहिए?
विशेषज्ञ के अनुसार, पूजा करते समय ऐसी जगह बैठना चाहिए जहां व्यक्ति सहज रूप से भगवान के दर्शन कर सके और उसका मुख उत्तर दिशा की ओर रहे। मंदिर या शिवलिंग को बार-बार स्थानांतरित करने के बजाय पूजा स्थल की स्वच्छता, पवित्रता और नियमित उपासना पर ध्यान देना चाहिए।
शिवलिंग की पूजा करते समय जल निकासी की उचित व्यवस्था रखना भी आवश्यक है। अभिषेक का जल पूजा स्थल पर एकत्रित न हो और आसपास स्वच्छता बनी रहे, इसका विशेष ध्यान रखना चाहिए।
सत्यनारायण कथा के लिए शुभ दिन
सत्येंद्र सिंह ने धार्मिक अनुष्ठानों से जुड़े सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने बताया कि पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार भगवान सत्यनारायण की कथा गुरुवार या पूर्णिमा के दिन कराना शुभ माना जाता है।
कथा आयोजित करते समय घर की स्वच्छता, पूजा सामग्री की उपलब्धता और परिवार के सदस्यों की सुविधा का ध्यान रखना चाहिए। धार्मिक आयोजन किसी अनुभवी विद्वान या पुरोहित के मार्गदर्शन में किया जा सकता है।
बिना तोड़फोड़ भी किए जा सकते हैं सुधार
विशेषज्ञ ने बताया कि वास्तु से संबंधित प्रत्येक समस्या के समाधान के लिए घर में तोड़फोड़ कराना आवश्यक नहीं है। कई बार कमरों की व्यवस्था बदलने, अनावश्यक सामान हटाने, स्वच्छता रखने और रोशनी एवं हवा की स्थिति बेहतर करने से भी घर का वातावरण सकारात्मक बनाया जा सकता है।
उन्होंने लोगों को सलाह दी कि किसी भी बड़े संरचनात्मक परिवर्तन से पहले भवन की मजबूती, सुरक्षा और परिवार की वास्तविक जरूरतों का ध्यान रखें। वास्तु संबंधी सुझाव पारंपरिक मान्यताओं पर आधारित होते हैं, इसलिए घर में बदलाव करते समय योग्य आर्किटेक्ट या इंजीनियर की सलाह भी अवश्य लेनी चाहिए।
